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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 534 में से

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महारावत सूरजमल ५५ मेवाड़ का राज्य पाने के पीछे महाराणा रायमल ने, जो सरल प्रकृति का था, सूरजमल से किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की, परंतु सूरजमल और महाराणा के बीच आन्तरिक सफ़ाई नहीं हुई [Margin: रायमल का सारंगदेव को भैंसरोड़गढ़ की जागीर देना] और मनोमालिन्य बना ही रहा¹। फिर महाराणा ने सारंगदेव-अजावत (महाराणा लाखा का पौत्र) को भी भैंसरोड़गढ़ का ठिकाना जागीर में प्रदान कर दिया²। पितृघाती उदयसिंह (ऊदा) महाराणा रायमल से परास्त होकर इधर-उधर भटकता हुआ मांडू के सुलतान गयासुद्दीन³ के पास सहायता के लिए गया, किंतु वहां पर बिजली गिरने से [Margin: मालवे की सेना के साथ महाराणा के पक्ष में सूरजमल का युद्ध करना] उसकी मृत्यु हो गई। अनन्तर उसके पुत्र सूरजमल और सहसमल को मेवाड़ का राज्य दिलाने के लिए ग़्यासुद्दीन ने चढ़ाई कर चितौड़ को घेर लिया। महाराणा ने अपनी सेना सुसज्जित कर सुलतान की सेना से मुक़ाबिला (१) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जिल्द १, पृ० ३३१ टिप्पणी संख्या १ । (२) वही; जिल्द १, पृ० ३३१। 'वीरविनोद' (भाग १, पृ० ३४७) में महाराणा रायमल का सूरजमल और सारंगदेव को शामिल में वार्षिक पांच लाख रुपये आय की भैंसरोड़गढ़ की जागीर देना लिखा है, किन्तु कुछ स्थल पर केवल सारंगदेव को ही भैंसरोड़गढ़ की जागीर मिलने का उल्लेख मिलता है। मेवाड़ की जागीरदारी प्रथा को देखते हुए 'वीरविनोद' का यह कथन ठीक नहीं जान पड़ता एवं दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को एक ही जागीर शामलात में मिलने के उदाहरण अब तक वहां देखने में नहीं आये। नैणसी भी लिखता है कि सूरजमल का सादड़ी से लेकर गिरवा तक के प्रान्त पर ही अधिकार रहा था (मुहंणोत नैणसी की ख्यात; जि० १, पृ० ६४)। (३) यह ख़िलजी वंश के मांडू के सुलतान महमूदशाह का पुत्र था। वि० सं० १५३२ (ई० स० १४७५) में यह मांडू का सुलतान हुआ (डफ़; दि क्रोनोलोजी ऑफ़ इंडिया; पृ० २०२)। अनन्तर अपने पुत्र नासिरुद्दीन के ससैन्य चढ़ आने पर वि० सं० १५५७ (ई० स० १५००) में यह स्वयं उसको राज्य-मुकुट पहना मांडू के सिंहासन से पृथक् हुआ और उसी वर्ष इसकी मृत्यु हुई।