राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास संबंध में अश्वमेध यज्ञ करने और संपूर्ण भूमि ब्राह्मणों को देने का जो वर्णन दिया है¹, वह अत्युक्ति-पूर्ण है। कवि ने इस काव्य में प्रत्येक स्थले पर अलङ्कारों का प्रयोग किया है, जैसा कि प्रायः काव्यों में होता है तथा यह काव्य क्षेमकर्ण से लगभग दो सौ वर्ष पीछे का बना हुआ है, अतएव उसके विषय में जो कुछ वर्णन किया गया है, वह तत्कालीन परिस्थिति के विल्कुल विपरीत जान पड़ता है। इसमें सन्देह नहीं कि क्षेमकर्ण ने मालवे की सेना-द्वारा अपनी मातृभूमि की बहुत कुछ हानि करवाई, किन्तु उसका परिशोध युद्ध में उसकी मृत्यु-द्वारा हो गया, जो क्षत्रियों के लिए गौरव की बात है। अपने न्यायपूर्ण स्वत्वों की प्राप्ति एवं आश्रित जनों की सहायतार्थ युद्ध में प्राणों की बाज़ी लगा देने के इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं। क्षेमकर्ण ने भी अपने जीवन का यही लक्ष्य रख युद्ध में वीरगति प्राप्त की, जिससे उसका चरित्र उज्जवल हो जाता है। सूरजमल दाड़मी के युद्ध में क्षेमकर्ण के वीरगति प्राप्त करने के साथ ही महाराणा और उसके बीच होनेवाले विरोध का अंत हो गया और संभवतः सादड़ी का स्वामी होना वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के लगभग रावत सूरजमल, क्षेमकर्ण का उत्तराधिकारी हुआ। सादड़ी आदि पर महाराणा कुंभकर्ण की मृत्यु के पश्चात् उदयसिंह के समय क्षेमकर्ण का अधिकार हो गया था वह बना रहा। ¹में दिये हुए श्लोक संख्या २१-३१ से स्पष्ट है कि क्षेमकर्ण विंध्याचल के जंगलों में शिकार खेला करता था। अतएव उसका अधिकांश समय मालवे में ही व्यतीत होना निश्चित है। (१) सम्पूर्णैव मही महाध्वरकृता ऋत्विग्गणोभ्यो मुदा रिङ्गतुङ्ग-तुरङ्गमेधविषयेष्वापादिता दक्षिणा । भाएडागारमिहार्पितं न कतिधा येन स्वयं भूभुजा चन्द्रो नाविशदस्य मेरुरपि तद्वद्धो नु मन्यामहे ॥ १६ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ४