राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास महाराणा कुंभकर्ण और क्षेमकर्ण सौतेले भाई थे, इसलिए उन दोनों के बीच परस्पर प्रेम में कमी होना स्वाभाविक बात थी। अब इस जागीर के बखेड़े ने और भी द्वेष बढ़ा दिया। निदान अप्रसन्न होकर क्षेमकर्ण ने चित्तोड़ का परित्याग कर दिया और अपने राजपूतों की सहायता से उसने मेवाड़ में बड़ी सादड़ी¹ तथा उसके आस-पास का समग्र प्रदेश बल- पूर्वक अपने अधिकार में कर लिया²। महाराणा कुंभकर्ण को क्षेमकर्ण की यह बात सहन नहीं हुई और उसने अपनी सेना भेज सादड़ी और उसके समीप का प्रदेश उससे छीन लिया³। मेवाड़ में महाराणा द्वारा सादड़ी आदि ले लिये जाने पर क्षेमकर्ण मालवे के सुलतान महमूद ख़िलजी⁴ के पास चला (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में कहीं-कहीं वि० सं० १४७४ (ई० स० १४१७) में क्षेमकर्ण को सादड़ी की जागीर मिलने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है क्योंकि उस समय तो उसका पितामह महाराणा लखसिंह (लाखा) विद्यमान था। संभव है कि ख्यात लेखकों ने यहां ग़लती खाई हो और वि० सं० १४६४ (ई० स० १४३७) के स्थान में १४७४ लिख दिया हो। जब उस (क्षेमकर्ण) को महाराणा ने सादड़ी की जागीर दे दी थी, तो फिर परस्पर विरोध होने का कोई कारण नहीं हो सकता। संभव तो यही है कि क्षेमकर्ण ने वि० सं० १४६४ (ई० स० १४३७) में महाराणा की इच्छा के विरुद्ध सादड़ी पर अधिकार किया हो। मुंहणोत नैणसी की ख्यात में क्षेमकर्ण का 'तेजमाल की सादड़ी' पर अधिकार होना लिखा है (जि० १, पृ० ६३), जो उदयपुर से ५० मील दक्षिण-पूर्व में है। यह मेवाड़ में सोलह उमरावों (प्रथम वर्ग) का ठिकाना है और प्रतिष्ठा में सर्वोपरि है। यहां के सरदार झाला हैं और उनकी ख्यात में लिखा है कि महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) ने झाला राज देदा को सादड़ी का पट्टा प्रदान किया था। इसके पूर्व उसके पूर्वजों की जागीर दूसरी थी। (२) महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास; वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५३। (३) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०५३। (४) यह अज़ीम हुमायूं का पुत्र और ग़ोरी ख़ानदान के मांडू के सुलतान होशंग का सरदार था। वि० सं० १४६३ (ई० स० १४३६) में होशंग के पौत्र और