राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह (बीका) तक ४५
: भर्तृभट्ट (दूसरा) के पीछे अल्लट, नरवाहन और शालिवाहन नामक राजा हुए। शालिवाहन के वंशजों ने खेड़(मारवाड़ राज्य) की तरफ़ जाकर वहां अधिकार किया। वहां से काठियावाड़ की तरफ़ बढ़कर वहां उन्होंने धीरे-धीरे अपने वंशजों के लिए भावनगर, पालीताणा आदि गोहिल-राज्यों की स्थापना कर ली। शालिवाहन की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र शक्ति- कुमार मेवाड़ का स्वामी हुआ। उपर्युक्त भर्तृभट्ट (दूसरा) से शक्तिकुमार तक पांच राजाओं का राज्यकाल वि० सं० ९९६-१०३४ (ई० स० ६४२- ९७७) तक निश्चित है। उस( शक्तिकुमार) के समय राजधानी आघाटपुर (आहाड़, जो उदयपुर से १ १/२ मील दूर है) भी रही, जिसको मालवे के परमार राजा मुंज ने तोड़ा था। परमारों के इस आक्रमण से मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की स्थिति निर्बल हो गई और चित्तौड़ उनके अधिकार से चला गया। वहां मुंज के छोटे भाई सिंधुराज के पुत्र प्रसिद्ध विद्यानुरागी राजा भोज का बनवाया हुआ 'त्रिभुवन-नारायण' का मंदिर है, जिसको मोकलजी और अद्भुत (अद्बद्) जी का मंदिर भी कहते हैं। शक्ति- कुमार का क्रमानुयायी अंबाप्रसाद हुआ, जो सांभर के चौहान राजा वाक्पतिराज के हाथ से मारा गया। : तदनन्तर शुचिवर्मा, नरवर्मा, कीर्तिवर्मा, योगराज, बैरट, हंसपाल, वैरसिंह, विजयसिंह, अरिसिंह, चोड़सिंह, विक्रमसिंह और रणसिंह (कर्णसिंह) नामक राजा हुए। रणसिंह से इस राजवंश की दो शाखाएं फंटीं-एक रावल और दूसरी राणा शाखा। रावल शाखा में प्रमुख क्षेमसिंह था, जिसके पुत्र सामंतसिंह और कुमारसिंह हुए। क्षेमसिंह के छोटे भाई माहप और राहप थे, जिनकी उपाधि 'राणा' हुई और उनको सीसोदे की जागीर मिली। इससे उनके वंशज सीसोदिया कहलाने लगे। उसी समय के आसपास गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह के मालवे का राज्य विजय कर लेने पर चित्तौड़ का दुर्ग भी उसके अधिकार में चला गया। क्षेमसिंह के पीछे सामंतसिंह मेवाड़ का स्वामी हुआ। उसने गुजरात के सोलंकी राजा अजयपाल को युद्ध में बुरी तरह से