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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह (बीका) तक ४५

: भर्तृभट्ट (दूसरा) के पीछे अल्लट, नरवाहन और शालिवाहन नामक राजा हुए। शालिवाहन के वंशजों ने खेड़(मारवाड़ राज्य) की तरफ़ जाकर वहां अधिकार किया। वहां से काठियावाड़ की तरफ़ बढ़कर वहां उन्होंने धीरे-धीरे अपने वंशजों के लिए भावनगर, पालीताणा आदि गोहिल-राज्यों की स्थापना कर ली। शालिवाहन की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र शक्ति- कुमार मेवाड़ का स्वामी हुआ। उपर्युक्त भर्तृभट्ट (दूसरा) से शक्तिकुमार तक पांच राजाओं का राज्यकाल वि० सं० ९९६-१०३४ (ई० स० ६४२- ९७७) तक निश्चित है। उस( शक्तिकुमार) के समय राजधानी आघाटपुर (आहाड़, जो उदयपुर से १ १/२ मील दूर है) भी रही, जिसको मालवे के परमार राजा मुंज ने तोड़ा था। परमारों के इस आक्रमण से मेवाड़ के गुहिलवंशी राजाओं की स्थिति निर्बल हो गई और चित्तौड़ उनके अधिकार से चला गया। वहां मुंज के छोटे भाई सिंधुराज के पुत्र प्रसिद्ध विद्यानुरागी राजा भोज का बनवाया हुआ 'त्रिभुवन-नारायण' का मंदिर है, जिसको मोकलजी और अद्भुत (अद्बद्) जी का मंदिर भी कहते हैं। शक्ति- कुमार का क्रमानुयायी अंबाप्रसाद हुआ, जो सांभर के चौहान राजा वाक्पतिराज के हाथ से मारा गया। : तदनन्तर शुचिवर्मा, नरवर्मा, कीर्तिवर्मा, योगराज, बैरट, हंसपाल, वैरसिंह, विजयसिंह, अरिसिंह, चोड़सिंह, विक्रमसिंह और रणसिंह (कर्णसिंह) नामक राजा हुए। रणसिंह से इस राजवंश की दो शाखाएं फंटीं-एक रावल और दूसरी राणा शाखा। रावल शाखा में प्रमुख क्षेमसिंह था, जिसके पुत्र सामंतसिंह और कुमारसिंह हुए। क्षेमसिंह के छोटे भाई माहप और राहप थे, जिनकी उपाधि 'राणा' हुई और उनको सीसोदे की जागीर मिली। इससे उनके वंशज सीसोदिया कहलाने लगे। उसी समय के आसपास गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह के मालवे का राज्य विजय कर लेने पर चित्तौड़ का दुर्ग भी उसके अधिकार में चला गया। क्षेमसिंह के पीछे सामंतसिंह मेवाड़ का स्वामी हुआ। उसने गुजरात के सोलंकी राजा अजयपाल को युद्ध में बुरी तरह से

४६. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

घायल किया, जिसपर गुजरातवालों ने उक्त हार का बदला लेने के लिए सामन्तसिंह पर चढ़ाई की । उस समय सामंतसिंह के सरदार उससे विद्रोही हो गये थे, अतएव उस (सामंतसिंह) को सोलंक्तियों के मुक़ाबले में परास्त होना पड़ा और वह मेवाड़ छोड़कर वागड़ में चला गया । वहां उसने गुहिल-राज्य की वि० सं० १२३६ (ई० स० ११७६) के पूर्व स्थापना कर बड़ोदा (वटपद्रक) में अपनी राजधानी नियत की । फिर महारावल डूंगरसिंह के समय डूंगरपुर आबाद होकर वही वागड़ की राजधानी हुई। तदनन्तर महारावल उदयसिंह (प्रथम) ने अपने राज्य के दो विभाग कर ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को राजधानी डूंगरपुर-सहित वागड़ का पश्चिमी भाग और छोटे पुत्र जगमाल को वागड़ का पूर्वी भाग दिया, जिसकी राजधानी बांसवाड़ा है। सामंतसिंह के अधिकार से मेवाड़ का राज्य निकल जाने पर उसके छोटे भाई कुमारसिंह ने सोलंक्तियों को प्रसन्न कर पुनः मेवाड़ का राज्य पाया। उसके पीछे मथनसिंह, पद्मसिंह और जैत्रसिंह क्रमशः मेवाड़ के राजा हुए। जैत्रसिंह वीर राजा था। उसकी गुजरात के सोलंक्तियों, नाडोल के चौहानों और मालवे के परमारों के साथ लड़ाइयां हुईं, जिनमें उसकी विजय हुई। अपने शत्रुओं को परास्तकर जैत्रसिंह ने चित्तौड़ पर पीछा मेवाड़ का अधिकार स्थापित किया। जैत्रसिंह के पीछे तेजसिंह, समरसिंह और रत्नसिंह क्रमशः मेवाड़ के स्वामी हुए। रत्नसिंह ने केवल एक वर्ष तक राज्य किया । उसके समय में दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ पर चढ़ाई हुई, जिसमें रत्नसिंह मारा गया और चित्तौड़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। रत्नसिंह के साथ चित्तौड़ की रावल शाखा की समाप्ति हुई । वि० सं० १३८२ (ई० स० १३२५) के आस- पास सीसोदे के राणा हम्मीरसिंह ने चित्तौड़ पीछा अपने अधीन किया। तब से चित्तौड़ पर गुहिलवंश की सीसोदिया शाखा का राज्य स्थिर हुआ । हम्मीरसिंह के पीछे क्रमशः क्षेत्रसिंह (खेता), लक्षसिंह (लाखा) और मोकल चित्तौड़ के स्वामी हुए। मोकल ने नागोर पर चढ़ाई कर फ़ीरोज़खां दंदानी

महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह ( बीका ) तक ४७ की सेना को नष्ट किया। सांभर, जालोर आदि विजय कर उसने अपने बाहुबल से गुजरात के सुलतान अहमदशाह को परास्त किया। हाड़ों से उसने जहाज़पुर छीना लिया था और मंडोवर का राज्य राव रणमल को दिलवाया था। वह बड़ा दानी था। उसने सोने और चांदी के २५ तुलादान किये, जिनमें से एक स्वर्ण तुलादान पुष्कर के आदिवराह के मंदिर में किया था। जो ब्राह्मण कृषक हो गये थे, उनके लिए उसने सांग (छः अंगों- सहित) वेद पढ़ाने की व्यवस्था की थी। उसके कुंभकर्ण (कुंभा), क्षेमकर्ण (खींवा) आदि सात पुत्र हुए। उनमें से कुंभकर्ण मेवाड़ का स्वामी हुआ, जिसके वंशधर मेवाड़ के महाराणा हैं और क्षेमकर्ण के वंशज प्रतापगढ़ के महारावत हैं, जिनका सविस्तर वर्णन आगे किया जायगा। क्षेमकर्ण ( क्षेमसिंह ) क्षेमकर्ण (जिसके दूसरे नाम क्षेमसिंह, खेमा या खींवा भी मिलते हैं) का जन्म महाराणा मोकल की सोलंकिनी राणी केसरकुंवरी के, जो राव क्षेमकर्ण का जन्म सोढ़ा की पुत्री और सांतल की पौत्री थी, उदर से हुआ था। वि० सं० १४६० (ई० स० १४३३) में महाराणा मोकल गुजरात के सुलतान अहमदशाह को दबाने के लिए चित्तौड़ से रवाना हुआ और झीलवाड़े की तरफ़ जाता हुआ बागोर के मुक़ाम पर महाराणा कुंभकर्ण और अपने पितामह महाराणा क्षेत्रसिंह (खेता) के दासी- क्षेमकर्ण के बीच विरोध होना पुत्र चाचा और मेरा के हाथ से मारा गया। तब उसका ज्येष्ठ पुत्र कुंभकर्ण (कुंभा) मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। फिर महाराणा कुंभकर्ण ने अपने छोटे भाइयों को प्रचलित रीति के अनुसार जागीरें देकर पृथक् करना चाहा। क्षेमकर्ण के लिए उसने जो जागीर निकाली, वह उस (क्षेमकर्ण) को पसंद नहीं हुई, क्योंकि वह उसके पद और मान-मर्यादा की दृष्टि से अपर्याप्त थी। ( १ ) उदयपुर राज्य के बड़वा देवीदान की ख्यात।

४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महाराणा कुंभकर्ण और क्षेमकर्ण सौतेले भाई थे, इसलिए उन दोनों के बीच परस्पर प्रेम में कमी होना स्वाभाविक बात थी। अब इस जागीर के बखेड़े ने और भी द्वेष बढ़ा दिया। निदान अप्रसन्न होकर क्षेमकर्ण ने चित्तोड़ का परित्याग कर दिया और अपने राजपूतों की सहायता से उसने मेवाड़ में बड़ी सादड़ी¹ तथा उसके आस-पास का समग्र प्रदेश बल- पूर्वक अपने अधिकार में कर लिया²। महाराणा कुंभकर्ण को क्षेमकर्ण की यह बात सहन नहीं हुई और उसने अपनी सेना भेज सादड़ी और उसके समीप का प्रदेश उससे छीन लिया³। मेवाड़ में महाराणा द्वारा सादड़ी आदि ले लिये जाने पर क्षेमकर्ण मालवे के सुलतान महमूद ख़िलजी⁴ के पास चला (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में कहीं-कहीं वि० सं० १४७४ (ई० स० १४१७) में क्षेमकर्ण को सादड़ी की जागीर मिलने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है क्योंकि उस समय तो उसका पितामह महाराणा लखसिंह (लाखा) विद्यमान था। संभव है कि ख्यात लेखकों ने यहां ग़लती खाई हो और वि० सं० १४६४ (ई० स० १४३७) के स्थान में १४७४ लिख दिया हो। जब उस (क्षेमकर्ण) को महाराणा ने सादड़ी की जागीर दे दी थी, तो फिर परस्पर विरोध होने का कोई कारण नहीं हो सकता। संभव तो यही है कि क्षेमकर्ण ने वि० सं० १४६४ (ई० स० १४३७) में महाराणा की इच्छा के विरुद्ध सादड़ी पर अधिकार किया हो। मुंहणोत नैणसी की ख्यात में क्षेमकर्ण का 'तेजमाल की सादड़ी' पर अधिकार होना लिखा है (जि० १, पृ० ६३), जो उदयपुर से ५० मील दक्षिण-पूर्व में है। यह मेवाड़ में सोलह उमरावों (प्रथम वर्ग) का ठिकाना है और प्रतिष्ठा में सर्वोपरि है। यहां के सरदार झाला हैं और उनकी ख्यात में लिखा है कि महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) ने झाला राज देदा को सादड़ी का पट्टा प्रदान किया था। इसके पूर्व उसके पूर्वजों की जागीर दूसरी थी। (२) महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास; वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५३। (३) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०५३। (४) यह अज़ीम हुमायूं का पुत्र और ग़ोरी ख़ानदान के मांडू के सुलतान होशंग का सरदार था। वि० सं० १४६३ (ई० स० १४३६) में होशंग के पौत्र और

महारावत क्षेमकर्ण ४६

क्षेमकर्ण का मालवे के सुलतान के पास जाना गयो, जहां पहले महाराणा मोकल के समय अप्रसन्न होकर महाराणा लक्षसिंह (लाखा) के ज्येष्ठ पुत्र चूंडा और अज्जा सुलतान होशंग के पास जाकर रहे थे। महमूद खिलजी और महाराणा कुंभकर्ण के बीच वैमनस्य था, क्योंकि उस (महमूद) को महाराणा ने चढ़ाई कर क़ैद कर लिया था। अतएव क्षेमकर्ण के रुष्ट होकर जाने पर सुलतान ने महाराणा को चिढ़ाने एवं उस (महाराणा) की कमज़ोरियों का भेद पाने की दृष्टि से उसको अपने यहां रख लिया। महमूद, महाराणा से अपनी पूर्व पराजय का बदला लेना चाहता था। इसलिए उसने वि० सं० १५००, १५०३, १५११ और १५१३ (ई० स० क्षेमकर्ण का मेवाड़ पर मालवे के सुलतान को चढ़ा लाना १४४३, १४४६, १४५४ और १४५६) में मेवाड़ पर आक्रमण किये। उसने गुजरात के सुलतान क़ुतबुद्दीन को भी अपनी तरफ़ मिलाकर संयुक्त सेना के साथ पृथक्-पृथक् मार्ग से मेवाड़ पर चढ़ाइयां कीं, परन्तु इससे महाराणा की शक्ति न घटी और उन्हें हानि उठाकर लौटना पड़ा। महमूद के मेवाड़ के

शज़नीख़ां (मुहम्मदशाह) के पुत्र मसऊद को, जिसको दूसरे सरदार मुहम्मदशाह की मृत्यु पर गद्दी देना चाहते थे, हटाकर यह मालवे का सुलतान बन गया। वि० सं० १५३२ (ई० स० १४७५) में इसकी मृत्यु हुई (डफ़; दि क्रोनोलोजी ऑफ़् इंडिया; पृ० २६२)। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५४। मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में लिखा है कि जब राणा कुंभा गद्दी पर बैठा, तो दोनों भाइयों में परस्पर भूमि के लिए विरोध उत्पन्न हो गया। खेमा मांडू के सुलतान के पास पहुंचा और वहां से सैनिक सहायता प्राप्त कर उसने मेवाड़ को बड़ा धक्का पहुंचाया। राणा कुम्भा और खेमा में विरोध बना रहा, परंतु राणा उसको मेवाड़ से बाहर न निकाल सका। अंत में दोनों का इसी स्थिति में देहांत हो गया (प्रथम भाग, पृ० ६३-४)। नैणसी का उपर्युक्त कथन कि 'राणा उसको मेवाड़ से बाहर न निकाल सका', ठीक नहीं जान पड़ता। जैसा कि आगे बतलाया गया है, क्षेमकर्ण मेवाड़ से चले जाने के बाद ही बहरी से लड़ा था। वह महाराणा-द्वारा सादड़ी छीने जाने पर मालवे के सुलतान महमूद के पास चला गया था और वहां उसने जागीर प्राप्त की थी, जो संभवतः मालवे में रामपुरा-भाणपुरा (इंदौर राज्य) एवं वर्त्तमान प्रतापगढ़ राज्य के निकट ही हो। ७

५० 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आक्रमण में क्षेमकर्ण का पूरा हाथ था१, पर परिणाम क्षेमकर्ण के लिए लाभदायक न हुआ और आजीवन उन दोनों भाइयों के बीच द्वेष बना रहा। क्षेमकर्ण का मालवे के सुलतान के पास रहना वहां के दूसरे सरदारों को अखरता था, क्योंकि उच्चाभिलाषी होने से वह वहां के सरदारों से मेल खानसलह के अनुचर वहरी न रखता था। इंदौर राज्य के खड़ावदा गांव की से क्षेमकर्ण का युद्ध बावड़ी के वि० सं० १५४१ कार्तिक सुदि २ (ई० स० १४८४ ता० २१ अक्टूबर) गुरुवार के शिलालेख से पाया जाता है कि मालवे के सुलतान महमूद के एक सरदार खानसलह२ के अनुचर मलिक वहरी३ और क्षेमकर्ण के बीच शंखोद्धार४ में युद्ध हुआ, (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५४। नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६३-४। (२) खानसलह, हमीरपुर के कलचुरीवंशी राजा भैरव के पुरोहित के वंशधर पुरुषोत्तम का पुत्र था। उसका वास्तविक नाम घुघऊ था। कालपी (जौनपुर) के शासक अब्दुलक़ादिर ने, जो दिल्ली की सल्तनत के अधीन था, उसको मुसलमान बना- कर उसका नाम 'सलह' रक्खा। फिर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाकर उसने उसको अपना विश्वासपात्र सेवक बनाया। कालपी पर मांडू के सुलतान होशंग की चढ़ाई होने पर अब्दुलक़ादिर ने पुत्र-पुत्री तथा धन-सहित खानसलह को होशंग को सौंप दिया। होशंग ने उसकी पूर्व-प्रतिष्ठा क़ायम रक्खी। वह (सलह) होशंग के पीछे मालवे पर अधिकार करनेवाले सुलतान महमूद ख़िलजी का भी कृपापात्र रहा, जिसने उसको ख़ान की उपाधि दी थी। ख़ानसलह ने सुलतान होशंग, महमूद ख़िलजी एवं ग़यासु- द्दीन के समय कई युद्धों में वीरता दिखलाई थी। (३) मलिक वहरी को खड़ावदे के शिलालेख में क्षत्रिय लिखा है। ख़ान- सलह ने उसको मुसलमान बना लिया था। खड़ावदे के उपर्युक्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि वहरी वीर होने के साथ ही पूर्ण स्वामिभक्त था एवं उसको संस्कृत से भी अनुराग था। उसने खड़ावदे के भीलों को विजय करने के पीछे वहां क़िला, बावड़ी और बगीची बनवाकर महेश भट्ट से (जिसका मेवाड़ राज्य में बड़ा सम्मान था और वहां उसने कई प्रशस्तियों की रचना की थी) इस शिलालेख की रचना करवाई, जो तत्कालीन मालवे के इतिहास के लिए बहुत ही उपयोगी है। (४) खड़ावदा गांव से दूर चंबल नदी के तट पर (इंदौर राज्य के रामपुरा- भानपुरा नामक ज़िले में) शंखोद्धार एक प्राचीन तीर्थ है। महाभारत (द्रोणपर्व, अ० ६७ वां)

महारावत क्षेमकर्ण ५१ जिसमें क्षेमकर्ण की हार हुई¹ । वि० सं० १५२५ ( ई० स० १४६८ ) में प्रतापी महाराणा कुंभकर्ण को मारकर उसका ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह( ऊदा ) मेवाड़ का स्वामी हुआ । क्षेमकर्ण की मृत्यु उसके इस जघन्य कृत्य से राजभक्त सरदारों को उससे अत्यन्त घृणा हो गई और वे अपने भाई, पुत्र आदि को राज्य-सेवा में भेजकर स्वयं उससे किनारा करने एवं उसे राज्यच्युत करने का उद्योग करने लगे । उदयसिंह ने उनकी प्रीति सम्पादन करने का प्रयत्न किया, परंतु जब उसमें उसे सफलता नहीं हुई, तो उसने अपने पड़ोसी राजाओं को मेवाड़ के कुछ इलाक़े देकर सहायक बनाने का प्रयत्न किया। उस समय क्षेमकर्ण भी पितृहंता से जा मिला, जिससे सादड़ी से पाया जाता है कि चंद्रवंशी राजा रंतिदेव के यहां असंख्य पशु बलि होते थे, जिनके लोहू, मांस, मजा आदि ने वहकर नदी का रूप धारण किया, जो चर्मण्वती नाम से प्रसिद्ध हुई । फिर वह स्थान तीर्थ के रूप में परिणत हो गया, जहां वैशाख और कार्तिक में मेला लगता है और आस-पास के गांवों से बहुतसे आदमी जाकर एकत्रित होते हैं। खड़ावदे की वांवड़ी में उपर्युक्त वि० सं० १५४१ (ई० स० १४८४) का शिलालेख लगा हुआ था, जो अब इंदौर स्टेट म्यूजियम् में सुरक्षित है । इस शिलालेख में मलिक बहरी, ख़ानसलह और सुलतान होशंग से लगाकर मालवे के सुलतान ग़यासुद्दीन तक का वर्णन है । खड़ावदे के आस-पास भीलों की अधिक बस्ती थी, जिनको मलिक बहरी ने विजय किया था । खड़ावदे के इस शिलालेख का मेरे आयुष्मान् पुत्र रामेश्वर गौरीशंकर ओझा, एम्० ए० (प्रोफेसर ऑफ़ संस्कृत, गवर्नमेंट कॉलेज, अजमेर) ने इंदौर स्टेट म्यूजियम् का क्यूरेटर (अध्यक्ष) रहते समय काशी की नागरी प्रचारिणी पत्रिका (भाग १२, सं० १६८८, पृ० १-६६) में 'इंदौर म्यूजियम् का एक शिलालेख' - शीर्षक से सम्पादन किया है। (१) शंखोद्वारे रंतिदेवोद्धतायाः स्रोतस्विन्यास्तीरमध्येभ्यभावि । षंङ्गाषंङ्गि क्षेमकर्णद्वितीय- श्चान्वन्व( स्तान्वन्व ) हरीपारसीकेश्वरेण ॥ २६ !! खड़ावदे का शिलालेख ।

५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आदि परगने उसे फिर मिल गये। उदयसिंह की इस कार्यवाही से सरदार और भी असंतुष्ट हो गये। उन्होंने परस्पर सलाह कर उसके छोटे भाई रायमल को, जो अपनी ससुराल ईडर में था, राज्य लेने के लिए बुलाया। रायमल उधर से कुछ सैन्य लेकर ब्रह्मा की खेड़ (ईडर राज्य) तथा ऋषभदेव होता हुआ जावर (योगिनीपुर) के निकट पहुंचा, जो समृद्ध क़सवा था। मेवाड़ के सरदार भी अपनी-अपनी जमीयत-सहित उससे जा मिले। जावर के निकट के युद्ध में रायमल की विजय हुई और वहां उसका पूरा अधिकार हो गया। फिर पितृघाती के साथ दाड़िमपुर (दाड़मी गांव) में उसका युद्ध हुआ। उसमें उसकी विजय हुई और क्षेमकर्ण मारा गया¹। तदनंतर और भी कई युद्धों में विजय पाकर रायमल मेवाड़ का स्वामी हुआ तथा उदयसिंह वहां से भाग गया। ख्यातों के अनुसार इस घटना का समय वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के लगभग है²। (१) अवर्षत्संग्रामे सरभसमसौ दाडिमपुरे धराधीशस्तस्मादभवदनणुः शोणितसरित्। स्खलन्मूलस्तु( ? )लोपमितगरिमा क्षेमकुपतिः पतन् तीरेस्यास्तत्तटविटपिवाटे विघटितः॥ ६४ ॥ एकलिंगजी के दक्षिण-द्वार की वि० सं० १५४५ (चैत्रादि १५४६) की प्रशस्ति; भावनगर इंस्क्रिप्शन्स; पृ० १२१। (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२५। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में भी क्षेमकर्ण की मृत्यु का यही सम्वत् दिया है और लिखा है कि वह आश्विन सुदि १० (ता० १ अक्टोबर) बुधवार (? शुक्रवार) को ऋषभदेवजी (मेवाड़ के दक्षिणी भाग के धूलेव गांव का जैन तीर्थ) के पास करमदी के खेड़े में मारा गया। ख्यात और दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में इतना ही अन्तर है कि एक करमदी के खेड़े में और दूसरी दाड़िमपुर में क्षेमकर्ण की मृत्यु बतलाती है। ऋषभदेव से उदयपुर के मार्ग में लगभग बीस मील पर जावर नामक प्राचीन गांव है, जो बड़ा समृद्धिशाली क़सबा था और योगिनीपुर नाम से प्रख्यात था। महाराणा रायमल और उसके बड़े भाई उदयसिंह (ऊदा, पितृघाती) के बीच कई युद्ध हुए थे। उनमें एक

: महारावत क्षेमकर्ण . ५३

. प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में लिखा है कि क्षेमकर्ण के चार . क्षेमकर्ण की संतति राणियां थीं, जिनसे सूरजमल, रणवीर, शेखर और रायसाल नामक चार कुंवर एवं पेपकूंचरी नामक पुत्री हुई । क्षेमकर्ण स्वाभिमानी और महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसके समय का कोई शिलालेख या दानपत्र नहीं मिला है। अतएव उसके जीवन पर विशेष क्षेमकर्ण का व्यक्तित्व प्रकाश पड़ना कठिन है। हरिभूषण महाकाव्य से प्रकट है कि वह सत्य का पक्षपाती, मतिमान् और धर्मप्रिय व्यक्ति था¹। लोभ और कृपणता उसमें न थी एवं वह सिंह, शूकर, मृग आदि के आखेट का बड़ा प्रेमी था³। उपर्युक्त काव्य में उसके

जावर और दूसरा दाढ़िमपुर के पास हुआ । उपर्युक्त दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति वि० सं० १५४२ (चैत्रादि १५४६ = ई० स० १४८६) की है, जो इस घटना से लगभग पन्द्रह वर्ष पीछे लिखी गई थी। ऐसी दशा में उक्त प्रशस्ति में उल्लिखित दाढ़िमपुर के युद्ध में ही क्षेमकर्ण की मृत्यु होने का वर्णन विश्वसनीय है। (१) उदयपुर राज्य के प्रथम वर्ग के ठिकाने कानोड़ की ख्यात में लिखा है कि रावत अजा (महाराणा लाखा का पुत्र) के बेटे सारंगदेव और सूरजमल थे । उनमें से सारंगदेव अजा का उत्तराधिकारी हुआ और सूरजमल क्षेमकर्ण का; परन्तु इसके विरुद्ध प्रतापगढ़ राज्य से मिलनेवाली एक पुरानी ख्यात में सारंगदेव को सूरजमल का छोटा भाई बतलाकर उसको क्षेमकर्ण का दूसरा पुत्र लिखा है। इन दोनों में कौनसा कथन ठीक है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; किन्तु घटनाक्रम पर विचार करने से यह स्पष्ट है कि सूरजमल और सारंगदेव में कोई निकट-सम्बन्ध अवश्य था, जिससे वे सदा साथ रहकर महाराणा रायमल से युद्ध करते रहे और सुख-दुःख में भी सदैव साथ रहे। . (२) नित्यं सत्यपरायणोऽतिमतिमान्धर्मप्रतिष्ठापको . : लुब्धो नो कृपणो न रक्षणपरो नित्यं प्रजानामपि । दण्डे पुत्रकलत्र-शत्रुविषये भिन्नो न भूवल्लभः क्षेमारावतसन्निभः क्षितितले भूतो न भावी विभुः ॥ १४ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग १ । (३) हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग १, श्लोक २१-३१। उपर्युक्त हरिभूषण-महाकाव्य

५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास संबंध में अश्वमेध यज्ञ करने और संपूर्ण भूमि ब्राह्मणों को देने का जो वर्णन दिया है¹, वह अत्युक्ति-पूर्ण है। कवि ने इस काव्य में प्रत्येक स्थले पर अलङ्कारों का प्रयोग किया है, जैसा कि प्रायः काव्यों में होता है तथा यह काव्य क्षेमकर्ण से लगभग दो सौ वर्ष पीछे का बना हुआ है, अतएव उसके विषय में जो कुछ वर्णन किया गया है, वह तत्कालीन परिस्थिति के विल्कुल विपरीत जान पड़ता है। इसमें सन्देह नहीं कि क्षेमकर्ण ने मालवे की सेना-द्वारा अपनी मातृभूमि की बहुत कुछ हानि करवाई, किन्तु उसका परिशोध युद्ध में उसकी मृत्यु-द्वारा हो गया, जो क्षत्रियों के लिए गौरव की बात है। अपने न्यायपूर्ण स्वत्वों की प्राप्ति एवं आश्रित जनों की सहायतार्थ युद्ध में प्राणों की बाज़ी लगा देने के इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं। क्षेमकर्ण ने भी अपने जीवन का यही लक्ष्य रख युद्ध में वीरगति प्राप्त की, जिससे उसका चरित्र उज्जवल हो जाता है। सूरजमल दाड़मी के युद्ध में क्षेमकर्ण के वीरगति प्राप्त करने के साथ ही महाराणा और उसके बीच होनेवाले विरोध का अंत हो गया और संभवतः सादड़ी का स्वामी होना वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के लगभग रावत सूरजमल, क्षेमकर्ण का उत्तराधिकारी हुआ। सादड़ी आदि पर महाराणा कुंभकर्ण की मृत्यु के पश्चात् उदयसिंह के समय क्षेमकर्ण का अधिकार हो गया था वह बना रहा। ¹में दिये हुए श्लोक संख्या २१-३१ से स्पष्ट है कि क्षेमकर्ण विंध्याचल के जंगलों में शिकार खेला करता था। अतएव उसका अधिकांश समय मालवे में ही व्यतीत होना निश्चित है। (१) सम्पूर्णैव मही महाध्वरकृता ऋत्विग्गणोभ्यो मुदा रिङ्गतुङ्ग-तुरङ्गमेधविषयेष्वापादिता दक्षिणा । भाएडागारमिहार्पितं न कतिधा येन स्वयं भूभुजा चन्द्रो नाविशदस्य मेरुरपि तद्वद्धो नु मन्यामहे ॥ १६ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ४

महारावत सूरजमल ५५ मेवाड़ का राज्य पाने के पीछे महाराणा रायमल ने, जो सरल प्रकृति का था, सूरजमल से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की, परंतु सूरजमल और महाराणा के बीच आन्तरिक सफ़ाई नहीं हुई [Margin: रायमल का सारंगदेव को भैंसरोड़गढ़ की जागीर देना] और मनोमालिन्य बना ही रहा¹। फिर महाराणा ने सारंगदेव-अजावत (महाराणा लाखा का पौत्र) को भी भैंसरोड़गढ़ का ठिकाना जागीर में प्रदान कर दिया²। पितृघाती उदयसिंह (ऊदा) महाराणा रायमल से परास्त होकर इधर-उधर भटकता हुआ मांडू के सुलतान गयासुद्दीन³ के पास सहायता के लिए गया, किंतु वहां पर बिजली गिरने से [Margin: मालवे की सेना के साथ महाराणा के पक्ष में सूरजमल का युद्ध करना] उसकी मृत्यु हो गई। अनन्तर उसके पुत्र सूरजमल और सहसमल को मेवाड़ का राज्य दिलाने के लिए ग़्यासुद्दीन ने चढ़ाई कर चितौड़ को घेर लिया। महाराणा ने अपनी सेना सुसज्जित कर सुलतान की सेना से मुक़ाबिला (१) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ३३१ टिप्पणी संख्या १ । (२) वही; जिल्द १, पृ० ३३१। 'वीरविनोद' (भाग १, पृ० ३४७) में महाराणा रायमल का सूरजमल और सारंगदेव को शामिल में वार्षिक पांच लाख रुपये आय की भैंसरोड़गढ़ की जागीर देना लिखा है, किन्तु कुछ स्थल पर केवल सारंगदेव को ही भैंसरोड़गढ़ की जागीर मिलने का उल्लेख मिलता है। मेवाड़ की जागीरदारी प्रथा को देखते हुए 'वीरविनोद' का यह कथन ठीक नहीं जान पड़ता एवं दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को एक ही जागीर शामलात में मिलने के उदाहरण अब तक वहां देखने में नहीं आये। नैणसी भी लिखता है कि सूरजमल का सादड़ी से लेकर गिरवा तक के प्रान्त पर ही अधिकार रहा था (मुहंणोत नैणसी की ख्यात; जि० १, पृ० ६४)। (३) यह ख़िलजी वंश के मांडू के सुलतान महमूदशाह का पुत्र था। वि० सं० १५३२ (ई० स० १४७५) में यह मांडू का सुलतान हुआ (डफ़; दि क्रोनोलोजी ऑफ़ इंडिया; पृ० २०२)। अनन्तर अपने पुत्र नासिरुद्दीन के ससैन्य चढ़ आने पर वि० सं० १५५७ (ई० स० १५००) में यह स्वयं उसको राज्य-मुकुट पहना मांडू के सिंहासन से पृथक् हुआ और उसी वर्ष इसकी मृत्यु हुई।

५६ •प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

किया, जिसमें सुलतान की हार हुई१। सुलतान ने इस हार का बदला लेने के लिए पुनः युद्ध की तैयारी की और अपने सेनापति ज़फ़रखां को एक बड़ी सेना के साथ मेवाड़ पर भेजा। ज़फ़रखां इस सेना के साथ मेवाड़ के पूर्वी हिस्से को लूटने लगा, जिसकी सूचना पाते ही महाराणा अपने कुंवरों पृथ्विीराज, जयमल, संग्रामसिंह, पत्ता (प्रताप) और रामसिंह तथा कांधल चूंड़ावत, सारंगदेव अज्जावत आदि कितने ही बड़े-बड़े सरदारों एवं विशाल सेना के साथ मांडलगढ़ की तरफ़ बढ़ा। वहां घमासान युद्ध हुआ, जिसमें


(१) वीरविनोद; भाग १, पृ० ३३८। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ३२८ । कर्नल टॉड का कथन है कि उदयसिंह दिल्ली के सुलतान के पास चला गया और वहीं बिजली गिरने से मरा (राजस्थान; जि० १, पृ० ३४०)। नैणसी लिखता है कि मेवाड़ का राज्य छूटने के पीछे उदयसिंह सोजत गया और उसने कुंवर बाघा की बेटी से विवाह किया। फिर वह बीकानेर चला गया और वहीं मरा (मुंहणोत नैणसी की ख्यात; जि० १, पृ० ३६)। मेवाड़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि वह मालवे के सुलतान के पास गया था और वहीं उसकी मृत्यु हुई। अनन्तर उसके पुत्र सूरजमल और सहसमल सुलतान ग़यासुद्दीन को मेवाड़ पर चढ़ा लाये (मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२७। ख्यातों के इस कथन की पुष्टि एकलिङ्गजी के दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति से भी होती है। उसमें सूरजमल और सहसमल के दिल्ली की सेना को मेवाड़ पर चढ़ा लाने का कुछ भी उल्लेख नहीं है। कर्नल टॉड भी ग़यासुद्दीन की मेवाड़ पर चढ़ाइयां होने का वर्णन करता है, पर उसका कथन है कि उनमें महाराणा की जो विजय हुई, वह उसके भतीजों की वीरता पर ही निर्भर है, जिनको महाराणा ने क्षमा कर दिया था (राजस्थान; जि० १, पृ० ३४०)। किन्तु अन्य स्थल पर महाराणा का अपने भतीजों (सूरजमल और सहसमल—पितृघाती उदयसिंह के पुत्र) को क्षमा करने का उल्लेख नहीं मिलता है। टॉड का यह कथन कि पितृहंता उदयसिंह के पुत्रों (सूरजमल और सहसमल) ने, जिनको महाराणा रायमल ने क्षमा कर दिया था, मालवे के सुलतान ग़यासुद्दीन की मेवाड़ की चढ़ाइयों के समय वीरता प्रदर्शित की थी, ठीक नहीं जान पड़ता। यहां टॉड का अभिप्राय सूरजमल और सारंगदेव से हो तो युक्तिसंगत जान पड़ता है, क्योंकि अन्य साधनों से सूरजमल और सारंगदेव का, ग़यासुद्दीन की मेवाड़ की चढ़ाई के समय महाराणा के पक्ष में लड़ना पाया जाता है। भीतरी वैमनस्य होने पर भी महाराणा रायमल ने सूरजमल का सादड़ी पर अधिकार रहने दिया एवं सारंगदेव को भैंसरोड़गढ़ का इलाक़ा प्रदान कर दिया। इसका तात्पर्य यही हो सकता है कि महाराणा ने सूरजमल

• महारावत सूरजमल ५७ दोनों तरफ़ के बहुत से वीर मारे गये और ज़फ़रखां हारकर मालवे को लौट गया । इस युद्ध के प्रसंग में महाराणा रायमल के समय की एकलिङ्गजी के दक्षिण-द्वार की वि० सं० १५४५ (चैत्रादि १५४६ = ई० स० १४८६) की प्रशस्ति में लिखा है कि मेदपाट के अधिपति रायमल ने मंडल दुर्ग (मांडलगढ़) के पास सैन्य का नाशकर शकपति ग़यास (ग़यासुद्दीन, मालवे का सुलतान) के गर्वोन्नत सिर को नीचा कर दिया १ । वहां से रायमल मालवे की ओर बढ़ा और खैराबाद के युद्ध में यवन सेना को तलवार के घाट उतारकर उसने और सारंगदेव के पहले के अपराध क्षमा कर दिये । सूरजमल और सारंगदेव वंशक्रम के अनुसार परस्पर चाचा-भतीजे थे। इससे संभव है कि कर्नल टॉड ने सूरजमल—जो महाराणा का चचाज़ाद भाई था—और सारंगदेव को—जो उस (महाराणा) का चाचा होता था—परस्पर चाचा-भतीजे होने से महाराणा का भतीजा समझ लिया हो तो कोई आश्चर्य नहीं है । टॉड के उपर्युक्त संदिग्ध लेख को समझने में प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर-लेखक के० डी० अर्सकिन को भी भ्रम हो गया और उसने प्रतापगढ़ राज्य के संस्थापक सूरजमल के विषय में कर्नल टॉड का सूरजमल को पितृहंता उदयसिंह का पुत्र मानना लिखकर उसका खंडन किया (राजपूताना गेज़ैटियर; जि० २ ए, पृ० १६७) । अर्सकिन के संदेह को ठीक मानकर विलियम क्रुक ने भी अपने संपादित 'एनाल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान' (जि० १, पृ० ३४७ टिप्पण ४) में उसके कथन को उद्धृत कर दिया । टॉड के उपर्युक्त विस्तृत ग्रंथ का अध्ययन करने पर अर्सकिन का यह लेख कि टॉड ने सूरजमल को पितृघाती उदयसिंह का पुत्र लिखा है, ग़लत प्रमाणित होता है । इसी प्रकार क्रुक का टिप्पण भी, क्योंकि टॉड ने प्रतापगढ़ राज्य के संस्थापक सूरजमल को कहीं पितृहंता उदयसिंह का पुत्र नहीं लिखा है तथा पृथ्वीराज और सूरजमल के पारस्परिक कलह के अवसर पर पृथ्वीराज का सूरजमल को 'काका' एवं सूरजमल का पृथ्वीराज को 'भतीजे' शब्द से संबोधन करना लिखकर सूरजमल के मेवाड़ छोड़कर कांठल में जाने और उसके वंशधरों के प्रतापगढ़ का स्वामी होने का उल्लेख किया है। इससे महाराणा का भाई (क्षेमकरण का पुत्र) सूरजमल और पितृहंता उदयसिंह का पुत्र सूरजमल भिन्न व्यक्ति प्रकट होते हैं। (१) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३३८ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२६ । ८

५८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवावालों से दंड लिया तथा अपना यश बढ़ायां। इस युद्ध का महाराणा रायमल की प्रशंसा में बने हुए 'रायमल रासा'-नामक भाषा-काव्य में विस्तृत वर्णन है। महाराणा के साथ युद्ध में जानेवाले जिन प्रतिष्ठित सरदारों को युद्ध के समय घोड़े दिये गये, उनमें रावत सूरजमल-क्षेमकर्णोत को सूरजपसाव घोड़ा दिये जाने का उल्लेख है^२, जिससे ज्ञात होता है कि उस समय सूरजमल ने महाराणा की सेना में रह- कर मालवे के सुलतान तथा ज़फ़रखां की चढ़ाइयों में मुसलमान सेना से युद्ध किया था। इससे यह भी अनुमान होता है कि महाराणा और सूरजमल के बीच जो मनो-मालिन्य था, वह मिटकर सूरजमल महाराणा के पक्ष में लड़ने के लिए गया था। फ़ारसी तवारीखों में ग़यासशाह(ग़यासुद्दीन), ज़फ़रखां और महाराणा के बीच होनेवाले युद्धों का वर्णन नहीं है, परंतु महाराणा रायमल के समय की उपर्युक्त चैत्रादि वि० सं० १५४६ (ई० स० १४८६) की एकलिङ्गजी के दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में इन दोनों युद्ध का स्पष्ट उल्लेख है। इससे निश्चय है कि उक्त दोनों युद्ध वि० सं० १५४६ (ई० स० १४८६) के पूर्व और वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के पीछे किसी समय हुए। महाराणा रायमल के पृथ्वीराज, जयमल, संग्रामसिंह (सांगा) आदि १३ पुत्र थे। ज्येष्ठ होने से कुंवर पृथ्वीराज राज्य का स्वत्वाधिकारी था ही, परंतु जयमल पर महाराणा की विशेष प्रीति होने महाराणा के कुंवरों में पारस्परिक द्वेष की वृद्धि से वह भी राज्य-प्राप्ति की आशा से मुक्त न था। संग्रामसिंह शांत और गंभीर प्रकृति का पुरुष था एवं उसके ग्रह बड़े उच्च थे, जिससे पृथ्वीराज और जयमल उससे डाह रखते थे। एक दिन तीनों भाइयों ने किसी ज्योतिषी को अपनी- अपनी जन्मपत्रियां बतलाईं। उसने उत्तर दिया कि पृथ्वीराज और जयमल पिता की विद्यमानता में ही मृत्यु को प्राप्त होंगे एवं संग्रामसिंह राज्य का (१) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४१ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२६ । (२) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३३६ ।

महारावत सूरजमल ५६ स्वामी होगा। इसपर क्रोध में आकर पृथ्वीराज तथा जयमल ने ज्योतिषी की भविष्यवाणी को मिथ्या करने के लिए संग्रामसिंह को मार डालना चाहा। फलस्वरूप भाइयों के बीच तलवारें चलने लगीं और पृथ्वीराज के हाथ की तलवार से संग्रामसिंह की एक आंख जाती रही। इतने में रावत सारंगदेव जा पहुंचा। उसने उन तीनों को रोककर युद्ध से निवृत्त किया और फिर संग्रामसिंह को अपने यहां ले जाकर उसकी चिकित्सा की। उसने आपस का विरोध बढ़ता देख महाराणा के उपर्युक्त तीनों कुंवरों को समझाया कि तुम परस्पर क्यों कटे-मरते हो, ज्योतिषियों के कथन पर विश्वास नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त अभी तो महाराणा विद्यमान हैं, इसलिए ऐसा विचार करना ही बुरी बात है। फिर भी यदि तुमको यह बात स्पष्ट करनी है तो भीमल गांव के देवी के मंदिर की पुजारिन चारणी१ से जाकर पूछ लो। इसपर उन्होंने सारंगदेव की बात स्वीकार कर ली। तदनुसार वि० सं० १५६१ के ज्येष्ठ (ई० स० १५०४ मई) मास में एक दिन कुंवर पृथ्वीराज, जयमल और संग्रामसिंह सारंगदेव-सहित अपने भाग्य का निर्णय कराने के लिए भीमल गांव की चारणी के पास गये। उस (चारणी) ने उनके आने का अभिप्राय समझ राजयोग संग्रामसिंह को बतलाया और मेवाड़ के किनारे की भूमि सूरजमल के अधिकार में रहने की बात कही। यह सुनते ही पृथ्वीराज तथा जयमल संग्रामसिंह पर टूट पड़े। इतने में सारंगदेव फुर्ती के साथ खड़ा होकर संग्रामसिंह पर किये हुए प्रहार अपने ऊपर झेलने लगा। परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज और सारंगदेव तो अधिक घायल होकर वहां गिर गये और संग्रामसिंह घायल होने पर भी अपने घोड़े पर सवार होकर वहां से रवाना हुआ। जयमल ने, जो अधिक घायल नहीं हुआ था, उसका पीछा किया, परंतु संग्रामसिंह सही-सलामत सेवंत्री गांव में जा पहुंचा। उसके शरीर पर (१) यह तुंगल कुल के चारण की पुत्री थी और इसका नाम बीरी था (वीर- विनोद; पहला भाग, पृ० ३४३)। इसे लोग देवी का अवतार मानते थे।

६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घाव लगे देखकर राठोड़ बीदा१ (ऊदावत) ने, जो मारवाड़ की तरफ़ से वहां दर्शनों के लिए गया हुआ था, उसको घोड़े से उतारकर उसकी चिकित्सा की। इतने में जयमल भी वहां जा पहुंचा और उसने उससे संग्रामसिंह को मांगा, किन्तु वीर राठोड़ बीदा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। फिर उसने संग्रामसिंह को तो घोड़े पर देसूरी की तरफ़ रवाना किया और स्वयं अपने राजपूतों-सहित वीरतापूर्वक जयमल से युद्ध करता हुआ काम आया। उपर्युक्त सेवंत्री गांव के रूपनारायण के मंदिर में राठोड़ बीदा की स्मारक छत्री बनी हुई है। उसमें वि० सं० १५६१ ज्येष्ठ वदि ७ (ई० स० १५०४ ता ६ मई) को उसका महाराणा रायमल के कुंवर संग्रामसिंह की सहायतार्थ लड़कर मारे जाने का उल्लेख है२। फिर निराश होकर जयमल कुंभलगढ़ चला गया। जब महाराणा को यह संवाद ज्ञात हुआ तो उसने पृथ्वीराज को कहला भेजा कि तूने मेरी विद्यमानता में राज्य-लोभ से प्रेरित होकर यह संघर्ष मचाया और मेरा कुछ भी लिहाज़ न किया, इसलिए तू मुझे अपना मुंह मत दिखलाना। निदान घाव अच्छे होने पर पृथ्वीराज कुंभलगढ़३ और सारंगदेव अपने स्थान को चला गया। (१) यह मारवाड़ के राठोड़ों के पूर्वज राव सलखा के दूसरे पुत्र जैतमाल का वंशधर था। जैतमाल के वंशज जैतमालोत कहलाये। उसका पुत्र वैजल, पौत्र कांधल और प्रपौत्र ऊदल हुआ। ऊदल का बेटा मोकल था, जिसने मोकलसर बसाया। मोकल का पुत्र बीदा था, जिसके वंश के इस समय केलवे के स्वामी हैं, जो उदयपुर राज्य के दूसरी श्रेणी के सरदारों में है (मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३२)। (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३२ टिप्पण २। (३) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४३-४। कर्नल टॉड-कृत 'राजस्थान' में महाराणा के कुंवरों के बीच जन्मपत्रियां दिखलाने के समय झगड़ा होने का कुछ भी वर्णन नहीं है और संग्रामसिंह की एक आंख भीमल गांव के झगड़े में चली जाना लिखा है (जि० १, पृ० ३४१-२)। टॉड-कृत 'राजस्थान' और 'वीरविनोद' में महाराणा के कुंवरों के संघर्ष में संबंध सूरजमल का ही उल्लेख है, परन्तु इस सम्बन्ध में नीचे लिखा एक प्राचीन पद्य प्रसिद्ध है-

महारावत सूरजमल ६१ इस घटना के कुछ दिनों पीछे कुंवर जयमल, सोलंकी सुरताण का अपमान करने के कारण सांखला रतना के हाथ से मारा गया १। कुंभलगढ़ में रहते समय कुंवर पृथ्वीराज ने पहाड़ी प्रांत के लोगों सारंगदेव का सूरजमल के का उपद्रव शांत कर दिया था। इससे महाराणा की पास जाकर रहना अप्रसन्नता दूर हो गई। वह सारंगदेव से द्वेष रखता था । इसलिए महाराणा की प्रसन्नता का अवसर पाकर उस (पृथ्वीराज) ने उस (महाराणा) से निवेदन कराया कि आपने सारंगदेव को पांच लाख रुपये वार्षिक आय की जागीर प्रदान की है, जो अधिक है। यदि इसी प्रकार छोटे भाइयों को इतनी बड़ी जागीरें मिलतीं तो अब तक आपके पास मेवाड़ का कुछ भी हिस्सा बाक़ी न रहता। इसपर महाराणा ने उत्तर भेजा कि हमने तो भैंसरोड़गढ़ दे दिया । अगर तुम इसे अनुचित समझते हो तो परस्पर समझ लो। यह सूचना पाते ही पृथ्वीराज ने दो हज़ार सवारों के साथ भैंसरोड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी। सारंगदेव वहां से भैंसरोड़गढ़ का परित्याग कर २ सूरजमल से मिल गया । बड़ी सादड़ी से गिरवा तक का सारा प्रदेश सूरजमल के अधिकार में होना महाराणा रायमल को भी पसंद न था । इसलिए पृथ्वीराज उस (सूरजमल) से भी छेड़-छाड़ करने लगा । पीथल खग हाथ्यां पकड़, वह सांगा किय वार । सारंग मेले सीस पर, उणवर साम उबार ॥ उपर्युक्त दोहे से स्पष्ट है कि महाराणा के कुंवरों के पारस्परिक कलह में संग्रामसिंह पर पृथ्वीराज के किये हुए प्रहार सारंगदेव ने अपने ऊपर मेले थे। (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; भाग १, पृ० ४४-५ । टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४४ । वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४५-६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३५-६ । (२) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४७ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३५ ।

६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास अनन्तर जब पृथ्वीराज का उपद्रव बढ़ता दिखाई पड़ा तो सूरजमल और सारंगदेव प्राणों के भय से विवश होकर मांडू चले गये और वहां के सूरजमल का मालवे की सुलतान नासिरुद्दीन को मेवाड़-राज्य की सारी सेना के साथ जाकर परिस्थिति से परिचित कर उन्होंने उसे अपनी सहा- महाराणा से युद्ध करना यता के लिए उद्यत किया¹। मांडू (मालवे) के सुल- तान अपने पड़ौसी मेवाड़ के हिन्दू-राज्य की बढ़ी हुई शक्ति को अपने लिए पूर्ण घातक समझते थे, क्योंकि उनकी समय-समय पर मेवाड़-राज्य के द्वारा बहुत क्षति हुई थी। इसलिए वहां के सुलतान ने पूर्व-पराजयों का बदला लेने का यह अच्छा अवसर समझ सूरजमल और सारंगदेव को सहायता देना स्वीकार किया। सूरजमल कुंवर जयमल के मारे जाने, पृथ्वीराज पर (१) सुलतान नासिरुद्दीन मुहम्मद हि० स० ९०६ (वि० सं० १५५७ = ई० स० १५००) के लगभग अपने पिता गयासुद्दीन की विद्यमानता में ही मांडू का सुलतान हुआ। 'तारीख़ फ़िरिश्ता' से ज्ञात होता है कि वि० सं० १५६० (ई० स० १५०३) में नासिरशाह ने मेवाड़ पर चढ़ाई की थी और वहां से नज़राने के तौर पर बहुत से रुपये आदि लेकर वह लौटा था (जि० ४, पृ० २४३ ब्रिग्ज़-संपादित)। घटना- क्रम पर विचार करने से यह अनुमान होता है कि वि० सं० १५६३ (ई० स० १५०६) के लगभग सूरजमल और सारंगदेव मांडू के सुलतान नासिरुद्दीन के पास पहुंचे और वहां से सैनिक सहायता प्राप्तकर महाराणा रायमल से युद्ध के लिए प्रवृत्त हुए होंगे। कर्नल टॉड सूरजमल और सारंगदेव का मांडू के सुलतान मुज़फ़्फ़र के पास जाकर वहां से सैनिक सहायता प्राप्त करना लिखता है (राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५ क्रुक-संपादित)। किन्तु मांडू के सुलतानों में मुज़फ़्फ़र नाम का कोई सुलतान नहीं हुआ, जिससे उसका यह कथन ज्यों का त्यों मानने के योग्य नहीं है। संभव है कि सूरजमल और सारंगदेव के साथ सुलतान नासिरशाह ने अपने सरदार ज़फ़रख़ां को, जिसका नाम एकलिंगजी के दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में मुदाफ़र लिखा है और जो पहले भी गयासुद्दीन के समय मेवाड़ पर सेना लेकर गया था, भेजा हो। फ़ारसी लिपि की अपूर्णता अथवा मालवे के इतिहास का पूरा ज्ञान न होने के कारण ज़फ़रख़ां और मुज़फ़्फ़रख़ां समान शब्द होने से उस (टॉड) ने उसको भूल से मुज़फ़्फ़र समझ, मांडू का सुलतान लिख दिया हो। इसी प्रकार एकलिंगजी के मंदिर की दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति के रचयिता ने भी ज़फ़रख़ां का नाम मुज़फ़्फ़र समझ उसका विकृत रूप मुदाफ़र कर दिया हो।

. महारावत सूरजमल . ६३ महाराणा की अकृपा होने और संग्रामसिंह का पता न होने से चित्तौड़ का राज्य अपने अधिकार में कर लेना सरल समझ सारंगदेव तथा मालवे की मुसलमानी सेना के साथ मेवाड़ में गया और उसने सादड़ी तथा बाठरड़ा के अतिरिक्त नीमच से लगाकर नाई तक का प्रदेश अपने हस्तगत कर लिया। यही नहीं सूरजमल और सारंगदेव मालवे की सेना के साथ चित्तौड़ तक जा पहुंचे। उस समय कुंवर पृथ्वीराज कुंभलगढ़ की तरफ़ था और केवल महाराणा ही चित्तौड़ में था। वहां पर जितनी सेना थी, उसको लेकर वह सूरजमल और सारंगदेव के मुक़ाबले के लिए जा खड़ा हुआ। गंभीरी नदी के तट पर दोनों सेनाओं में घोर युद्ध हुआ। उस समय महा- राणा की सेना थोड़ी होने पर भी वह एक वीर पुरुष की भांति शत्रुओं से लोहा ले रहा था¹। महाराणा के युद्ध में २२ घाव आये। वह जर्जरित होकर रणक्षेत्र में गिरनेवाला ही था एवं उसकी पराजय होना संभव था कि इतने में कुंवर पृथ्वीराज ने अपने एक हज़ार सुसज्जित सवारों के साथ कुंभल- गढ़ की तरफ़ से जाकर विपक्षियों की सेना पर धावा बोल दिया², जिससे युद्ध का रंग एक दम बदल गया। दोनों तरफ़ के बहुतसे आदमी मारे गये। कुंवर पृथ्वीराज, सूरजमल और सारंगदेव भी बहुत घायल हुए। सायंकाल होने पर युद्ध बन्द किया गया। महाराणा रायमल को कुंवर पृथ्वीराज पालकी में उठवाकर अपने डेरों में ले गया³ और सूरजमल तथा सारंगदेव भी अपने सैनिकों के साथ अपने-अपने शिविरों में लौट गये। रात्रि के समय महाराणा के घावों पर पट्टी बंधवाने की व्यवस्था कर कुंवर पृथ्वीराज घोड़े पर सवार होकर अकेला ही सूरजमल के शिविर में पहुंचा। सूरजमल के घावों पर भी पट्टियां बंधी हुई थीं और घावों को सिये हुए थोड़ा ही (१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५-६। वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४७-८। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३६। (३) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४८.।

६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास समय हुआ था, तो भी वह पृथ्वीराज के सम्मान के लिए उठ खड़ा हुआ, जिससे पुनः उसके घाव खुल गये१ और लहू बहने लगा। इतने पर भी सूरजमल विचलित नहीं हुआ और दोनों में निम्नलिखित वार्तालाप हुआ- पृथ्वीराज-काकाजी आप प्रसन्न तो हैं ? सूरजमल-कुंवर, आपके आने से मुझको विशेष प्रसन्नता हुई । पृथ्वीराज-काकाजी, मैंने अभी महाराणा को नहीं देखा है। प्रथम आपको देखने के लिए दौड़कर आया हूं। मुझे बहुत भूख लगी है क्या आपके पास भोजन की कोई वस्तु है ? इसपर भोजन का थाल शीघ्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया और काका-भतीजे ने एक ही थाल में भोजन किया । फिर पृथ्वीराज को पान भी दिया गया, जिसको उसने रवाना होते समय खा लिया । तत्पश्चात् पृथ्वीराज ने कहा-काकाजी मैं और आप प्रातःकाल ही युद्ध को समाप्त करेंगे। सूरजमल-बहुत अच्छा, शीघ्र आना। पृथ्वीराज-काकाजी, स्मरण रखिये कि मैं आपको भाले की नोक जितनी भूमि भी रखने न दूंगा। सूरजमल-मैं भी तुमको एक पलंग जितनी भूमि पर शांति से शासन न करने दूंगा। पृथ्वीराज-युद्ध के समय फिर मिलेंगे, सावधान रहिये ! सूरजमल-बहुत अच्छा । इस वार्तालाप के पीछे पृथ्वीराज लौटकर पुनः अपने डेरों में चला गया२ । दूसरे दिन सवेरे ही फिर युद्ध आरंभ हुआ। सारंगदेव के ३५ तथा ( १) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३५५ । ( २ ) वीरविनोद; दूसरा भाग, पृ० ३४८ । टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३५५-६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३७ ।