भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २३ “अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे त्वा । यथा नः सुभगा ससि यथा नः सुफला ससि ॥ इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषानुयच्छतु । सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥” ( ऋ० सं० ४।५७।६,७ ) इन मन्त्रों में जड़ लाङ्गल-पद्धतिमात्र की स्तुति नहीं है । हे सौभाग्यवती ! हमारी ओर अभिमुख हो । हे सीते ! हम तुम्हारी वन्दना करते हैं जिससे तुम हमारे लिए धन और फल देनेवाली होओ, यह सम्बोधन एवं प्रार्थना अचेतन की नहीं हो सकती; किन्तु चेतन, शक्तिशाली देवता की ही समझनी चाहिये । इन्द्र सीता का ग्रहण करें, पूषा उसका सञ्चालन करें, सीता उत्तरोत्तर हमें धन, धान्य, फल आदि प्रदान करती रहे । कृषिरूपा सीता का पर्जन्यरूप इन्द्र से सम्बन्ध है, परन्तु कृषि की अधिष्ठात्री हलाग्रसम्भूत सीता का परमात्मस्वरूप इन्द्र से ही सम्बन्ध है । श्रुतियों में इन्द्र का मुख्य अर्थ परमेश्वर्यशाली परमेश्वर ही है । सीतासम्बन्धी दो मन्त्रों का सायनानुसार शुद्ध अर्थ निम्नोक्त है— “सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव । यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥” ( अथ सं० ३।१७।८ ) सायण-भाष्य—हे सीते ! त्वा त्वां । वन्दामहे नमस्कुर्मः । हे सुभगे सुभाग्ये सीताभिमानिदेवते ! त्वम् अर्वाची अस्मदभिमुखी भव । यथा येन प्रकारेण । नः अस्माकम् । सुमनाः शोभनमनस्का । असः स्याः । यथा येन प्रकारेण । नः अस्माकम् । सुफला शोभनफलोपेता । भुवः भवेः । तथा अर्वाची भवेति सम्बन्धः । हे सीते ! हम तुम्हें नमस्कार करते हैं । हे सुन्दर भाग्यवाली सीताभिमानिनी देवी ! आप हमारे वैसे अभिमुख हों जिस प्रकार से हम लोगों के प्रति सुन्दर मनवाली हों एवं जिससे हम लोगों को शोभन फल देनेवाली हों । “घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः । सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत् पिन्वमाना ॥” (अथ० सं० ३।१७।९) सायण-भाष्य—घृतेन उदकेन । मधुना मधुररसेन । समक्ता सम्यक् अक्ता सिक्ता । सा सीता । विश्वैः । देवैः । मरुद्भिः च । अनुमता अङ्गीकृता । हे सीते ! सा त्वम् । पयसा उदकेन । नः अस्मान् । अभ्याववृत्स्व अभिमुखम् आवर्तस्व । कथम्भूता ऊर्जस्वती बलोपेता घृतवत् घृतयुक्तमन्नम् पिन्वनामा सिञ्चन्ती । सीता घृत अर्थात् उदक एवं मधु अर्थात् मधुर रस से सम्यक् सिक्त होती हैं । वह सीता सभी देवताओं एवं मरुतों से अङ्गीकृत होती है । हे सीते ! उदक से युक्त होकर घृत-युक्त अन्न का सिञ्चन करती हुई, बलवती होकर हम लोगों के अभिमुख आसमन्तात् वर्तमान रहो । लाङ्गल-पद्धतिरूप सीता की अधिष्ठात्री महालक्ष्मीरूपा सीता उपासक के अभिमुख होकर अभीष्ट अन्न, जल, घृत, दुग्ध, कन्दमूल, फल आदि प्रदान करती है । वैदिकपरम्परा के अनुसार अथर्ववेद तथा यजुर्वेद के मंत्र ऋग्वेद के समान ही मौलिक हैं । इसी लिए उनके स्वरों में भेद मान्य होता है । अथर्ववेदीय “सीरा युञ्जन्ति” ( अथ० सं० ३।१७।१) आदि मंत्रों में भी अन्य देवताओं के साथ सीता की प्रार्थना है । सीता सम्बन्धी मन्त्र है— “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु । सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥” ( अथ० सं० ३।१६।४ )