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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२२ रामायणमीमांसा द्वितीय ब्राह्मणों से राम भार्गवेय, राम औपतस्विनि तथा राम क्रातुजातेय इन तीनों का परिचय मिलता है। इनके ऐतिहासिक होने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता है, लेकिन इनका रामायण के राम से कोई भी सम्बन्ध सम्भव प्रतीत नहीं होता। ब्राह्मणों तथा उपनिषदों में अश्वपति और जनक का उल्लेख मिलता है। अश्वपति का रामायण के पात्रों से कोई सम्बन्ध निर्दिष्ट नहीं हुआ है। ब्राह्मणों के जनक और रामायणीय जनक की अभिन्नता की समस्या का निर्णय करना असम्भव प्रतीत होता है। रामायण के रचयिता सीता के पिता जनक का प्रसिद्ध वैदिक जनक से सम्बन्ध जोड़ते हैं। लेकिन इस अभिन्नता के लिए वैदिक साहित्य से कोई प्रमाण नहीं निकाला जा सकता। जनक के सारे वृत्तान्तों में राम-कथा का कोई संकेत विद्यमान नहीं है। इसी तरह रामायण के एकाध पात्रों के नाम वैदिक रचनाओं में मिलते हैं, लेकिन न तो इनके पारस्परिक सम्बन्ध की कोई सूचना दी गयी है और न इनके विषय में किसी तरह की रामायण की कथावस्तु का किंचित् भी निर्देश किया गया है। जनक और सीता का बार-बार उल्लेख होने पर भी दोनों का, पिता-पुत्री का, सम्बन्ध कहीं भी निर्दिष्ट नहीं हुआ है। अतः वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा राम-कथासम्बन्धी गाथाएँ प्रसिद्ध हो चुकी थीं, इसका निर्देश समस्त विस्तृत वैदिक साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता। अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम रामायण के पात्रों के नामों से मिलते हैं, इससे इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये नाम प्राचीन काल में भी प्रचलित थे।" यह सब श्रीबुल्के ने "वैदिक साहित्य में राम-कथा का अभाव" शीर्षक से २४-२५ पृष्ठों में कहा है। उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीबुल्के का विवेचन भारतीय वेदविचार-पद्धति से बिलकुल भिन्न, पाश्चात्त्य ढङ्ग का ही है। भारतीय दृष्टि से अनेक शाखाओंवाले मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् सब वेद हैं एवं वे अनादि अपौरुषेय तथा स्वतःप्रमाण हैं।१ उनका प्रारम्भ काल और अन्त-काल नहीं है। वेदों के एवं वैदिक साहित्य के सम्बन्ध में पाश्चात्यों के विचार भ्रान्तिपूर्ण तथा त्रुटिपूर्ण भी हैं।२ भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में पाश्चात्यों ने जानबूझकर अराजकता फैला रखी है।३ मैक्समूलर ने वेदों का संस्करण एवं उनका विवेचन जिज्ञासा की दृष्टि से नहीं किन्तु ईसाइयत के प्रचारकों की सुविधा के लिए किया है। यह उन्होंने अपने मतपत्रों में स्पष्टरूपसे लिखा है, अतः उक्त विषयों पर भारतीय दृष्टि से ही विचार करना न्याययुक्त है। 'वेदों में प्राकृतिक दृश्यों एवं शक्तियों में देवताओं की कल्पना कर ली गयी है।' पाश्चात्यों का यह कथन निष्प्रमाण कल्पनामात्र है। ब्रह्मसूत्र के देवताधिकरण के अनुसार भौतिक द्यौ, अन्तरिक्ष, अग्नि, वायु, सूर्य, वरुण, मित्र आदि से भिन्न उनके अधिष्ठाता देवता होते हैं और वे ऐश्वर्यशाली होते हैं एवं एक ही समय विभिन्न स्थलीय यज्ञों में पहुँच सकते हैं, ये सब बातें मन्त्रों एवं ब्राह्मणों से सिद्ध हैं।४ ऋग्वेद के कुछ मण्डलों एवं कुछ मन्त्रों को प्राचीन एवं कुछ को नवीन मानना भी निष्प्रमाण है। वेद-मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् अनादि और अनन्त हैं।५ इस तरह ऋग्वेद के सूक्त ४।५७ में कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता वास्तविक देवता हैं, काल्पनिक देवता नहीं। इसी तरह सीता के साथ कृषि-सम्बन्धी अन्य देवताओं का सामान्यतः उल्लेख होना आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसी स्थिति में— १. यह आगे स्पष्ट किया जायगा । २. यह आगे स्पष्ट किया जायगा । ३. दे० भारत में अङ्ग्रेजीराज । ४. दे० देवताधिकरणविवेचन । ५. आगे स्पष्ट किया गया है ।