रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २१ घृत और मधु से ओत-प्रोत सीता विश्वेदेवताओं और मरुतों से अनुमोदित होवे । हे सीते ! ओजस्विनी और घी से सींची हुई तू पय ( दूध ) के साथ हमारे पास विद्यमान रहे । काठकगृह्यसूत्र में गो-यज्ञ के अन्त में ‘सीरा युञ्जन्ति’ मन्त्र का प्रयोग है । वहाँ सीता में घृत और मधु के सिञ्चन का भी भाष्य में उल्लेख किया गया है । अग्नि-चयन में उन मन्त्रों का विस्तृत वर्णन मिलता है । निम्न प्रार्थनाएँ भी मिलती हैं । हे कामधेनु सीते ! आप मित्र, वरुण, इन्द्र, अश्विन, पूषण, प्रजा और ओषधियों का मनोरथ पूरा करें । इस तरह अनेक अन्य गृह्यसूत्रों में भी अनेक कर्मों में इन मन्त्रों का प्रयोग है । पारस्कर-गृह्यसूत्र में सीता- यज्ञ का विस्तृत वर्णन है । खेत के उत्तर या पूर्व में जोते हुए शुद्ध स्थल पर या गाँव में आग जलाकर स्थालीपाक तैयार करते हैं । घृत की आहुति देते समय इन्द्र, सीता एवं उर्वरा से प्रार्थना की जाती है । अनन्तर सीता, यजा, समा और भूति को स्थालीपाक चढ़ाया जाता है । “यस्या भावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणामिन्द्रपत्नी- मुपह्वये सीतां सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा ।।” ( पा० गृ० सू० २।१७।४ ) इस प्रकार सीता की प्रार्थना की जाती है । काठकगृह्यसूत्र के अनुसार खस आदि सुगन्धित घास से सीता कुमारी देवी की मूर्ति बनायी जाती है— “यत्र वोरणादिमयी सीता कुमारी देवता विरच्यते ।” कौशिकसूत्र के तेरहवें अध्याय के अन्त में सीता से विस्तृत प्रार्थना की गयी है । यह सामग्री सामवेद के षड्विंशब्राह्मण से मिलती-जुलती है । विलक्षण घटनाओं पर अपशकुन के निवारणार्थ दो हलों के उलझ जाने पर पुरोहित को पुरोडाश तैयार करके जङ्गल में पूर्व की ओर एक सीता खींचनी पड़ती थी । उसमें अग्नि जलाकर आहुति देते समय प्रार्थना करनी पड़ती थी— ‘वित्तिरसि पुष्टिरसि प्राजापत्यानां त्वाहं मयि····’’ इसमें सर्वाङ्गशोभिनी, हिरण्मयी माला धारण करनेवाली, कालनेत्रा, श्यामा, हिरण्मयी पर्जन्य-पत्नी सीता का मानवीकरण स्पष्ट है । महाभारत के द्रोणपर्व में शल्य के ध्वजाग्र में सीता का उल्लेख हुआ है । हरिवंश में भी— “कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धरणीति ।” ( ह० वं० २।३।१४ ) वाल्मीकिरामायण पर भी कृषि अधिष्ठात्री देवी का प्रभाव पड़ा है । अयोनिजा सीता के जन्म और तिरोधान के जो वृत्तान्त मिलते हैं; वे सम्भवतः इस वैदिक सीता के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं ।” अन्त में श्रीबुल्के सारी सामग्री का सिंहावलोकन कर जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं वह यह है कि “ऋग्वेद में इक्ष्वाकु, दशरथ और राम इन तीनों का एक एक बार वर्णन हुआ है । ये प्रभावशाली ऐतिहासिक राजा थे । इनका पारस्परिक सम्बन्ध असम्भव नहीं है, लेकिन इसका कोई निर्देश नहीं मिलता । ऋग्वेद में सीता का भी एक बार उल्लेख हुआ है, लेकिन इस सीता का रामायण के उपर्युक्त ऐतिहासिक पात्रों से सम्बन्ध असम्भव ही है; क्योंकि उसका व्यक्तित्व ऐतिहासिक न होकर सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) के मानवीकरण का परिणाम है । इस सीता का उल्लेख वैदिक काल के प्रारम्भ से अन्त तक बराबर होता रहा है ।