भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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: महारावत क्षेमकर्ण . ५३

. प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में लिखा है कि क्षेमकर्ण के चार . क्षेमकर्ण की संतति राणियां थीं, जिनसे सूरजमल, रणवीर, शेखर और रायसाल नामक चार कुंवर एवं पेपकूंचरी नामक पुत्री हुई । क्षेमकर्ण स्वाभिमानी और महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसके समय का कोई शिलालेख या दानपत्र नहीं मिला है। अतएव उसके जीवन पर विशेष क्षेमकर्ण का व्यक्तित्व प्रकाश पड़ना कठिन है। हरिभूषण महाकाव्य से प्रकट है कि वह सत्य का पक्षपाती, मतिमान् और धर्मप्रिय व्यक्ति था¹। लोभ और कृपणता उसमें न थी एवं वह सिंह, शूकर, मृग आदि के आखेट का बड़ा प्रेमी था³। उपर्युक्त काव्य में उसके

जावर और दूसरा दाढ़िमपुर के पास हुआ । उपर्युक्त दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति वि० सं० १५४२ (चैत्रादि १५४६ = ई० स० १४८६) की है, जो इस घटना से लगभग पन्द्रह वर्ष पीछे लिखी गई थी। ऐसी दशा में उक्त प्रशस्ति में उल्लिखित दाढ़िमपुर के युद्ध में ही क्षेमकर्ण की मृत्यु होने का वर्णन विश्वसनीय है। (१) उदयपुर राज्य के प्रथम वर्ग के ठिकाने कानोड़ की ख्यात में लिखा है कि रावत अजा (महाराणा लाखा का पुत्र) के बेटे सारंगदेव और सूरजमल थे । उनमें से सारंगदेव अजा का उत्तराधिकारी हुआ और सूरजमल क्षेमकर्ण का; परन्तु इसके विरुद्ध प्रतापगढ़ राज्य से मिलनेवाली एक पुरानी ख्यात में सारंगदेव को सूरजमल का छोटा भाई बतलाकर उसको क्षेमकर्ण का दूसरा पुत्र लिखा है। इन दोनों में कौनसा कथन ठीक है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता; किन्तु घटनाक्रम पर विचार करने से यह स्पष्ट है कि सूरजमल और सारंगदेव में कोई निकट-सम्बन्ध अवश्य था, जिससे वे सदा साथ रहकर महाराणा रायमल से युद्ध करते रहे और सुख-दुःख में भी सदैव साथ रहे। . (२) नित्यं सत्यपरायणोऽतिमतिमान्धर्मप्रतिष्ठापको . : लुब्धो नो कृपणो न रक्षणपरो नित्यं प्रजानामपि । दण्डे पुत्रकलत्र-शत्रुविषये भिन्नो न भूवल्लभः क्षेमारावतसन्निभः क्षितितले भूतो न भावी विभुः ॥ १४ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग १ । (३) हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग १, श्लोक २१-३१। उपर्युक्त हरिभूषण-महाकाव्य