भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 534 में से

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पृष्ठ 105

६२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास अनन्तर जब पृथ्वीराज का उपद्रव बढ़ता दिखाई पड़ा तो सूरजमल और सारंगदेव प्राणों के भय से विवश होकर मांडू चले गये और वहां के सूरजमल का मालवे की सुलतान नासिरुद्दीन को मेवाड़-राज्य की सारी सेना के साथ जाकर परिस्थिति से परिचित कर उन्होंने उसे अपनी सहा- महाराणा से युद्ध करना यता के लिए उद्यत किया¹। मांडू (मालवे) के सुल- तान अपने पड़ौसी मेवाड़ के हिन्दू-राज्य की बढ़ी हुई शक्ति को अपने लिए पूर्ण घातक समझते थे, क्योंकि उनकी समय-समय पर मेवाड़-राज्य के द्वारा बहुत क्षति हुई थी। इसलिए वहां के सुलतान ने पूर्व-पराजयों का बदला लेने का यह अच्छा अवसर समझ सूरजमल और सारंगदेव को सहायता देना स्वीकार किया। सूरजमल कुंवर जयमल के मारे जाने, पृथ्वीराज पर (१) सुलतान नासिरुद्दीन मुहम्मद हि० स० ९०६ (वि० सं० १५५७ = ई० स० १५००) के लगभग अपने पिता गयासुद्दीन की विद्यमानता में ही मांडू का सुलतान हुआ। 'तारीख़ फ़िरिश्ता' से ज्ञात होता है कि वि० सं० १५६० (ई० स० १५०३) में नासिरशाह ने मेवाड़ पर चढ़ाई की थी और वहां से नज़राने के तौर पर बहुत से रुपये आदि लेकर वह लौटा था (जि० ४, पृ० २४३ ब्रिग्ज़-संपादित)। घटना- क्रम पर विचार करने से यह अनुमान होता है कि वि० सं० १५६३ (ई० स० १५०६) के लगभग सूरजमल और सारंगदेव मांडू के सुलतान नासिरुद्दीन के पास पहुंचे और वहां से सैनिक सहायता प्राप्तकर महाराणा रायमल से युद्ध के लिए प्रवृत्त हुए होंगे। कर्नल टॉड सूरजमल और सारंगदेव का मांडू के सुलतान मुज़फ़्फ़र के पास जाकर वहां से सैनिक सहायता प्राप्त करना लिखता है (राजस्थान; जि० १, पृ० ३४५ क्रुक-संपादित)। किन्तु मांडू के सुलतानों में मुज़फ़्फ़र नाम का कोई सुलतान नहीं हुआ, जिससे उसका यह कथन ज्यों का त्यों मानने के योग्य नहीं है। संभव है कि सूरजमल और सारंगदेव के साथ सुलतान नासिरशाह ने अपने सरदार ज़फ़रख़ां को, जिसका नाम एकलिंगजी के दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में मुदाफ़र लिखा है और जो पहले भी गयासुद्दीन के समय मेवाड़ पर सेना लेकर गया था, भेजा हो। फ़ारसी लिपि की अपूर्णता अथवा मालवे के इतिहास का पूरा ज्ञान न होने के कारण ज़फ़रख़ां और मुज़फ़्फ़रख़ां समान शब्द होने से उस (टॉड) ने उसको भूल से मुज़फ़्फ़र समझ, मांडू का सुलतान लिख दिया हो। इसी प्रकार एकलिंगजी के मंदिर की दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति के रचयिता ने भी ज़फ़रख़ां का नाम मुज़फ़्फ़र समझ उसका विकृत रूप मुदाफ़र कर दिया हो।