राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३३ छीन लिया। उस समय से ही इन भीनमाल के प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज स्थिर हुई। उसने आंध्र, सैंधव, विदर्भ (बरार), कलिंग और बंग के राजाओं को जीता तथा आनर्त, मालव, किरात, तुरुष्क, वत्स और मत्स्य आदि देशों के पहाड़ी क़िले भी ले लिये, ऐसा उपर्युक्त ग्वालियर की प्रशस्ति में लिखा मिलता है। राजपूताने में जिस नाहड़राव पड़िहार का नाम बहुत प्रसिद्ध है और जिसके विषय में पुष्कर में घाट बनवाने की ख्याति चली आती है, वह यही नागभट्ट (नाहड़) होना चाहिये। उसके समय का एक शिलालेख वि० सं० ८७२ (ई० स० ८१५) का बुचकला (जोधपुर राज्य के बिलाड़ा परगने में) से मिला है¹। नागभट्ट का स्वर्गवास वि० सं० ८६० भाद्रपद सुदि ५ (ई० स० ८३३ ता० २३ अगस्त) को हुआ², ऐसा जैन विद्वान् चन्द्रप्रभसूरि ने अपने 'प्रभावकचरित' में लिखा है। (६) रामभद्र (संख्या ५ का पुत्र)। (१) ॰॰॰॰॰॰॰॰संवत्सरशते ८७२ चैत्रस्य सितपक्षस्य पंचम्यां निवेसि(शि)ता महाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीवत्सराजदेवपादानुध्यात- परमभट्टारकमहाराजाधि(धि)राजपरमेश्वरश्रीनागभट्टदेवस्वविषये प्रवर्द्ध- मानराज्ये राज्यघङ्ककडूग्रामे राज्ञी जायावली प्रतिहार स्व(स)गोत्रश्रीबपुक- पुत्रः॰॰॰॰॰। एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० ६, पृ० १६६-२००। (२) विक्रमतो वर्षाणां शताष्टके सनवतौ च भाद्रपदे। शुक्रे सितपंचम्यां चन्द्रे चित्राख्यऋक्षस्थे ॥ ७२० ॥ ... माभूत्संवत्सरोऽसौ वसुशतनवतेर्मा च ऋक्षेषु चित्रा धिग्मासं तं नभस्यं द्वयमपि स खलः शुक्लपक्षोपि यातु। संक्रान्तिर्या च सिंहे विशतु हुतभुजं पंचमी यातु शुक्रे गंगातोयाग्निमध्ये त्रिदिवमुपगतो यत्र नागावलोकः ॥७२५॥ 'प्रभावकचरित' में बप्पभट्टिप्रबंध; पृ० १७७। नागरी प्रचारिणी पत्रिका; भाग ६, पृ० ३२३-२४ टि०। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १८०। ५