राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
- भूगोल सम्बन्धी वर्णन - २३
देवी' का मन्दिर और मठ भी था । उक्त देवी के मंदिर को वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० ६४६ ता० २ नवम्बर ) को कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरा ) ने, जिसके अधिकार में यह देश भी था, घोटासीं के निकट का 'खर्परपद्रक' ( खैरोट ) गांव भेंट किया था¹ । ये सूर्य और देवी के मंदिर तथा मठ कहां थे, इसका अब तक निश्चय नहीं हो सका । संभव है, जिसको आज-कल भैरूंजी का मंदिर कहते हैं, वही प्राचीन सूर्य का मंदिरों हो । यहां के मंदिर आदि के पत्थर दूर-दूर तक पहुंचे हैं । मोहकमपुरा की छत्रियों और चबूतरों में यहां के पत्थर ही लगे हुए हैं । नंदवाणा बोहरा नाथू ने वसाड़ के पास पोह की बावड़ी बनवाई, जिसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं। इसी प्रकार प्रतापगढ़ के दरवाज़े के बाहर अग्रवाल चैनराम ने जो बावड़ी बनवाई, उसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं । उनके साथ वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० २ नवंबर) की उपर्युक्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल ( दूसरा ) के समय की
( १ ) ॰॰॰परममाहेश्वरो महाराजश्रीमहेन्द्रपालदेवः श्रीदशपुरपश्चिम- पथके तलवर्गिंगकहरिषडभुज्यमानखर्प्परपद्रकग्रामे घोट्टावर्षिकाप्रत्यासन्ने समुपगतान् सर्व्वांन्ने(नेव)यथास्थाननियुक्तान्प्रतिवासिनश्च समाज्ञापयत्यस्तु वः उपरलिखितग्रामः स्वसीमातृणप्रति[पूति]गोचरपर्यन्तो(न्तः)सर्व्वादाय- समेत आचन्द्रार्कक्षितिकालं पूर्व्वदत्तदेवब्रह्मदेयवर्ज्जितो 'मया पित्रोः पुन्या(ण्या)भिवृद्धये का[ह्नि]क्यां गंगायां स्नात्वा पुन्थे(ण्ये)हनि [ध]नशूर- प्रार्थनया श्रीदशपुरचातुर्वैद्यहरिर्षेश्वर(हर्षीश्वर)मठसंव(ब)ध्यमानश्रीवट- यक्षिणीदेव्यै शासनत्वेन प्रतिपादितः ( त इति) मत्वा भवद्भिः सा(स)- मनुमन्तव्यो(व्यः) प्रतिवासिजनपदैरप्याज्ञास्र(श्र)वणविधेयैर्भूत्वा यथा- दीयमानभागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिकमस्योपनेतव्यमिति । श्रीजज्जनाग- प्रदत्तादेशात् । संवत्सो ( संवत्सरे ) १००३ मार्ग वदि ५ । पुरोहित- त्रिविक्रमात्ताच्च(नाथ) लिखितमिदम् । स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य ।
वही; जि० १४, पृ० १८३-४ ।
२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रशस्ति भी यहां से ले जाकर बावड़ी के पास एक चबूतरे में चुनी गई थी। उसको मैंने वहां से निकलवाकर राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित किया है' । 'वरमंडल' गांव के, जो घोटार्सी से दो मील दूर है, शिवालय के स्तम्भ आदि भी यहीं के हैं। उक्त मंदिर के बाहर एक चबूतरे पर सूर्य का एक-चक्र रथ जमा हुआ है, जो घोटार्सी के सूर्य मंदिर का ही रथ होना चाहिये । वहां ( वरमंडल ) के चबूतरे तथा मंदिर की दीवारों में जो बहुत से सुंदर खुदाईवाले पत्थर लगे हुए हैं, वे सब घोटार्सी से गये हैं । घोटार्सी में पहले कुछ जैन मंदिर भी थे । प्रतापगढ़ की संस्कृत पाठशाला के अध्यक्ष पंडित जगन्नाथ शास्त्री के परिश्रम से पार्श्वनाथ के मंदिर की प्रशस्ति का एक टुकड़ा अभी मिला है, जिसमें संवत् का भाग नहीं है, परन्तु दुर्लभराज का नाम² है, जिससे अनुमान होता है कि उक्त मन्दिर उपर्युक्त दुर्लभराज चौहान के समय बना होगा । वीरपुर—प्रतापगढ़ से लगभग दस मील दूर दक्षिण-पश्चिम में सुहांगपुर के समीप वीरपुर नामक गांव है। यहां एक टूटा हुआ जैन-मंदिर है। उसको लोग दो हज़ार वर्ष का प्राचीन बतलाते हैं, जो विश्वास के योग्य नहीं है, क्योंकि उसपर जो खुदाई का काम है, वह बारहवीं शताब्दी के पूर्व का नहीं है । पहले यह अच्छा क़सबा था, परन्तु अब तो भीलों और मीणों की थोड़ी सी बस्ती है। यहां दूर-दूर तक ईंटों के टुकड़े पड़े हुए मिलते हैं और खोदने पर बड़ी-बड़ी ईंटें तथा मिट्टी की नांदें मिलती हैं। यहां एक शिवालय भी है, जो पहले शिखर-सहित पत्थर का ही बना था, परन्तु शिखर तथा सभामंडप दोनों ही गिर गये हैं तथा नंदी के दो टुकड़े सभामंडप में पड़े हुए हैं। द्वार के ऊपर गणपति और उसके ऊपर नवग्रह की मूर्तियां बनी हैं । वि० सं० १६४१ ( ई० स० १५८४ ) में सुहागपुरे में दिगम्बर जैनमन्दिर बनने पर वीरपुर के प्राचीन जैनमंदिर ( १ ) राजपूताना म्यूज़ियम् ( अजमेर ) की ई० स० १९१३-१४ की रिपोर्ट; पृ० २ । ( २ ) मूललेख की छाप से ।
के स्तम्भ आदि ले जाकर वहां के मंदिर में लगा दिये गये । खेरोट—प्रतापगढ़ से लगभग ७ मील दूर दक्षिण-पूर्व में खेरोट नामक प्राचीन गांव है । संस्कृत लेखों में इसका नाम 'खर्परपद्रक' लिखा हुआ मिलता है । यह गांव रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) ने घोटार्सों गांव की 'वटयक्षिणीदेवी' के मंदिर को वि० सं० १००३ ( ई० स० ६४६ ) में भेंट किया था¹। खेरोट गांव में भी प्राचीनता के कई चिन्ह अब तक विद्यमान हैं, जिससे कहा जा सकता है कि पहले यह सुसंपन्न रहा होगा । अरणोद—प्रतापगढ़ से दक्षिण में ११ मील की दूरी पर अरणोद नाम का क़सबा है । इस समय यह क़सबा दूसरे नंबर पर है और महारावत के समीपी बांधवों का प्रमुख ठिकाना है । गांव के बाहिर पाठशाला के सामने की बावड़ी में शेषशायी विष्णु की सुंदर मूर्ति दीवार में चुनी हुई है। बाग के पास की बावड़ी में भी कई मूर्तियां और खुदाई के कामवाले पत्थर चुने हुए हैं, जिनमें से श्वेतांबर पार्श्वनाथ की खड़ी हुई मूर्ति बड़ी सुंदर है। भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह अरणोद से ही जाकर प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ था । वि० सं० १६५७ ( ई० स० १६०० ) में उक्त महारावत के द्वितीय महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर अरणोद के ठिकाने पर उसको नियत किया गया, जो वहां का वर्तमान स्वामी है । अरणोद में पाठशाला और डाकखाना भी है । गौतमेश्वर—अरणोद से लगभग दो मील के अंतर पर गौतमेश्वर नामक तीर्थ है, जो प्रतापगढ़ राज्य में बड़ा पवित्र माना जाता है। यहां का गौतमेश्वर नामक शिवालय एक पहाड़ के नीचे के मध्य-भाग में बना है, जहां कुछ चौड़ाई आ गई है। मंदिर के ऊपर पहाड़ का अंश छज्जे की भांति है। गौतमेश्वर के मंदिर के पास और भी कई मंदिर हैं, जहां साधु लोग आकर ठहरते हैं। पहाड़ के ऊपर तालाब है, जिसका जल टपककर गौतमेश्वर ( १ ) देखो ऊपर पृष्ठ २३, टिप्पण संख्या १ । ४
२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के सामने के कुंड में प्रपात के रूप में गिरता है । नीचे की तरफ बहुत गहराई में नदी बहती है । यहां का दृश्य बड़ा ही सुंदर है। प्रतिवर्ष वैशाख सुदि १५ को यहां बड़ा मेला लगता है और दूर-दूर से हज़ारों यात्री आकर मेले में सम्मिलित होते हैं। मंदिर के बाहर वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून) का शिलालेख है', जिससे पाया जाता है कि यह प्रदेश मांडू के सुलतान नासिरशाह के अधीन था और खानआलम मक़वलखां यहां का शासक था, जिसके समय में शाह, जैचंद ने यहां पर लगनेवाला यात्रियों का कर छुड़वाया । भचूंडला—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग १६ मील की दूरी पर भचूंडला नामक प्राचीन गांव है, जिसकी बस्ती अब कम रह गई है। उसके बाहर युद्ध में काम आनेवाले वीरों के स्मारक स्तम्भ खड़े हुए हैं, जिनमें से एक पर वि० सं० १३३८ ( ई० स० १२८१.) का लेख है । इन स्तंभों से थोड़ी ही दूर पर एक प्राचीन मंदिर है, जो सारा पत्थरों से बना है । इस मंदिर के द्वार पर गरुड़ारूढ़ विष्णु की मूर्ति और भीतर की दीवार के सहारे मूर्ति की वेदी बनी है । आज-कल इसमें शिव-लिङ्ग है, परन्तु यह पहले विष्णु का मंदिर था । इस मंदिर के बहुतसे पत्थरों की खुदाई तथा स्तम्भ आदि बेमेल हैं, जिससे अनुमान होता है कि किसी अन्य मंदिर के पत्थर इस मंदिर के बनाने में काम में लाये गये हों। जो भी हो यह मंदिर १४ वीं शताब्दी के आस-पास का बना हुआ प्रतीत होता है और इसके अधिकांश पत्थर शेवना से लाये गये जान पड़ते हैं । नीनोर— प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २४ मील की दूरी पर नीनोर नामक प्राचीन गांव है । यहां के दिगंबर जैन मंदिर के 'निजमंदिर का द्वार शेवना के शिव-मंदिर से लाकर खड़ा किया गया है। उसके मध्य में शिव और दोनों किनारों पर विष्णु और ब्रह्मा की मूर्तियां हैं । द्वार के दोनों पाश्र्वों में तीन-तीन स्त्री-पुरुषों की पास-पास खड़ी हुई मूर्तियां हैं । यहां का लक्ष्मीनारायण का मंदिर नागर ब्राह्मण गेमल और विश्वनाथ का ( १ ) देखो ऊपर पृ० २०, टिप्पण संख्या १ ।
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शेवना के प्राचीन शिवमंदिर का भीतरी भाग
भूगोल सम्बन्धी वर्णनः २७ बनवाया हुआ है, जिसमें वि० सं० १८२६ शक सं० १६६४ ज्येष्ठ वदि ५ (ई० स० १७७२ ता० २१ मई) गुरुवार का शिलालेख है। इस मंदिर का द्वार तथा स्तंभों के सिरे शेवना से लाकर लगाये गये हैं। गांव के बाहर पाषाण का बना हुआ एक छोटासा शिव-मंदिर तथा पद्मावती (देवी) का मंदिर है, जिनको वहां के नागर ब्राह्मणों ने बनवाया था। तालाब की पाल पर का शिव-मंदिर वि० सं० १८१६ (ई० स० १७६२) में महारावत सालिम- सिंह के समय नागर ब्राह्मण हरनाथ ने बनवाया था । गांव के आस-पास दूर-दूर तक पुरानी ईंटें निकलती हैं। पहले यहां विसनगरे नागरों की अच्छी बस्ती थी, परन्तु अब केवल १०-१५ घर रहे हैं। शेवना—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २० मील की दूरी पर शेवना नामक गांव है, जो पहले संपन्न था । यह प्रसिद्ध है कि यहां शिवनगरी नामक राज्य की राजधानी थी । इसमें कितनी सत्यता है, यह कहा नहीं जा सकता, परन्तु इतना निश्चित है कि पहले यह नगर विशाल रहा होगा, क्योंकि इसके खंडहर दूर-दूर तक दृष्टिगोचर होते हैं । एक क़िले के अतिरिक्त यहां पर अब तक कई मंदिरों के भग्नावशेष विद्यमान हैं, जिनमें एक शिवालय बहुत सुन्दर है। यहां ज़मीन के भीतर बना हुआ महाकाल का पुराना मंदिर है। कई मूर्तियां इधर-उधर टूटी-फूटी दशा में मिलती हैं, जिनमें से त्रिविक्रम (वामन) की मूर्ति राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है¹। यहां से कई मंदिरों के द्वार, स्तम्भ आदि लेजाकर अचूंडला, नीनोर आदि के मंदिर बनाये गये हैं। अब तो इसके आस-पास थोड़ीसी भीलों (मीणों) की बस्ती रह गई है। उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त इस राज्य में बोरदिया, धमोतर, बमोतर, गयासपुर, सुहागपुर, बसाड़ आदि और भी कई प्राचीन स्थान हैं । उनमें से कई में मंदिरों आदि के चिन्ह पाये जाते हैं। गयासपुर मालवे के सुलतान गयासुद्दीन के नाम पर बसा हुआ है, जो पहले (१) राजपूताना म्यूज़ियम् (अजमेर) की ई० स० १६२२-२३ की रिपोर्ट; पृ० ५ ।
२८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास देवलिया (देवगढ़) परगने का मुख्य स्थान था । अब तो यह स्थान ऊजड़ होता जाता है और केवल थोड़ी सी वस्ती रह गई है। इसी प्रकार वसाड़ भी प्रतापगढ़ परगने का मुख्य स्थान था और उसके नाम पर यह वसाड़ का परगना कहलाता था। अब यहां (वसाड़) की वस्ती भी थोड़ी ही रह गई है। वसाड़ में ब्रह्मा की एक प्राचीन मूर्ति है, जो देखने योग्य है।
शेवना के प्राचीन देवी-मन्दिर का भीतरी भाग
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दूसरा अध्याय सीसोदियों से पूर्व के राजवंश
प्रतापगढ़ राज्य की गणना पहले मालवा के अन्तर्गत होती थी,
इसलिए वहां पर पहले मौर्य, मालव, क्षत्रप, गुप्त और हूणों का राज्य रहना
संभव है। अनन्तर प्रतापी राजा यशोधर्मन् और बैसवंशी राजा श्रीहर्ष ने
क्रमशः मालवे पर अधिकार कर लिया तब प्रतापगढ़ राज्य भी उनके अधि-
कार में चला गया होगा, किन्तु अब तक प्रतापगढ़ राज्य से उनका कोई
शिलालेख, ताम्रपत्र या सिक्का नहीं मिला है¹। श्रीहर्ष की मृत्यु के पीछे
कन्नौज के महाराज्य में अव्यवस्था फैल गई। ऐसे समय में भीनमाल के
रघुवंशी प्रतिहारों ने बढ़कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उस समय
मालवा भी प्रतिहारों के अधिकार में चला गया और वे वहां के स्वामी हुए।
प्रतापगढ़ राज्य के घोटार्सों (घोंटवार्षिका) नामक गांव के वि० सं० १००३
(ई० स० ९४६) के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरा) के समय के
शिलालेख से वहां रघुवंशी प्रतिहार नरेशों का राज्य रहना निश्चित है²।
इसलिए यहां पर उनका उल्लेख करना आवश्यक है।
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(१) उपर्युक्त वंशों के इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास;
जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ६८-१६२।
(२) राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर की ई० स० १९१५-१६ की वार्षिक रिपोर्ट;
पृ० २। यह शिलालेख राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है। मैंने इसका
'एपिग्राफ़िया इंडिका' (जि० १४ पृ० १७६-८८) में संपादन किया है। प्रतापगढ़ राज्य
से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री में वहां के प्राचीन इतिहास के लिए यह बड़ा उपयोगी है
एवं रघुवंशी प्रतिहारों का राजपूताने में राज्य होने का समुचित प्रमाण है।
३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास रघुवंशी प्रतिहार 'प्रतिहार' नाम वंशकर्त्ता के नाम से चला हुआ नहीं, किन्तु राज्या- धिकार के पद से बना हुआ शब्द है। राज्य के भिन्न-भिन्न अधिकारियों में एक अधिकारी प्रतिहार होता था, जिसका काम राजा के बैठने के स्थान या रहने के महल के द्वार (ड्योढ़ी) पर रहकर उसकी रक्षा करना था। इस पद के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं किया जाता था, प्रत्युत राजा के विश्वसनीय पुरुष ही इस पद पर नियत होते थे। इसी से प्राचीन शिलालेखादि में ब्राह्मण¹, गुर्जर² (गूजर), ( १ ) विप्रः श्रीहरिचन्द्राख्य ऽ पत्नी भद्रा च क्षत्(त्रि)या ।... तेन श्रीहरिचन्द्रेण परिणीता द्विजात्मजा । द्वितीया क्षत्(त्रि)या भद्रा महाकुलगुणान्विता ॥ प्रतीहारा द्विजा भूता ब्राह्मण्यां येभवन्सुताः । राज्ञी भद्रा च यान्सूते ते भूता मधुपायिनः ॥****** नन्दावल्लं प्रहत्वा रिपुबलमतुलं भूभ्रकूपप्रयातं दृष्ट्वा भग्नां(न्) स्वपक्षां(न्) द्विजनृपकुलजां(न्) सत्प्रतीहारभूपां(न्) मंडोर के राजा बाउक की वि० सं० ८६४ ( ई० स० ८३७ ) की प्रशस्ति । मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १४-५, १६६ । ( २ )***परमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीक्षितिपालदेवपादानु- ध्यातपरमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीविजयपालदेवपादानामभिप्रव- र्द्धमानकल्याणविजयराज्ये संवत्सरशतेषु दशसु षोडशोत्तरकेषु माघमास- सितपक्षत्रयोदश्यां शनियुक्तायामेवं सं० १०१६ माघसुदि १३ शनावद्य श्रीराज्यपुरावस्थितो महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीमथनदेवो महाराजाधिराज- श्रीसावटसूनुर्गूज्जरप्रतिहारान्वयः कुशली । राजोरगढ़ (अलवर राज्य) से मिला हुआ गूजर प्रतिहारों का शिलालेख । एपिग्राफ़िया इंडिका; जि० ३, पृ० २६६ । नागरी प्रचारिणी पत्रिका; जिल्द ६ (वि० सं० १६८५), पृ० ३१६-७ । महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसाद (जयपुर); प्राचीन लेखमाला (प्रथम भाग); पृ० ५३-५।
सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३१ चावड़े¹, परमार², रघुवंशी³ आदि प्रतिहारों के उदाहरण मिलते हैं। विक्रम की आठवीं शताब्दी से रघुवंशी-प्रतिहारों का उत्कर्ष होने लगा और वे बड़े पराक्रम- (१) द्योणिकल्पतरुः समीकसुभ(ग)श्चापोत्कटग्रामणीः योगीन्द्रो नवचंद्रनिर्मलगुणः स्फूर्जत्कलानैपुणः ॥ श्रीचौलुक्यनरेन्द्रवेत्रितिलकः श्रीसोमराजः स्वयं विद्वन्मण्डलमंडनाय तनुते संगीतरत्नावलीम् ॥ ५ ॥ संगीत रत्नावली; ना० प्र० प०, जि० ६, पृ० ३१६ । (२) श्रीमदुत्पलराजादिवंशे प्रामारभूभुजां । अस्ति त्रैलोक्यविख्यातो धारावर्षो महीपतिः ॥ २ ॥ द्वास्थः तस्याभवत् पूर्वं वीरो वारडवंशजः । नरपा[लस]मुद्भूतो हरिपाल इति श्रुतः ॥ ३ ॥ पुत्रस्तस्यास्ति विख्यातो भुवने लब्धविक्रमः । श्रीमत्साहणपालाह्वः वैरिवर्गक्षयंकरः ॥ ४ ॥...... संवत् १२६४ वर्षे चैत्र शुदि १३ गुरौ । म० जालाकप्रेरितेन स्वश्रेयोर्थं प्रती० साहणपालेन देवश्रीवैद्यनाथस्य मंडपः कारितः ॥...। ईडर राज्य के वढाली गांव के वैद्यनाथ शिवालय की प्रशस्ति । पुरातत्व (गुजराती, अहमदाबाद); जि० ४, पृ० २८१ । 'वारड' परमारों की एक शाखा का नाम है और दांता के राणा 'वारड' शाखा के परमार हैं । (३) मन्विद्वाकुकुकुस्थ(त्स्थ)मूलपृथवः दमापालकल्पद्रुमाः ॥ २ ॥ तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रेषु घोरं रामः पौलस्त्यहिन्श्रं (हिंस्रं) क्षतविहितसमित्कर्म्म चक्रे पलाशैः । श्लाघ्यस्तस्यानुजोसौ मघवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये सौमित्रिस्तीव्रदण्डः प्रतिहरणविधेर्य्यः प्रतीहार आसीत् ॥३॥ कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के समय की ग्वालियर की प्रशस्ति । ऐन्युअल रिपोर्ट ऑव् दि आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑव् इण्डिया, ई० स० १६०३-४; पृ० २८० । नागरी प्रचारिणी पत्रिका (नवीन संस्करण); भाग ६, पृ० ३१७ । मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ ।
३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शाली हो गये। तदनन्तर उन्होंने चावड़ों से भीनमाल का राज्य छीन लिया और फिर कन्नौज के महाराज्य को अपने हस्तगत कर वहीं अपनी राजधानी स्थिर की । ग्वालियर से मिले हुए रघुवंशी प्रतिहार राजा भोजदेव (प्रथम) के शिलालेख में, जो वि० सं० ६०० और ६५० (ई० स० ८४३ और ८६३) के बीच का है, लिखा है—"सूर्य-वंश में मनु, इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ आदि राजा हुए। उनके वंश में रावण का संहार करनेवाले रामचन्द्र हुए, जिनका प्रतिहार (ड्योढ़ीवान) उनका छोटा भाई लक्ष्मण था¹।" इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण को प्रतिहार का कार्य मिलने से उसके वंशज प्रतिहार कहलाने लगे। उक्त भोजदेव के पुत्र महेन्द्रपाल (दूसरा) की प्रशंसा में कवि राजशेखर ने अपने ग्रंथों में उसे 'रघुकुलतिलक²', 'रघुग्रामणी³' और 'रघुवंशमुक्तामणि⁴' लिखा है, जिससे सिद्ध है कि वे रघुवंशी थे। इस राजवंश की क्रम-पूर्वक वंशावली नागभट्ट से आरंभ होती है, जो नीचे लिखे अनुसार है— (१) नागभट्ट। (२) ककुत्स्थ (संख्या १ का भतीजा)। (३) देवराज (संख्या २ का छोटा भाई)। (४) वत्सराज (संख्या ३ का पुत्र)। (५) नागभट्ट (दूसरा, संख्या ४ का पुत्र)—उसको नागावलोक भी कहते थे। उसने चक्रायुध को परास्त कर कन्नौज का साम्राज्य भी (१) देखो ऊपर पृ० ३१, टिप्पण ३। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ टि० २। (२) रघुकुलतिलको महेंद्रपालः...। विद्धशाल भंजिका; १।६। (३) देवो यस्य महेंद्रपालनृपतिः शिष्यो रघुग्रामणिः....। बालभारत; १।११। (४) तेन(= श्रीमहीपालदेवेन) च रघुवंशमुक्तामणिना आर्यावर्त- महाराजाधिराजेन श्रीनिर्भयनरेन्द्रनंदनेनाधिकृताः सभासदः...। बालभारत।
सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३३ छीन लिया। उस समय से ही इन भीनमाल के प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज स्थिर हुई। उसने आंध्र, सैंधव, विदर्भ (बरार), कलिंग और बंग के राजाओं को जीता तथा आनर्त, मालव, किरात, तुरुष्क, वत्स और मत्स्य आदि देशों के पहाड़ी क़िले भी ले लिये, ऐसा उपर्युक्त ग्वालियर की प्रशस्ति में लिखा मिलता है। राजपूताने में जिस नाहड़राव पड़िहार का नाम बहुत प्रसिद्ध है और जिसके विषय में पुष्कर में घाट बनवाने की ख्याति चली आती है, वह यही नागभट्ट (नाहड़) होना चाहिये। उसके समय का एक शिलालेख वि० सं० ८७२ (ई० स० ८१५) का बुचकला (जोधपुर राज्य के बिलाड़ा परगने में) से मिला है¹। नागभट्ट का स्वर्गवास वि० सं० ८६० भाद्रपद सुदि ५ (ई० स० ८३३ ता० २३ अगस्त) को हुआ², ऐसा जैन विद्वान् चन्द्रप्रभसूरि ने अपने 'प्रभावकचरित' में लिखा है। (६) रामभद्र (संख्या ५ का पुत्र)। (१) ॰॰॰॰॰॰॰॰संवत्सरशते ८७२ चैत्रस्य सितपक्षस्य पंचम्यां निवेसि(शि)ता महाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीवत्सराजदेवपादानुध्यात- परमभट्टारकमहाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीनागभट्टदेवस्वविषये प्रवर्द्ध- मानराज्ये राज्यघङ्ककडूग्रामे राज्ञी जायावली प्रतिहार स्व(स)गोत्रश्रीबपुक- पुत्रः॰॰॰॰॰। एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० ६, पृ० १६६-२००। (२) विक्रमतो वर्षाणां शताष्टके सनवतौ च भाद्रपदे। शुक्रे सितपंचम्यां चन्द्रे चित्राख्यऋक्षस्थे ॥ ७२० ॥ ... माभूत्संवत्सरोऽसौ वसुशतनवतेर्मा च ऋक्षेषु चित्रा धिग्मासं तं नभस्यं द्वयमपि स खलः शुक्लपक्षोपि यातु। संक्रान्तिर्या च सिंहे विशतु हुतभुजं पंचमी यातु शुक्रे गंगातोयाग्निमध्ये त्रिदिवमुपगतो यत्र नागावलोकः ॥७२५॥ 'प्रभावकचरित' में बप्पभट्टिप्रबंध; पृ० १७७। नागरी प्रचारिणी पत्रिका; भाग ६, पृ० ३२३-२४ टि०। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १८०। ५
(७) भोजदेव (संख्या ६ का पुत्र)—उसको मिहिर और आदि- वराह भी कहते थे। ताम्रपत्र और शिलालेखों के अतिरिक्त उसके चांदी तथा तांबे के सिक्के भी मिले हैं, जिनमें एक तरफ़ 'श्रीमदादिवराह' लेख और दूसरी तरफ़ 'नरवराह' की मूर्ति है। उसके दो तांबे के सिक्के प्रतापगढ़ राज्य से भी हमें मिले हैं। (८) महेंद्रपाल (संख्या ७ का पुत्र)। (६) महीपाल (संख्या ८ का पुत्र)। (१०) भोज (दूसरा, संख्या ६ का भाई)। (११) विनायकपाल (संख्या १० का छोटा भाई)। (१२) महेंद्रपाल (दूसरा, संख्या ११ का पुत्र)—उसके समय के उक्त घोटार्सी के वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ९४६ ता० १७ अक्टूबर) के शिलालेख से प्रकट है कि घोटार्सी के आस-पास का प्रदेश प्रतिहारों के सामन्त चौहानों के अधिकार में था। चौहान इंद्रराज ने, जो गोविंदराज का पुत्र और दुर्लभराज का पौत्र था, घोटार्सी गांव में अपने नाम से 'इंद्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य-मंदिर बनवाया। तब उसके लिए महेंद्रपाल की तरफ़ से 'धारापद्रक' (धरियावद, मेवाड़) नामक गांव तथा उस गांव से पृथक् उत्तर की ओर का कच्छुक नाम का रहँट भेंट किया गया। उसकी सनद पर उस(महेंद्रपाल)के तंत्रपाल (शासक, हाकिम), महासामंत और महादंडनायक माधव ने, जो दामोदर का पुत्र था तथा कार्यवशात् उज्जैन गया था, हस्ताक्षर किये थे। इसी भांति उसपर उस प्रदेश के शासक विदग्ध के भी हस्ताक्षर हुए थे¹। (१) स्वस्ति श्रीमदुज्जयन्त्या(यिन्यां) महासामन्तदण्डनायकश्री- माधवः ॥ तथा मण्डपिकायां परमेश्वरपादोपजीविब(व)लाधी(धि)- कृतश्रीकोक्कटनियुक्तश्रीशम्मे(शर्मणि)च व्यापारं कुर्व्वते इत्यस्मिन् काले वर्तमाने इहैव श्रीमदुज्जयन्त्यां(यिन्यां) कार्याभ्यागततंत्र- (न्त्र)पालमहासामन्तमहादण्डनायकश्रीमाधवेन (धवैः) श्रीदामोदरसुतेन-
सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३५ 'इन्द्रराजादित्यदेव' के मंदिर के साथ लगे हुए या उससे सम्बन्ध रखने- वाले 'वटयक्षिणी देवी' के मंदिर और मठ के लिए भी महेंद्रपाल ने वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० १७ आक्टोबर) को 'खर्प्परपद्रक' (खेरोट, प्रतापगढ़ राज्य) गांव भेंट किया था, जिसकी सनद पर भी उक्त विदग्ध ने हस्ताक्षर किये थे¹। इस 'इंद्राजादित्यदेव' के मंदिर को मेवाड़ (तः) चाहमानान्वयमहा सामन्तश्रीइन्द्रराज(स्य) श्रीदुर्ल्लभराजसुतस्य प्रार्थनया(या)। श्रीविदग्धभोगावाप्तये धारापद्रकग्रामे समुपगतान् सर्व्वराजपुरुषान् ब्रा(ब्रा)ह्मणोत्तरीयान् प्रतिनिवासि(सि)जनपदांश्च वो(बो)धयत्यस्तु वस्संविदितं श्रीमहाकालदेवयतने सुस्नात्वा महादेव- मभ्यर्च्य मातापित्रोरात्मनश्च सुपुण्यकर्म्मयशोभिवृद्धये परलोकहिताय जलचन्द्रचपलजीवितंतेय(लं जीवितमवेत्य) क्षणदृष्टसंपदा(नष्टाः संपदः) समन(समनु)चिन्त्य(चिन्त्य) मीनसंक्रन्तौ(संक्रान्तौ) श्रीनित्यप्रमुदितदेवप्रति[बद्ध]घोंटार्षिकस्थाने श्रीमदिन्द्रादित्यदेवस्य खण्डस्फुटितसमारचनाय व(ब)लिचरुशत्रु(सत्र)प्रवर्त्तनाय ग्रामोयं स्वसीमापर्यन्त(न्तः) सवृक्षमाला[कु]लं(लः) सकाष्ट(ष्ठ)- तृणगोप्रचारं(रः) सजलस्थलसमेतं(तः) चतुष्कंकट(ष्कंटक)- विशुद्ध(द्धः) भागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिस्कंधकमा[र्गा]णाकादि- राजभाव्यैस्सहितं(तः) उदकपूर्वेकेन शासनेन प्रदत्तं(त्तः)॥ मत्वैतदस्मद्वङ्ग्श(द्वंश)जैरन्यैश्च धर्म्ममिदमनुपालनीयं(धर्म्मोयममुपाल- यः)। प्रतिनिवासी(सि)जनपदैश्चाज्ञाश्रवणविधेयैर्भूत्वा यथा दीयमानं च दातव्यं॥ अपरं[चै]तस्मिन्नेव ग्रामे उत्तरतो[दिग्भा]गे साधारं कच्छ[क] नाम अरहटेन तु संयुतं दत्तं। पुनः पत्रमण्डपकिटिकाः पञ्च(ञ्च) शासनेन प्रदत्ताः॥ स्वहस्तोयं श्रीमाधवस्य। स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य॥ एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८२-७। (१) देखो ऊपर पृष्ठ २३ टिप्पण १।
३६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के स्वामी गुहिलवंशी खुम्माण (तृतीय) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट, द्वितीय) ने भी वि० सं० ९९९ श्रावण सुदि १ (ई० सं० ९४२ ता० १७ जुलाई) को पलासकूपिका (पलासिया, मंदसोर से १५ मील दक्षिण में) गांव और वंच्वूलिका नाम का कच्छ (काछा = तर भूमि) भेंट किया था¹। इसी प्रकार चामुंडराज के पुत्र देवराज ने 'इंद्रराजादित्यदेव' के मंदिर को 'कोसवाह' (चड़स से पिलाये जानेवाला) 'छित्तुलाक' नामक क्षेत्र, जिसमें दस माणी अन्न बोया जाता था, भेंट किया था²। (१३) देवपाल (संख्या ६ का पुत्र)। (१४) विजयपाल (संख्या १३ का भाई)। (१५) राज्यपाल (संख्या १४ का भाई)—उसके समय में इन रघुवंशी प्रतिहारों का राज्य अत्यंत निर्बल हो गया। ऐसे समय में हि० स० ४०६ ता० ८ शावान (वि० सं० १०७५ मार्गशीर्ष सुदि १० = ई० स० १०१८ ता० २१ नवम्बर) को सुलतान महमूद ग़ज़नवी ने कन्नौज पर चढ़ाई कर दी, जिसमें उस(राज्यपाल)की हार हुई और वह भाग गया। फिर उसने सुलतान की अधीनता स्वीकार कर संधि कर ली। सुलतान के भारत से लौट जाने के पीछे वि० सं० १०७८ (ई० स० १०२१) में उस(राज्यपाल)- पर कालिंजर के राजा गंड की चढ़ाई हुई, जिसमें वह (राज्यपाल) मारा गया। (१६) त्रिलोचनपाल (संख्या १५ का उत्तराधिकारी)। (१७) यशपाल (?)-उसके समय का वि० सं० १०६३ (ई० स० १०३६) का शिलालेख मिला है। राज्यपाल के समय से ही कन्नौज के (१) देखो ऊपर पृ० २२ टिप्पण संख्या १। (२) ॰॰॰॰॰॰श्रीदेवराजेन श्रीचामुण्डराजसुतः(सुतेन) श्रीमदिन्द्रा- दित्यदेवस्य कोसवाहे छित्तुल्लाकक्षेत्रं माणीवाप १० शासनेन प्रदत्तं। श्रीमदिन्द्रादित्यदेवजगत्यां। त्रैलोक्यमोहनदेवस्य श्रीमदिन्द्राजेन उंडि त्राकक्षेत्रं [अस्य] आघाटा लिख्यंते ॰॰॰॰॰॰॰॰एवं चतुराघाटोपलक्षितं शासनेन प्रदत्तं। एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८७-१८८।
सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३७ प्रतिहार राज्य में निर्बलता आ गई थी, जिसका लाभ उठाकर उसके समय में 'बदायूं' के राष्ट्रकूट (राठोड़) राजाओं में से (जो उन दिनों उधर शक्तिशाली होते जाते थे) भुवनपाल के पुत्र गोपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया, परंतु गोपाल के वंश का वहां अधिक समय तक अधिकार रहना पाया नहीं जाता । शीघ्र ही गाहड़वाल चन्द्रदेव ने, जिसने सारे पांचाल (गंगा और यमुना के बीच का प्रदेश) पर अधिकार जमा लिया था, उधर बढ़- कर कन्नौज के प्रतिहार-राज्य पर अधिकार कर लिया और वहां अपनी राजधानी स्थिर की। इस प्रकार प्रतिहारों के महाराज्य का अन्त हो गया। इन प्रतिहारों के राज्य के उन्नतिकाल में अधिकांश राजपूताना, मालवा, गुजरात, काठियावाड़, सारा पश्चिमोत्तर प्रदेश एवं बिहार का पश्चिमी विभाग भी उनके अधीन था, जहां से उनके शिलालेख, ताम्रपत्र आदि मिलते हैं । फिर उनके राज्य की अवनति के समय उनके सामन्त स्वतंत्र हो गये। अब तो कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहारों के वंश में केवल बुंदेलखंड में नागोद का राज्य एवं अलिपुरा का ठिकाना तथा कुछ और छोटे-छोटे ठिकाने रह गये हैं । भाटों की पुस्तकों में नागोद के राजाओं की जो वंशावली मिलती है, उसमें सब पुराने नाम कृत्रिम हैं। परमार तथा सोलंकी कन्नौज के प्रतिहार-राज्य का पतन होने पर मालवे के परमार, जो संभवतः प्रतिहारों के सामंत थे, स्वाधीन नृपति बन गये । उनमें श्रीहर्ष, मुंज, सिंधुराज, भोज, उदयादित्य आदि प्रतापी और विद्वान् राजा हुए। अनन्तर उदयादित्य के पुत्र नरवर्मा और पौत्र यशोवर्मा के समय गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की मालवे पर चढ़ाइयां होने लगीं। नरवर्मा तो सोलंकियों के साथ की लड़ाई में मारा गया, पर यशो- वर्मा के समय परमार पराजित हो गये और मालवे पर सोलंकियों का अधिकार हो गया संभव है कि मालवे के कुछ भूमि-भाग पर सोलंकियों के समय भी परमारों ने किसी प्रकार अपना अधिकार रक्खा हो,
३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास क्योंकि उस समय भी मालवे में परमारों के ठिकाने थे¹ । सिद्धराज जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के समय तक सोलंकियों का प्रताप बढ़ता रहा। वि० सं० १२३० (ई० स० ११७३) के लगभग कुमारपाल का देहांत हो जाने पर गुजरात के प्रतापी सोलंकी राज्य की भी अवनति होने लगी और उसके सामंत स्वतंत्र हो गये । कुमारपाल के उत्तराधिकारी अजयपाल और उसके द्वितीय पुत्र भीमदेव (दूसरा, भोला भीम) के समय तो परमार पुनः इतने बलवान हो गये थे कि उन्होंने सोलंकियों को मालवे से निकालने की ठान ली। फलतः उपर्युक्त यशोवर्मा के पौत्र विंध्यवर्मा के समय परमारों और सोलंकियों के बीच युद्ध छिड़- गया, परंतु विंध्यवर्मा को इसमें सफलता नहीं हुई । विंध्यवर्मा की मृत्यु होने पर उसके पुत्र सुभटवर्मा ने गुजरातवालों से युद्ध जारी रखा । उसके समय में मालवे के परमार पुनः स्वतंत्र हो गये और उन्होंने वहां से सोलं- कियों का अधिकार बिलकुल उठा दिया² । विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हो गया और फिर उनके मालवे पर आक्रमण होने लगे, परंतु उनका वहां स्थिर रूप से अधिकार नहीं हुआ । मालवे में इस (परमार) वंश का अंतिम राजा जयसिंह (चतुर्थ) हुआ, जिसके दो शिलालेख वि० सं० १३२६ और १३६६ (ई० स० १२६६ और १३०६) के मिले हैं, जिनसे निश्चित है कि उस समय तक मालवे में उनका थोड़ा बहुत राज्य अवश्य था। अनन्तर सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवे पर आक्रमण कर वहां पर अधिकार कर लिया । तब से मालवे का मुख्य राज्य परमारों के हाथ से निकल गया, परंतु वहां ऊमटवाड़े का इलाक़ा अब भी परमारों की अधीनता में चला आता है एवं नरसिंहगढ़ तथा राजगढ़ दो राज्य वहां परमारों के विद्यमान हैं। मरहटों के समय में (१) परमारों के विस्तृत वर्णन के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १६०-२३८ । (२) सोलंकियों के विशद इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; ज़िल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० २३८-२६१ ।