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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 534 में से

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[Page Header] ४४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

निश्चित है कि उधर भी उनका राज्य था। गुहिल के पांचवें वंशधर शीलादित्य (शील) का मेवाड़-राज्य के भोमट ज़िले के सामोली गांव से वि० सं० ७०३ (ई० स० ६४६) का शिलालेख तथा कुछ सिक्के और उसके उत्तराधिकारी अपराजित का एकलिंगजी के निकटवर्ती कुंडा गांव से वि० सं० ७१८ (ई० स० ६६१) का शिलालेख मिला है, जिससे सिद्ध होता है कि मेवाड़ के वर्तमान राजवंश के पूर्वपुरुष गुहिल (गोभिल, गोहिल, गुहदत्त, गुहादित्य) अथवा शील से पूर्व उसके किसी पूर्वज ने मेवाड़ की तरफ़ बढ़कर वहां अपना राज्य स्थिर किया हो। शील का क्रमानुयायी अपराजित शक्तिशाली राजा था। उपर्युक्त कुंडा के लेख से स्पष्ट है कि अपराजित ने सब दुष्टों का नाश किया और अनेक राजा उसके आगे सिर झुकाते थे। तदनंतर महेंद्र और फिर कालभोज हुआ, जो बापा या बापा रावल के नाम से प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध है कि बापा ने मौर्यों से चित्तौड़ का दुर्ग ले लिया था और दूर-दूर तक अपनी विजय-ध्वजा फहराई थी। वि० सं० ८१० (ई० स० ७५३) में बापा ने राज्य त्यागकर संन्यास ग्रहण किया। उसकी समाधि एकलिंगजी के पास विद्यमान है। बापा की राजधानी एकलिंगजी के निकट नागदा (नागह्रद) थी, जिसके नाम से गुहिलवंशी 'नागदे' भी कहलाते हैं। वहां जो मंदिरों आदि के ध्वंसावशेष विद्यमान हैं, उनसे पाया जाता है कि वह उस समय समृद्ध नगर था। कालभोज के पीछे खुंमाण, मत्तट, भर्तृभट्ट, सिंह, खुंमाण (दूसरा), महायक और भर्तृभट्ट (दूसरा) क्रमशः मेवाड़ के राजा हुए। प्रतापगढ़ से प्राप्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) की वि० सं० १००३ (ई० स० ९४६) की प्रशस्ति के एक अंश से पाया जाता है कि भर्तृभट्ट (दूसरा) ने वि० सं० ९९९ श्रावण सुदि १ (ई० स० ९४२ ता० १७ जुलाई) को घोंटवार्षिका (घोटार्सों) गांव के इंद्रराजादित्य नामक सूर्य-मंदिर को पलासकूपिका (पलासिया, मेवाड़) गांव का वंव्वलिका नामक क्षेत्र भेंट किया। इससे यह अनुमान होना स्वाभाविक है कि वर्तमान प्रतापगढ़ राज्य का निकटवर्ती प्रदेश भर्तृभट्ट के राज्यान्तर्गत रहा हो।

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