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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 534 में से

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५८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवावालों से दंड लिया तथा अपना यश बढ़ायां। इस युद्ध का महाराणा रायमल की प्रशंसा में बने हुए 'रायमल रासा'-नामक भाषा-काव्य में विस्तृत वर्णन है। महाराणा के साथ युद्ध में जानेवाले जिन प्रतिष्ठित सरदारों को युद्ध के समय घोड़े दिये गये, उनमें रावत सूरजमल-क्षेमकर्णोत को सूरजपसाव घोड़ा दिये जाने का उल्लेख है^२, जिससे ज्ञात होता है कि उस समय सूरजमल ने महाराणा की सेना में रह- कर मालवे के सुलतान तथा ज़फ़रखां की चढ़ाइयों में मुसलमान सेना से युद्ध किया था। इससे यह भी अनुमान होता है कि महाराणा और सूरजमल के बीच जो मनो-मालिन्य था, वह मिटकर सूरजमल महाराणा के पक्ष में लड़ने के लिए गया था। फ़ारसी तवारीखों में ग़यासशाह(ग़यासुद्दीन), ज़फ़रखां और महाराणा के बीच होनेवाले युद्धों का वर्णन नहीं है, परंतु महाराणा रायमल के समय की उपर्युक्त चैत्रादि वि० सं० १५४६ (ई० स० १४८६) की एकलिङ्गजी के दक्षिण-द्वार की प्रशस्ति में इन दोनों युद्ध का स्पष्ट उल्लेख है। इससे निश्चय है कि उक्त दोनों युद्ध वि० सं० १५४६ (ई० स० १४८६) के पूर्व और वि० सं० १५३० (ई० स० १४७३) के पीछे किसी समय हुए। महाराणा रायमल के पृथ्वीराज, जयमल, संग्रामसिंह (सांगा) आदि १३ पुत्र थे। ज्येष्ठ होने से कुंवर पृथ्वीराज राज्य का स्वत्वाधिकारी था ही, परंतु जयमल पर महाराणा की विशेष प्रीति होने महाराणा के कुंवरों में पारस्परिक द्वेष की वृद्धि से वह भी राज्य-प्राप्ति की आशा से मुक्त न था। संग्रामसिंह शांत और गंभीर प्रकृति का पुरुष था एवं उसके ग्रह बड़े उच्च थे, जिससे पृथ्वीराज और जयमल उससे डाह रखते थे। एक दिन तीनों भाइयों ने किसी ज्योतिषी को अपनी- अपनी जन्मपत्रियां बतलाईं। उसने उत्तर दिया कि पृथ्वीराज और जयमल पिता की विद्यमानता में ही मृत्यु को प्राप्त होंगे एवं संग्रामसिंह राज्य का (१) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३४१ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३२६ । (२) वीरविनोद; पहला भाग, पृ० ३३६ ।

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