राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(७) भोजदेव (संख्या ६ का पुत्र)—उसको मिहिर और आदि- वराह भी कहते थे। ताम्रपत्र और शिलालेखों के अतिरिक्त उसके चांदी तथा तांबे के सिक्के भी मिले हैं, जिनमें एक तरफ़ 'श्रीमदादिवराह' लेख और दूसरी तरफ़ 'नरवराह' की मूर्ति है। उसके दो तांबे के सिक्के प्रतापगढ़ राज्य से भी हमें मिले हैं। (८) महेंद्रपाल (संख्या ७ का पुत्र)। (६) महीपाल (संख्या ८ का पुत्र)। (१०) भोज (दूसरा, संख्या ६ का भाई)। (११) विनायकपाल (संख्या १० का छोटा भाई)। (१२) महेंद्रपाल (दूसरा, संख्या ११ का पुत्र)—उसके समय के उक्त घोटार्सी के वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ९४६ ता० १७ अक्टूबर) के शिलालेख से प्रकट है कि घोटार्सी के आस-पास का प्रदेश प्रतिहारों के सामन्त चौहानों के अधिकार में था। चौहान इंद्रराज ने, जो गोविंदराज का पुत्र और दुर्लभराज का पौत्र था, घोटार्सी गांव में अपने नाम से 'इंद्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य-मंदिर बनवाया। तब उसके लिए महेंद्रपाल की तरफ़ से 'धारापद्रक' (धरियावद, मेवाड़) नामक गांव तथा उस गांव से पृथक् उत्तर की ओर का कच्छुक नाम का रहँट भेंट किया गया। उसकी सनद पर उस(महेंद्रपाल)के तंत्रपाल (शासक, हाकिम), महासामंत और महादंडनायक माधव ने, जो दामोदर का पुत्र था तथा कार्यवशात् उज्जैन गया था, हस्ताक्षर किये थे। इसी भांति उसपर उस प्रदेश के शासक विदग्ध के भी हस्ताक्षर हुए थे¹। (१) स्वस्ति श्रीमदुज्जयन्त्या(यिन्यां) महासामन्तदण्डनायकश्री- माधवः ॥ तथा मण्डपिकायां परमेश्वरपादोपजीविब(व)लाधी(धि)- कृतश्रीकोक्कटनियुक्तश्रीशम्मे(शर्मणि)च व्यापारं कुर्व्वते इत्यस्मिन् काले वर्तमाने इहैव श्रीमदुज्जयन्त्यां(यिन्यां) कार्याभ्यागततंत्र- (न्त्र)पालमहासामन्तमहादण्डनायकश्रीमाधवेन (धवैः) श्रीदामोदरसुतेन-