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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 534 में से

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पृष्ठ 82

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३६ पेशवाओं ने अपने सेनापति ऊदाजी पंवार को मालवे का कुछ इलाक़ा जागीर में दिया, जिसका मालवे के परमारों की मुख्य शाखा में होना प्रसिद्ध है। उसके वंश में अब धार और देवास के राज्य हैं। परमारों और सोलंकियों के अभ्युदय के समय वागड़, मेवाड़ और सुप्रसिद्ध चित्तौड़ दुर्ग पर उनका अधिकार होना निश्चित है । इस अवस्था में प्रतापगढ़ राज्य का—जो मालवा, वागड़ और मेवाड़ की सीमा के किनारे पर स्थित है—परमारों और सोलंकियों के अधिकार से मुक्त रहना असंभव है, परन्तु प्रतापगढ़ राज्य से परमारों और सोलंकियों के शिलालेख, दानपत्र, सिक्के आदि कुछ भी नहीं मिले हैं। अतएव यहां परमारों और सोलंकियों के शासनकाल के इतिहास पर प्रकाश डालना अनावश्यक है। ग्वालियर राज्य के नीमच ज़िले के जीरण क़सबे में देवलिया-प्रतापगढ़ राज्य के स्वामी महारावत भानुसिंह(भाना) की स्मारक छत्री बनी हुई है, उसके स्तंभों पर गुहिलवंशी विग्रहपाल के वि० सं० १०५३, १०६५ और १०६६ के चार लेख खुदे हुए हैं, जिनमें उसकी उपाधि 'महासामंताधिपति' लिखी है और उसका नागह्रद (नागदा) से निकलना पाया जाता है। इससे विदित होता है कि उस समय वहां मेवाड़ के गुहिलवंशियों का अधिकार था और संभव है कि देवलिया (प्रतापगढ़) के आस-पास उनका अधिकार रहा हो एवं वहां के गुहिलवंशी परमारों के सामंत हों। जीरण से ही मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के राज्य-काल का वि० सं० १६१७ आषाढ वदि ११ (ई० स० १५६० ता० १६ जून) का लेख मिला है, जिसमें आल्हण की स्त्री-द्वारा एक मन्दिर के जीर्णोद्धार कराये जाने का उल्लेख है। मुसलमान शासक मालवे पर सबसे पहले दिल्ली के सुलतान शम्सुद्दीन अल्तमश ने हि० स० ६२४ (वि० सं० १२८३ = ई० स० १२२६) में चढ़ाई की थी।