भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 534 में से

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पृष्ठ 73

३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास रघुवंशी प्रतिहार 'प्रतिहार' नाम वंशकर्त्ता के नाम से चला हुआ नहीं, किन्तु राज्या- धिकार के पद से बना हुआ शब्द है। राज्य के भिन्न-भिन्न अधिकारियों में एक अधिकारी प्रतिहार होता था, जिसका काम राजा के बैठने के स्थान या रहने के महल के द्वार (ड्योढ़ी) पर रहकर उसकी रक्षा करना था। इस पद के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं किया जाता था, प्रत्युत राजा के विश्वसनीय पुरुष ही इस पद पर नियत होते थे। इसी से प्राचीन शिलालेखादि में ब्राह्मण¹, गुर्जर² (गूजर), ( १ ) विप्रः श्रीहरिचन्द्राख्य ऽ पत्नी भद्रा च क्षत्(त्रि)या ।... तेन श्रीहरिचन्द्रेण परिणीता द्विजात्मजा । द्वितीया क्षत्(त्रि)या भद्रा महाकुलगुणान्विता ॥ प्रतीहारा द्विजा भूता ब्राह्मण्यां येभवन्सुताः । राज्ञी भद्रा च यान्सूते ते भूता मधुपायिनः ॥****** नन्दावल्लं प्रहत्वा रिपुबलमतुलं भूभ्रकूपप्रयातं दृष्ट्वा भग्नां(न्) स्वपक्षां(न्) द्विजनृपकुलजां(न्) सत्प्रतीहारभूपां(न्) मंडोर के राजा बाउक की वि० सं० ८६४ ( ई० स० ८३७ ) की प्रशस्ति । मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १४-५, १६६ । ( २ )***परमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीक्षितिपालदेवपादानु- ध्यातपरमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीविजयपालदेवपादानामभिप्रव- र्द्धमानकल्याणविजयराज्ये संवत्सरशतेषु दशसु षोडशोत्तरकेषु माघमास- सितपक्षत्रयोदश्यां शनियुक्तायामेवं सं० १०१६ माघसुदि १३ शनावद्य श्रीराज्यपुरावस्थितो महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीमथनदेवो महाराजाधिराज- श्रीसावटसूनुर्गूज्जरप्रतिहारान्वयः कुशली । राजोरगढ़ (अलवर राज्य) से मिला हुआ गूजर प्रतिहारों का शिलालेख । एपिग्राफ़िया इंडिका; जि० ३, पृ० २६६ । नागरी प्रचारिणी पत्रिका; जिल्द ६ (वि० सं० १६८५), पृ० ३१६-७ । महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसाद (जयपुर); प्राचीन लेखमाला (प्रथम भाग); पृ० ५३-५।