राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत सूरजमल ५६ स्वामी होगा। इसपर क्रोध में आकर पृथ्वीराज तथा जयमल ने ज्योतिषी की भविष्यवाणी को मिथ्या करने के लिए संग्रामसिंह को मार डालना चाहा। फलस्वरूप भाइयों के बीच तलवारें चलने लगीं और पृथ्वीराज के हाथ की तलवार से संग्रामसिंह की एक आंख जाती रही। इतने में रावत सारंगदेव जा पहुंचा। उसने उन तीनों को रोककर युद्ध से निवृत्त किया और फिर संग्रामसिंह को अपने यहां ले जाकर उसकी चिकित्सा की। उसने आपस का विरोध बढ़ता देख महाराणा के उपर्युक्त तीनों कुंवरों को समझाया कि तुम परस्पर क्यों कटे-मरते हो, ज्योतिषियों के कथन पर विश्वास नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त अभी तो महाराणा विद्यमान हैं, इसलिए ऐसा विचार करना ही बुरी बात है। फिर भी यदि तुमको यह बात स्पष्ट करनी है तो भीमल गांव के देवी के मंदिर की पुजारिन चारणी१ से जाकर पूछ लो। इसपर उन्होंने सारंगदेव की बात स्वीकार कर ली। तदनुसार वि० सं० १५६१ के ज्येष्ठ (ई० स० १५०४ मई) मास में एक दिन कुंवर पृथ्वीराज, जयमल और संग्रामसिंह सारंगदेव-सहित अपने भाग्य का निर्णय कराने के लिए भीमल गांव की चारणी के पास गये। उस (चारणी) ने उनके आने का अभिप्राय समझ राजयोग संग्रामसिंह को बतलाया और मेवाड़ के किनारे की भूमि सूरजमल के अधिकार में रहने की बात कही। यह सुनते ही पृथ्वीराज तथा जयमल संग्रामसिंह पर टूट पड़े। इतने में सारंगदेव फुर्ती के साथ खड़ा होकर संग्रामसिंह पर किये हुए प्रहार अपने ऊपर झेलने लगा। परिणाम यह हुआ कि पृथ्वीराज और सारंगदेव तो अधिक घायल होकर वहां गिर गये और संग्रामसिंह घायल होने पर भी अपने घोड़े पर सवार होकर वहां से रवाना हुआ। जयमल ने, जो अधिक घायल नहीं हुआ था, उसका पीछा किया, परंतु संग्रामसिंह सही-सलामत सेवंत्री गांव में जा पहुंचा। उसके शरीर पर (१) यह तुंगल कुल के चारण की पुत्री थी और इसका नाम बीरी था (वीर- विनोद; पहला भाग, पृ० ३४३)। इसे लोग देवी का अवतार मानते थे।