राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें. महारावत सूरजमल . ६३ महाराणा की अकृपा होने और संग्रामसिंह का पता न होने से चित्तौड़ का राज्य अपने अधिकार में कर लेना सरल समझ सारंगदेव तथा मालवे की मुसलमानी सेना के साथ मेवाड़ में गया और उसने सादड़ी तथा बाठरड़ा के अतिरिक्त नीमच से लगाकर नाई तक का प्रदेश अपने हस्तगत कर लिया। यही नहीं सूरजमल और सारंगदेव मालवे की सेना के साथ चित्तौड़ तक जा पहुंचे। उस समय कुंवर पृथ्वीराज कुंभलगढ़ की तरफ़ था और केवल महाराणा ही चित्तौड़ में था। वहां पर जितनी सेना थी, उसको लेकर वह सूरजमल और सारंगदेव के मुक़ाबले के लिए जा खड़ा हुआ। गंभीरी नदी के तट पर दोनों सेनाओं में घोर युद्ध हुआ। उस समय महा- राणा की सेना थोड़ी होने पर भी वह एक वीर पुरुष की भांति शत्रुओं से लोहा ले रहा था¹। महाराणा के युद्ध में २२ घाव आये। वह जर्जरित होकर रणक्षेत्र में गिरनेवाला ही था एवं उसकी पराजय होना संभव था कि इतने में कुंवर पृथ्वीराज ने अपने एक हज़ार सुसज्जित सवारों के साथ कुंभल- गढ़ की तरफ़ से जाकर विपक्षियों की सेना पर धावा बोल दिया², जिससे युद्ध का रंग एक दम बदल गया। दोनों तरफ़ के बहुतसे आदमी मारे गये। कुंवर पृथ्वीराज, सूरजमल और सारंगदेव भी बहुत घायल हुए। सायंकाल होने पर युद्ध बन्द किया गया। महाराणा रायमल को कुंवर पृथ्वीराज पालकी में उठवाकर अपने डेरों में ले गया³ और सूरजमल तथा सारंगदेव भी अपने सैनिकों के साथ अपने-अपने शिविरों में लौट गये। रात्रि के समय महाराणा के घावों पर पट्टी बंधवाने की व्यवस्था कर कुंवर पृथ्वीराज घोड़े पर सवार होकर अकेला ही सूरजमल के शिविर में पहुंचा। सूरजमल के घावों पर भी पट्टियां बंधी हुई थीं और घावों को सिये हुए थोड़ा ही (१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५-६। वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४७-८। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३६। (३) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४८.।