राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आदि परगने उसे फिर मिल गये। उदयसिंह की इस कार्यवाही से सरदार और भी असंतुष्ट हो गये। उन्होंने परस्पर सलाह कर उसके छोटे भाई रायमल को, जो अपनी ससुराल ईडर में था, राज्य लेने के लिए बुलाया। रायमल उधर से कुछ सैन्य लेकर ब्रह्मा की खेड़ (ईडर राज्य) तथा ऋषभदेव होता हुआ जावर (योगिनीपुर) के निकट पहुंचा, जो समृद्ध क़सवा था। मेवाड़ के सरदार भी अपनी-अपनी जमीयत-सहित उससे जा मिले। जावर के निकट के युद्ध में रायमल की विजय हुई और वहां उसका पूरा अधिकार हो गया। फिर पितृघाती के साथ दाड़िमपुर (दाड़मी गांव) में उसका युद्ध हुआ। उसमें उसकी विजय हुई और क्षेमकर्ण मारा गया¹। तदनंतर और भी कई युद्धों में विजय पाकर रायमल मेवाड़ का स्वामी हुआ तथा उदयसिंह वहां से भाग गया। ख्यातों के अनुसार इस घटना का समय वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के लगभग है²। (१) अवर्षत्संग्रामे सरभसमसौ दाडिमपुरे धराधीशस्तस्मादभवदनणुः शोणितसरित्। स्खलन्मूलस्तु( ? )लोपमितगरिमा क्षेमकुपतिः पतन् तीरेस्यास्तत्तटविटपिवाटे विघटितः॥ ६४ ॥ एकलिंगजी के दक्षिण-द्वार की वि० सं० १५४५ (चैत्रादि १५४६) की प्रशस्ति; भावनगर इंस्क्रिप्शन्स; पृ० १२१। (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२५। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में भी क्षेमकर्ण की मृत्यु का यही सम्वत् दिया है और लिखा है कि वह आश्विन सुदि १० (ता० १ अक्टोबर) बुधवार (? शुक्रवार) को ऋषभदेवजी (मेवाड़ के दक्षिणी भाग के धूलेव गांव का जैन तीर्थ) के पास करमदी के खेड़े में मारा गया। ख्यात और दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में इतना ही अन्तर है कि एक करमदी के खेड़े में और दूसरी दाड़िमपुर में क्षेमकर्ण की मृत्यु बतलाती है। ऋषभदेव से उदयपुर के मार्ग में लगभग बीस मील पर जावर नामक प्राचीन गांव है, जो बड़ा समृद्धिशाली क़सबा था और योगिनीपुर नाम से प्रख्यात था। महाराणा रायमल और उसके बड़े भाई उदयसिंह (ऊदा, पितृघाती) के बीच कई युद्ध हुए थे। उनमें एक