राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'४० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तदनन्तर नासिरुद्दीन मुहम्मदशाह के समय उज्जैन, भेलसा आदि नगर मुसलमानों ने विजय किये, किन्तु मालवे पर उस समय उनका अधिकार स्थिर रूप से जमना पाया नहीं जाता। गुलाम वंश का अन्त होने पर दिल्ली के सिंहासन पर खिलजी-वंशियों का, अधिकार हुआ। तब हि० स० ६६० (वि० सं० १३४८ = ई० स० १२६१) में उक्त वंश के प्रथम सुलतान जलालुद्दीन फ़ीरोज़शाह खिलजी ने आक्रमण कर मालवे के कुछ प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। हि० स० ७०४ (वि० सं० १३६१ = ई० स० १३०४) में सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने सेना भेजकर मालवे का पूर्वी भाग भी ले लिया। फिर उक्त सुलतान ने विजित प्रदेश के प्रबंध के लिए मांडू, उज्जैन और धार में अपने हाकिम नियत किये। 'मिरात-इ- सिकंदरी' से पाया जाता है कि सुलतान मुहम्मद तुग़लक़ ने हि० स० ७४४ (वि० सं० १४०० = ई० स० १३४३) के आस-पास मालवे का सारा इलाक़ा अज़ीज़ हिमार को सौंप दिया था, जो पहले धार का ही हाकिम था। फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ के तीसरे पुत्र मुहम्मदशाह तुग़लक़ (वि० सं० १४४६-५० = ई० स० १३८६-६४) के समय दिलावरखां (दिलावरशाह गोरी, जिसका नाम अभीशाह भी लिखा मिलता है) मालवे का हाकिम नियत हुआ, जो दिल्ली के सुलतानों की अधीनता में वहां का शासन-प्रबंध करता था। महमूदशाह तुग़लक़ के समय तुग़लक़-वंश का प्रभाव घट जाने पर दिलावरखां ने वि० सं०१४५८(ई० स० १४०१) के लगभग स्वतंत्र होकर अपने को मालवे का सुलतान घोषित किया। उस (दिलावरखां) के पीछे होशंग (अल्पखां) और मुहम्मद (गज़नीखां) गोरी मालवे के सुलतान हुए। फिर खिलजी-वंश का महमूदशाह वहां का सुलतान हुआ, जो होशंग का एक सरदार था। महमूदशाह मेवाड़ के महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) का समकालीन था। उन्हीं दिनों महाराणा कुंभकर्ण से विरोध हो जाने के कारण उसका छोटा भाई क्षेमकर्ण, जो प्रतापगढ़वालों का पूर्वज था, सुलतान महमूद के पास चला गया और उक्त महाराणा की मृत्यु पर्यन्त