राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीसोदियों के पूर्व के राजवंश ४१ वहीं रहा। वि० सं० १५३२ (ई० स० १४७५) में महमूदशाह की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गयासशाह (गयासुद्दीन) मालवे का सुलतान हुआ। प्रतापगढ़ राज्य में देवलिया के पास गयासपुर नामक प्राचीन गांव है, जिसका गयासशाह के नाम पर बसाया जाना पाया जाता है। उस समय गयासपुर सम्पन्न था और देवलिया परगने का मुख्य स्थान था, जिससे देवलिया परगना पहले गयासपुर का परगना कहलाता था। प्रतापगढ़ राज्य के अरणोद ठिकाने के निकट गौतमेश्वर नामक शिवालय है। वहां के वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ (ई० स० १५०५ ता० १ जून) के शिलालेख से प्रकट है कि उस समय वहां सुलतान नासिरशाह का आधि- पत्य था और खानआलम मक़बलखां वहां का शासक था। उसी समय के आस-पास उपर्युक्त क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल ने मेवाड़ से जाकर देवलिया (प्रतापगढ़) राज्य की नींव डाली। नासिरशाह के पीछे उसका पुत्र महमूदशाह (दूसरा) खिलजी वि० सं० १५६८ (ई० स० १५११) में मालवे का स्वामी हुआ। उस (मह- मूदशाह) को हि० स० ६३७ (वि० सं० १५८७ = ई० स० १५३०) में गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने पकड़कर मालवे को गुजरात-राज्य में मिला लिया, किन्तु वह (बहादुरशाह) स्थिरतापूर्वक मालवे को अपने अधिकार में न रख सका और हि० स० ६४१ (वि० सं० १५६१ = ई० स० १५३४) में दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं से हारकर मालवा तथा गुजरात के राज्यों को खो बैठा एवं स्वयं दीव के बंदरगाह से लौटता हुआ मारा गया। बहादुरशाह को परास्तकर बादशाह हुमायूं ने मालवा अपने अधि- कार में कर लिया। इतने में बंगाल में शेरशाह सूर का उपद्रव खड़ा होने की ख़बर सुनकर वह उधर रवाना हुआ, परंतु शेरशाह से उसकी हार हुई। यह खबर जब मालवे में पहुंची तो मल्लूखां, जो खिलजियों का गुलाम था, हुमायूं के सरदारों को निकालकर सुलतान क़ादिर के नाम से वि० सं० १५६२ (ई० स० १५३५) में वहां का स्वामी हो गया। शेरशाह ने दिल्ली ६