राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घाव लगे देखकर राठोड़ बीदा१ (ऊदावत) ने, जो मारवाड़ की तरफ़ से वहां दर्शनों के लिए गया हुआ था, उसको घोड़े से उतारकर उसकी चिकित्सा की। इतने में जयमल भी वहां जा पहुंचा और उसने उससे संग्रामसिंह को मांगा, किन्तु वीर राठोड़ बीदा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। फिर उसने संग्रामसिंह को तो घोड़े पर देसूरी की तरफ़ रवाना किया और स्वयं अपने राजपूतों-सहित वीरतापूर्वक जयमल से युद्ध करता हुआ काम आया। उपर्युक्त सेवंत्री गांव के रूपनारायण के मंदिर में राठोड़ बीदा की स्मारक छत्री बनी हुई है। उसमें वि० सं० १५६१ ज्येष्ठ वदि ७ (ई० स० १५०४ ता ६ मई) को उसका महाराणा रायमल के कुंवर संग्रामसिंह की सहायतार्थ लड़कर मारे जाने का उल्लेख है२। फिर निराश होकर जयमल कुंभलगढ़ चला गया। जब महाराणा को यह संवाद ज्ञात हुआ तो उसने पृथ्वीराज को कहला भेजा कि तूने मेरी विद्यमानता में राज्य-लोभ से प्रेरित होकर यह संघर्ष मचाया और मेरा कुछ भी लिहाज़ न किया, इसलिए तू मुझे अपना मुंह मत दिखलाना। निदान घाव अच्छे होने पर पृथ्वीराज कुंभलगढ़३ और सारंगदेव अपने स्थान को चला गया। (१) यह मारवाड़ के राठोड़ों के पूर्वज राव सलखा के दूसरे पुत्र जैतमाल का वंशधर था। जैतमाल के वंशज जैतमालोत कहलाये। उसका पुत्र वैजल, पौत्र कांधल और प्रपौत्र ऊदल हुआ। ऊदल का बेटा मोकल था, जिसने मोकलसर बसाया। मोकल का पुत्र बीदा था, जिसके वंश के इस समय केलवे के स्वामी हैं, जो उदयपुर राज्य के दूसरी श्रेणी के सरदारों में है (मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३२)। (२) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३३२ टिप्पण २। (३) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४३-४। कर्नल टॉड-कृत 'राजस्थान' में महाराणा के कुंवरों के बीच जन्मपत्रियां दिखलाने के समय झगड़ा होने का कुछ भी वर्णन नहीं है और संग्रामसिंह की एक आंख भीमल गांव के झगड़े में चली जाना लिखा है (जि० १, पृ० ३४१-२)। टॉड-कृत 'राजस्थान' और 'वीरविनोद' में महाराणा के कुंवरों के संघर्ष में संबंध सूरजमल का ही उल्लेख है, परन्तु इस सम्बन्ध में नीचे लिखा एक प्राचीन पद्य प्रसिद्ध है-