भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३५ 'इन्द्रराजादित्यदेव' के मंदिर के साथ लगे हुए या उससे सम्बन्ध रखने- वाले 'वटयक्षिणी देवी' के मंदिर और मठ के लिए भी महेंद्रपाल ने वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० १७ आक्टोबर) को 'खर्प्परपद्रक' (खेरोट, प्रतापगढ़ राज्य) गांव भेंट किया था, जिसकी सनद पर भी उक्त विदग्ध ने हस्ताक्षर किये थे¹। इस 'इंद्राजादित्यदेव' के मंदिर को मेवाड़ (तः) चाहमानान्वयमहा सामन्तश्रीइन्द्रराज(स्य) श्रीदुर्ल्लभराजसुतस्य प्रार्थनया(या)। श्रीविदग्धभोगावाप्तये धारापद्रकग्रामे समुपगतान् सर्व्वराजपुरुषान् ब्रा(ब्रा)ह्मणोत्तरीयान् प्रतिनिवासि(सि)जनपदांश्च वो(बो)धयत्यस्तु वस्संविदितं श्रीमहाकालदेवयतने सुस्नात्वा महादेव- मभ्यर्च्य मातापित्रोरात्मनश्च सुपुण्यकर्म्मयशोभिवृद्धये परलोकहिताय जलचन्द्रचपलजीवितंतेय(लं जीवितमवेत्य) क्षणदृष्टसंपदा(नष्टाः संपदः) समन(समनु)चिन्त्य(चिन्त्य) मीनसंक्रन्तौ(संक्रान्तौ) श्रीनित्यप्रमुदितदेवप्रति[बद्ध]घोंटार्षिकस्थाने श्रीमदिन्द्रादित्यदेवस्य खण्डस्फुटितसमारचनाय व(ब)लिचरुशत्रु(सत्र)प्रवर्त्तनाय ग्रामोयं स्वसीमापर्यन्त(न्तः) सवृक्षमाला[कु]लं(लः) सकाष्ट(ष्ठ)- तृणगोप्रचारं(रः) सजलस्थलसमेतं(तः) चतुष्कंकट(ष्कंटक)- विशुद्ध(द्धः) भागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिस्कंधकमा[र्गा]णाकादि- राजभाव्यैस्सहितं(तः) उदकपूर्वेकेन शासनेन प्रदत्तं(त्तः)॥ मत्वैतदस्मद्वङ्ग्श(द्वंश)जैरन्यैश्च धर्म्ममिदमनुपालनीयं(धर्म्मोयममुपाल- यः)। प्रतिनिवासी(सि)जनपदैश्चाज्ञाश्रवणविधेयैर्भूत्वा यथा दीयमानं च दातव्यं॥ अपरं[चै]तस्मिन्नेव ग्रामे उत्तरतो[दिग्भा]गे साधारं कच्छ[क] नाम अरहटेन तु संयुतं दत्तं। पुनः पत्रमण्डपकिटिकाः पञ्च(ञ्च) शासनेन प्रदत्ताः॥ स्वहस्तोयं श्रीमाधवस्य। स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य॥ एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८२-७। (१) देखो ऊपर पृष्ठ २३ टिप्पण १।