भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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४६. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

घायल किया, जिसपर गुजरातवालों ने उक्त हार का बदला लेने के लिए सामन्तसिंह पर चढ़ाई की । उस समय सामंतसिंह के सरदार उससे विद्रोही हो गये थे, अतएव उस (सामंतसिंह) को सोलंक्तियों के मुक़ाबले में परास्त होना पड़ा और वह मेवाड़ छोड़कर वागड़ में चला गया । वहां उसने गुहिल-राज्य की वि० सं० १२३६ (ई० स० ११७६) के पूर्व स्थापना कर बड़ोदा (वटपद्रक) में अपनी राजधानी नियत की । फिर महारावल डूंगरसिंह के समय डूंगरपुर आबाद होकर वही वागड़ की राजधानी हुई। तदनन्तर महारावल उदयसिंह (प्रथम) ने अपने राज्य के दो विभाग कर ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को राजधानी डूंगरपुर-सहित वागड़ का पश्चिमी भाग और छोटे पुत्र जगमाल को वागड़ का पूर्वी भाग दिया, जिसकी राजधानी बांसवाड़ा है। सामंतसिंह के अधिकार से मेवाड़ का राज्य निकल जाने पर उसके छोटे भाई कुमारसिंह ने सोलंक्तियों को प्रसन्न कर पुनः मेवाड़ का राज्य पाया। उसके पीछे मथनसिंह, पद्मसिंह और जैत्रसिंह क्रमशः मेवाड़ के राजा हुए। जैत्रसिंह वीर राजा था। उसकी गुजरात के सोलंक्तियों, नाडोल के चौहानों और मालवे के परमारों के साथ लड़ाइयां हुईं, जिनमें उसकी विजय हुई। अपने शत्रुओं को परास्तकर जैत्रसिंह ने चित्तौड़ पर पीछा मेवाड़ का अधिकार स्थापित किया। जैत्रसिंह के पीछे तेजसिंह, समरसिंह और रत्नसिंह क्रमशः मेवाड़ के स्वामी हुए। रत्नसिंह ने केवल एक वर्ष तक राज्य किया । उसके समय में दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़ पर चढ़ाई हुई, जिसमें रत्नसिंह मारा गया और चित्तौड़ पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। रत्नसिंह के साथ चित्तौड़ की रावल शाखा की समाप्ति हुई । वि० सं० १३८२ (ई० स० १३२५) के आस- पास सीसोदे के राणा हम्मीरसिंह ने चित्तौड़ पीछा अपने अधीन किया। तब से चित्तौड़ पर गुहिलवंश की सीसोदिया शाखा का राज्य स्थिर हुआ । हम्मीरसिंह के पीछे क्रमशः क्षेत्रसिंह (खेता), लक्षसिंह (लाखा) और मोकल चित्तौड़ के स्वामी हुए। मोकल ने नागोर पर चढ़ाई कर फ़ीरोज़खां दंदानी