भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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४२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास का स्वामी होने के पीछे हि० स० ९४६ ( वि० सं० १५६६ = ई० स० १५४२) में उस (कादिर) को परास्तकर मालवे को पुनः दिल्ली की अमलदारी में दाख़िल किया और शुजाखां को वहां का प्रबंधकर्ता बनाया। सूरवंश के अंतिम सुलतान मुहम्मदशाह के समय दिल्ली के पठान सुलतानों की सत्ता निर्बल हो गई, तब शुजाखां भी मालवे का स्वतंत्र सुलतान बन गया और राजधानी मांडू को छोड़कर सारंगपुर में रहने लगा । फिर उस- (शुजाखां) के पुत्र बाज़बहादुर से वि० सं० १६१६ ( ई० स० १५६२) के लगभग बादशाह अकबर ने मालवा पीछा छीनकर मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया। उन्हीं दिनों सूरजमल के प्रपौत्र विक्रमसिंह (बीका) ने मेवाड़ में अपनी सादड़ी की जागीर का, जो उसके पूर्वजों के पास चली आती थी, सदा के लिए परित्याग कर स्थिरतापूर्वक कांठल में ही सूरजमल-द्वारा संस्थापित नवराज्य को अपने आधिपत्य में रखते हुए वहां की स्थिति सुदृढ़ की।