राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शाली हो गये। तदनन्तर उन्होंने चावड़ों से भीनमाल का राज्य छीन लिया और फिर कन्नौज के महाराज्य को अपने हस्तगत कर वहीं अपनी राजधानी स्थिर की । ग्वालियर से मिले हुए रघुवंशी प्रतिहार राजा भोजदेव (प्रथम) के शिलालेख में, जो वि० सं० ६०० और ६५० (ई० स० ८४३ और ८६३) के बीच का है, लिखा है—"सूर्य-वंश में मनु, इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ आदि राजा हुए। उनके वंश में रावण का संहार करनेवाले रामचन्द्र हुए, जिनका प्रतिहार (ड्योढ़ीवान) उनका छोटा भाई लक्ष्मण था¹।" इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण को प्रतिहार का कार्य मिलने से उसके वंशज प्रतिहार कहलाने लगे। उक्त भोजदेव के पुत्र महेन्द्रपाल (दूसरा) की प्रशंसा में कवि राजशेखर ने अपने ग्रंथों में उसे 'रघुकुलतिलक²', 'रघुग्रामणी³' और 'रघुवंशमुक्तामणि⁴' लिखा है, जिससे सिद्ध है कि वे रघुवंशी थे। इस राजवंश की क्रम-पूर्वक वंशावली नागभट्ट से आरंभ होती है, जो नीचे लिखे अनुसार है— (१) नागभट्ट। (२) ककुत्स्थ (संख्या १ का भतीजा)। (३) देवराज (संख्या २ का छोटा भाई)। (४) वत्सराज (संख्या ३ का पुत्र)। (५) नागभट्ट (दूसरा, संख्या ४ का पुत्र)—उसको नागावलोक भी कहते थे। उसने चक्रायुध को परास्त कर कन्नौज का साम्राज्य भी (१) देखो ऊपर पृ० ३१, टिप्पण ३। मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ टि० २। (२) रघुकुलतिलको महेंद्रपालः...। विद्धशाल भंजिका; १।६। (३) देवो यस्य महेंद्रपालनृपतिः शिष्यो रघुग्रामणिः....। बालभारत; १।११। (४) तेन(= श्रीमहीपालदेवेन) च रघुवंशमुक्तामणिना आर्यावर्त- महाराजाधिराजेन श्रीनिर्भयनरेन्द्रनंदनेनाधिकृताः सभासदः...। बालभारत।