राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह ( बीका ) तक ४७ की सेना को नष्ट किया। सांभर, जालोर आदि विजय कर उसने अपने बाहुबल से गुजरात के सुलतान अहमदशाह को परास्त किया। हाड़ों से उसने जहाज़पुर छीना लिया था और मंडोवर का राज्य राव रणमल को दिलवाया था। वह बड़ा दानी था। उसने सोने और चांदी के २५ तुलादान किये, जिनमें से एक स्वर्ण तुलादान पुष्कर के आदिवराह के मंदिर में किया था। जो ब्राह्मण कृषक हो गये थे, उनके लिए उसने सांग (छः अंगों- सहित) वेद पढ़ाने की व्यवस्था की थी। उसके कुंभकर्ण (कुंभा), क्षेमकर्ण (खींवा) आदि सात पुत्र हुए। उनमें से कुंभकर्ण मेवाड़ का स्वामी हुआ, जिसके वंशधर मेवाड़ के महाराणा हैं और क्षेमकर्ण के वंशज प्रतापगढ़ के महारावत हैं, जिनका सविस्तर वर्णन आगे किया जायगा। क्षेमकर्ण ( क्षेमसिंह ) क्षेमकर्ण (जिसके दूसरे नाम क्षेमसिंह, खेमा या खींवा भी मिलते हैं) का जन्म महाराणा मोकल की सोलंकिनी राणी केसरकुंवरी के, जो राव क्षेमकर्ण का जन्म सोढ़ा की पुत्री और सांतल की पौत्री थी, उदर से हुआ था। वि० सं० १४६० (ई० स० १४३३) में महाराणा मोकल गुजरात के सुलतान अहमदशाह को दबाने के लिए चित्तौड़ से रवाना हुआ और झीलवाड़े की तरफ़ जाता हुआ बागोर के मुक़ाम पर महाराणा कुंभकर्ण और अपने पितामह महाराणा क्षेत्रसिंह (खेता) के दासी- क्षेमकर्ण के बीच विरोध होना पुत्र चाचा और मेरा के हाथ से मारा गया। तब उसका ज्येष्ठ पुत्र कुंभकर्ण (कुंभा) मेवाड़ की राजगद्दी पर बैठा। फिर महाराणा कुंभकर्ण ने अपने छोटे भाइयों को प्रचलित रीति के अनुसार जागीरें देकर पृथक् करना चाहा। क्षेमकर्ण के लिए उसने जो जागीर निकाली, वह उस (क्षेमकर्ण) को पसंद नहीं हुई, क्योंकि वह उसके पद और मान-मर्यादा की दृष्टि से अपर्याप्त थी। ( १ ) उदयपुर राज्य के बड़वा देवीदान की ख्यात।