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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत सूरजमल ६१ इस घटना के कुछ दिनों पीछे कुंवर जयमल, सोलंकी सुरताण का अपमान करने के कारण सांखला रतना के हाथ से मारा गया १। कुंभलगढ़ में रहते समय कुंवर पृथ्वीराज ने पहाड़ी प्रांत के लोगों सारंगदेव का सूरजमल के का उपद्रव शांत कर दिया था। इससे महाराणा की पास जाकर रहना अप्रसन्नता दूर हो गई। वह सारंगदेव से द्वेष रखता था । इसलिए महाराणा की प्रसन्नता का अवसर पाकर उस (पृथ्वीराज) ने उस (महाराणा) से निवेदन कराया कि आपने सारंगदेव को पांच लाख रुपये वार्षिक आय की जागीर प्रदान की है, जो अधिक है। यदि इसी प्रकार छोटे भाइयों को इतनी बड़ी जागीरें मिलतीं तो अब तक आपके पास मेवाड़ का कुछ भी हिस्सा बाक़ी न रहता। इसपर महाराणा ने उत्तर भेजा कि हमने तो भैंसरोड़गढ़ दे दिया । अगर तुम इसे अनुचित समझते हो तो परस्पर समझ लो। यह सूचना पाते ही पृथ्वीराज ने दो हज़ार सवारों के साथ भैंसरोड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी। सारंगदेव वहां से भैंसरोड़गढ़ का परित्याग कर २ सूरजमल से मिल गया । बड़ी सादड़ी से गिरवा तक का सारा प्रदेश सूरजमल के अधिकार में होना महाराणा रायमल को भी पसंद न था । इसलिए पृथ्वीराज उस (सूरजमल) से भी छेड़-छाड़ करने लगा । पीथल खग हाथ्यां पकड़, वह सांगा किय वार । सारंग मेले सीस पर, उणवर साम उबार ॥ उपर्युक्त दोहे से स्पष्ट है कि महाराणा के कुंवरों के पारस्परिक कलह में संग्रामसिंह पर पृथ्वीराज के किये हुए प्रहार सारंगदेव ने अपने ऊपर मेले थे। (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; भाग १, पृ० ४४-५ । टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३४४ । वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४५-६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३५-६ । (२) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४७ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३५ ।