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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 534 में से

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३८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास क्योंकि उस समय भी मालवे में परमारों के ठिकाने थे¹ । सिद्धराज जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के समय तक सोलंकियों का प्रताप बढ़ता रहा। वि० सं० १२३० (ई० स० ११७३) के लगभग कुमारपाल का देहांत हो जाने पर गुजरात के प्रतापी सोलंकी राज्य की भी अवनति होने लगी और उसके सामंत स्वतंत्र हो गये । कुमारपाल के उत्तराधिकारी अजयपाल और उसके द्वितीय पुत्र भीमदेव (दूसरा, भोला भीम) के समय तो परमार पुनः इतने बलवान हो गये थे कि उन्होंने सोलंकियों को मालवे से निकालने की ठान ली। फलतः उपर्युक्त यशोवर्मा के पौत्र विंध्यवर्मा के समय परमारों और सोलंकियों के बीच युद्ध छिड़- गया, परंतु विंध्यवर्मा को इसमें सफलता नहीं हुई । विंध्यवर्मा की मृत्यु होने पर उसके पुत्र सुभटवर्मा ने गुजरातवालों से युद्ध जारी रखा । उसके समय में मालवे के परमार पुनः स्वतंत्र हो गये और उन्होंने वहां से सोलं- कियों का अधिकार बिलकुल उठा दिया² । विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के मध्य में दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार हो गया और फिर उनके मालवे पर आक्रमण होने लगे, परंतु उनका वहां स्थिर रूप से अधिकार नहीं हुआ । मालवे में इस (परमार) वंश का अंतिम राजा जयसिंह (चतुर्थ) हुआ, जिसके दो शिलालेख वि० सं० १३२६ और १३६६ (ई० स० १२६६ और १३०६) के मिले हैं, जिनसे निश्चित है कि उस समय तक मालवे में उनका थोड़ा बहुत राज्य अवश्य था। अनन्तर सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवे पर आक्रमण कर वहां पर अधिकार कर लिया । तब से मालवे का मुख्य राज्य परमारों के हाथ से निकल गया, परंतु वहां ऊमटवाड़े का इलाक़ा अब भी परमारों की अधीनता में चला आता है एवं नरसिंहगढ़ तथा राजगढ़ दो राज्य वहां परमारों के विद्यमान हैं। मरहटों के समय में (१) परमारों के विस्तृत वर्णन के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १६०-२३८ । (२) सोलंकियों के विशद इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; ज़िल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० २३८-२६१ ।