राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास समय हुआ था, तो भी वह पृथ्वीराज के सम्मान के लिए उठ खड़ा हुआ, जिससे पुनः उसके घाव खुल गये१ और लहू बहने लगा। इतने पर भी सूरजमल विचलित नहीं हुआ और दोनों में निम्नलिखित वार्तालाप हुआ- पृथ्वीराज-काकाजी आप प्रसन्न तो हैं ? सूरजमल-कुंवर, आपके आने से मुझको विशेष प्रसन्नता हुई । पृथ्वीराज-काकाजी, मैंने अभी महाराणा को नहीं देखा है। प्रथम आपको देखने के लिए दौड़कर आया हूं। मुझे बहुत भूख लगी है क्या आपके पास भोजन की कोई वस्तु है ? इसपर भोजन का थाल शीघ्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया और काका-भतीजे ने एक ही थाल में भोजन किया । फिर पृथ्वीराज को पान भी दिया गया, जिसको उसने रवाना होते समय खा लिया । तत्पश्चात् पृथ्वीराज ने कहा-काकाजी मैं और आप प्रातःकाल ही युद्ध को समाप्त करेंगे। सूरजमल-बहुत अच्छा, शीघ्र आना। पृथ्वीराज-काकाजी, स्मरण रखिये कि मैं आपको भाले की नोक जितनी भूमि भी रखने न दूंगा। सूरजमल-मैं भी तुमको एक पलंग जितनी भूमि पर शांति से शासन न करने दूंगा। पृथ्वीराज-युद्ध के समय फिर मिलेंगे, सावधान रहिये ! सूरजमल-बहुत अच्छा । इस वार्तालाप के पीछे पृथ्वीराज लौटकर पुनः अपने डेरों में चला गया२ । दूसरे दिन सवेरे ही फिर युद्ध आरंभ हुआ। सारंगदेव के ३५ तथा ( १) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३५५ । ( २ ) वीरविनोद; दूसरा भाग, पृ० ३४८ । टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३५५-६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३७ ।