राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३७ प्रतिहार राज्य में निर्बलता आ गई थी, जिसका लाभ उठाकर उसके समय में 'बदायूं' के राष्ट्रकूट (राठोड़) राजाओं में से (जो उन दिनों उधर शक्तिशाली होते जाते थे) भुवनपाल के पुत्र गोपाल ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया, परंतु गोपाल के वंश का वहां अधिक समय तक अधिकार रहना पाया नहीं जाता । शीघ्र ही गाहड़वाल चन्द्रदेव ने, जिसने सारे पांचाल (गंगा और यमुना के बीच का प्रदेश) पर अधिकार जमा लिया था, उधर बढ़- कर कन्नौज के प्रतिहार-राज्य पर अधिकार कर लिया और वहां अपनी राजधानी स्थिर की। इस प्रकार प्रतिहारों के महाराज्य का अन्त हो गया। इन प्रतिहारों के राज्य के उन्नतिकाल में अधिकांश राजपूताना, मालवा, गुजरात, काठियावाड़, सारा पश्चिमोत्तर प्रदेश एवं बिहार का पश्चिमी विभाग भी उनके अधीन था, जहां से उनके शिलालेख, ताम्रपत्र आदि मिलते हैं । फिर उनके राज्य की अवनति के समय उनके सामन्त स्वतंत्र हो गये। अब तो कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहारों के वंश में केवल बुंदेलखंड में नागोद का राज्य एवं अलिपुरा का ठिकाना तथा कुछ और छोटे-छोटे ठिकाने रह गये हैं । भाटों की पुस्तकों में नागोद के राजाओं की जो वंशावली मिलती है, उसमें सब पुराने नाम कृत्रिम हैं। परमार तथा सोलंकी कन्नौज के प्रतिहार-राज्य का पतन होने पर मालवे के परमार, जो संभवतः प्रतिहारों के सामंत थे, स्वाधीन नृपति बन गये । उनमें श्रीहर्ष, मुंज, सिंधुराज, भोज, उदयादित्य आदि प्रतापी और विद्वान् राजा हुए। अनन्तर उदयादित्य के पुत्र नरवर्मा और पौत्र यशोवर्मा के समय गुजरात के प्रसिद्ध सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की मालवे पर चढ़ाइयां होने लगीं। नरवर्मा तो सोलंकियों के साथ की लड़ाई में मारा गया, पर यशो- वर्मा के समय परमार पराजित हो गये और मालवे पर सोलंकियों का अधिकार हो गया संभव है कि मालवे के कुछ भूमि-भाग पर सोलंकियों के समय भी परमारों ने किसी प्रकार अपना अधिकार रक्खा हो,