राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
पृष्ठ 72, कुल 534 में से
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दूसरा अध्याय सीसोदियों से पूर्व के राजवंश
प्रतापगढ़ राज्य की गणना पहले मालवा के अन्तर्गत होती थी,
इसलिए वहां पर पहले मौर्य, मालव, क्षत्रप, गुप्त और हूणों का राज्य रहना
संभव है। अनन्तर प्रतापी राजा यशोधर्मन् और बैसवंशी राजा श्रीहर्ष ने
क्रमशः मालवे पर अधिकार कर लिया तब प्रतापगढ़ राज्य भी उनके अधि-
कार में चला गया होगा, किन्तु अब तक प्रतापगढ़ राज्य से उनका कोई
शिलालेख, ताम्रपत्र या सिक्का नहीं मिला है¹। श्रीहर्ष की मृत्यु के पीछे
कन्नौज के महाराज्य में अव्यवस्था फैल गई। ऐसे समय में भीनमाल के
रघुवंशी प्रतिहारों ने बढ़कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उस समय
मालवा भी प्रतिहारों के अधिकार में चला गया और वे वहां के स्वामी हुए।
प्रतापगढ़ राज्य के घोटार्सों (घोंटवार्षिका) नामक गांव के वि० सं० १००३
(ई० स० ९४६) के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरा) के समय के
शिलालेख से वहां रघुवंशी प्रतिहार नरेशों का राज्य रहना निश्चित है²।
इसलिए यहां पर उनका उल्लेख करना आवश्यक है।
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(१) उपर्युक्त वंशों के इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास;
जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ६८-१६२।
(२) राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर की ई० स० १९१५-१६ की वार्षिक रिपोर्ट;
पृ० २। यह शिलालेख राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है। मैंने इसका
'एपिग्राफ़िया इंडिका' (जि० १४ पृ० १७६-८८) में संपादन किया है। प्रतापगढ़ राज्य
से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री में वहां के प्राचीन इतिहास के लिए यह बड़ा उपयोगी है
एवं रघुवंशी प्रतिहारों का राजपूताने में राज्य होने का समुचित प्रमाण है।