भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 534 में से

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के स्तम्भ आदि ले जाकर वहां के मंदिर में लगा दिये गये । खेरोट—प्रतापगढ़ से लगभग ७ मील दूर दक्षिण-पूर्व में खेरोट नामक प्राचीन गांव है । संस्कृत लेखों में इसका नाम 'खर्परपद्रक' लिखा हुआ मिलता है । यह गांव रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) ने घोटार्सों गांव की 'वटयक्षिणीदेवी' के मंदिर को वि० सं० १००३ ( ई० स० ६४६ ) में भेंट किया था¹। खेरोट गांव में भी प्राचीनता के कई चिन्ह अब तक विद्यमान हैं, जिससे कहा जा सकता है कि पहले यह सुसंपन्न रहा होगा । अरणोद—प्रतापगढ़ से दक्षिण में ११ मील की दूरी पर अरणोद नाम का क़सबा है । इस समय यह क़सबा दूसरे नंबर पर है और महारावत के समीपी बांधवों का प्रमुख ठिकाना है । गांव के बाहिर पाठशाला के सामने की बावड़ी में शेषशायी विष्णु की सुंदर मूर्ति दीवार में चुनी हुई है। बाग के पास की बावड़ी में भी कई मूर्तियां और खुदाई के कामवाले पत्थर चुने हुए हैं, जिनमें से श्वेतांबर पार्श्वनाथ की खड़ी हुई मूर्ति बड़ी सुंदर है। भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह अरणोद से ही जाकर प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ था । वि० सं० १६५७ ( ई० स० १६०० ) में उक्त महारावत के द्वितीय महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर अरणोद के ठिकाने पर उसको नियत किया गया, जो वहां का वर्तमान स्वामी है । अरणोद में पाठशाला और डाकखाना भी है । गौतमेश्वर—अरणोद से लगभग दो मील के अंतर पर गौतमेश्वर नामक तीर्थ है, जो प्रतापगढ़ राज्य में बड़ा पवित्र माना जाता है। यहां का गौतमेश्वर नामक शिवालय एक पहाड़ के नीचे के मध्य-भाग में बना है, जहां कुछ चौड़ाई आ गई है। मंदिर के ऊपर पहाड़ का अंश छज्जे की भांति है। गौतमेश्वर के मंदिर के पास और भी कई मंदिर हैं, जहां साधु लोग आकर ठहरते हैं। पहाड़ के ऊपर तालाब है, जिसका जल टपककर गौतमेश्वर ( १ ) देखो ऊपर पृष्ठ २३, टिप्पण संख्या १ । ४