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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत क्षेमकर्ण ५१ जिसमें क्षेमकर्ण की हार हुई¹ । वि० सं० १५२५ ( ई० स० १४६८ ) में प्रतापी महाराणा कुंभकर्ण को मारकर उसका ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह( ऊदा ) मेवाड़ का स्वामी हुआ । क्षेमकर्ण की मृत्यु उसके इस जघन्य कृत्य से राजभक्त सरदारों को उससे अत्यन्त घृणा हो गई और वे अपने भाई, पुत्र आदि को राज्य-सेवा में भेजकर स्वयं उससे किनारा करने एवं उसे राज्यच्युत करने का उद्योग करने लगे । उदयसिंह ने उनकी प्रीति सम्पादन करने का प्रयत्न किया, परंतु जब उसमें उसे सफलता नहीं हुई, तो उसने अपने पड़ोसी राजाओं को मेवाड़ के कुछ इलाक़े देकर सहायक बनाने का प्रयत्न किया। उस समय क्षेमकर्ण भी पितृहंता से जा मिला, जिससे सादड़ी से पाया जाता है कि चंद्रवंशी राजा रंतिदेव के यहां असंख्य पशु बलि होते थे, जिनके लोहू, मांस, मजा आदि ने वहकर नदी का रूप धारण किया, जो चर्मण्वती नाम से प्रसिद्ध हुई । फिर वह स्थान तीर्थ के रूप में परिणत हो गया, जहां वैशाख और कार्तिक में मेला लगता है और आस-पास के गांवों से बहुतसे आदमी जाकर एकत्रित होते हैं। खड़ावदे की वांवड़ी में उपर्युक्त वि० सं० १५४१ (ई० स० १४८४) का शिलालेख लगा हुआ था, जो अब इंदौर स्टेट म्यूजियम् में सुरक्षित है । इस शिलालेख में मलिक बहरी, ख़ानसलह और सुलतान होशंग से लगाकर मालवे के सुलतान ग़यासुद्दीन तक का वर्णन है । खड़ावदे के आस-पास भीलों की अधिक बस्ती थी, जिनको मलिक बहरी ने विजय किया था । खड़ावदे के इस शिलालेख का मेरे आयुष्मान् पुत्र रामेश्वर गौरीशंकर ओझा, एम्० ए० (प्रोफेसर ऑफ़ संस्कृत, गवर्नमेंट कॉलेज, अजमेर) ने इंदौर स्टेट म्यूजियम् का क्यूरेटर (अध्यक्ष) रहते समय काशी की नागरी प्रचारिणी पत्रिका (भाग १२, सं० १६८८, पृ० १-६६) में 'इंदौर म्यूजियम् का एक शिलालेख' - शीर्षक से सम्पादन किया है। (१) शंखोद्वारे रंतिदेवोद्धतायाः स्रोतस्विन्यास्तीरमध्येभ्यभावि । षंङ्गाषंङ्गि क्षेमकर्णद्वितीय- श्चान्वन्व( स्तान्वन्व ) हरीपारसीकेश्वरेण ॥ २६ !! खड़ावदे का शिलालेख ।

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