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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 534 में से

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पृष्ठ 86

तीसरा अध्याय महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह (बीका) तक प्रतापगढ़ के स्वामी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। गुहिलवंश की सीसोदिया शाखा के चित्तोड़ (मेवाड़) के राजवंश से उनका क्षेमकर्ण से पूर्व के निकास हुआ है, जिसका वर्णन हमने उदयपुर राज्य गुहिलवंशी नरेश के इतिहास में किया है। उनकी उपाधि 'महारावत' है। अन्य राजवंशों की भांति गुहिलवंश का विक्रम की सातवीं शताब्दी के पूर्व का इतिहास अंधकार में है और उसके बाद भी कुछ पीढ़ियों का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता, तो भी प्राचीन शोध से जो कुछ सामग्री प्राप्त हुई है, उसके आधार पर यह निश्चित है कि संसार के वर्तमान राजवंशों में यही एक राजवंश ऐसा है, जो अनुमान चौदह सौ वर्षों से एक ही स्थान पर राज्य करता चला आ रहा है। इसका विशेष परिचय उदयपुर राज्य के इतिहास में दिया गया है, तथापि इतिहास का क्रम मिलाने के लिए हम यहां पर गुहिलोत और सीसोदिया वंश का प्राचीन इतिहास संक्षेप में देते हैं, ताकि प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास के पाठकों को उक्त राजवंश के प्राचीन इतिहास की श्रृंखला की कुछ-कुछ जानकारी हो जाय। गुहिलवंश का इतिहास गुहिल से प्रारंभ होता है। ई० स० १८६६ (वि० सं० १६२६) में मि० कार्लाइल को आगरे के समीप भूमि में गड़े हुए चांदी के २००० से अधिक सिक्के मिले, जिनपर 'श्रीगुहिल' लेख है। इससे अनुमान किया जाता है कि गुहिल का उधर भी राज्य होगा और उसके सिक्के दूर-दूर तक चलते होंगे। जयपुर राज्य के चाटसू गांव में गुहिलवंशी राजाओं का वि० सं० १००० के आस-पास का शिलालेख मिला है, जिससे