रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका उल्लेख हुआ है । इन सबका कार्यक्षेत्र विस्तृत था । आर्यों का कुशल-क्षेम इन्हीं पर निर्भर माना जाता था । इनके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के देवताओं की भी कल्पना की गयी है, जिनका कार्यक्षेत्र बहुत सीमित माना जाता था । इनमें क्षेत्रपति, वास्तोष्पति, सीता और उर्वरा प्रधान हैं । धार्मिक चेतना में इनका स्थान गौण था, क्योंकि आर्यों का कुशल-क्षेम पहले प्रकार के देवताओं पर ही निर्भर माना जाता था । सीता, क्षेत्रपति आदि कृषि देवताओं के कम महत्त्व का एक और कारण यह है कि प्रारम्भ में कृषि की अपेक्षा पशुपालन प्रधान रहा होगा । ऋग्वेद के सबसे प्राचीन अंश ( २-७ मण्डलों ) में केवल एक ही मन्त्र में कृषि-सम्बन्धी शब्दों का प्रयोग है और यह सूक्त दसवें मण्डल के समय का माना जाता है । वह ऋग्वेद का एकमात्र स्थल है जहाँ सीता में व्यक्तित्व एवं देवत्व का आरोप किया गया है । इन कृषि की अधिष्ठात्री सीता देवी और सीता—सावित्री का अन्तर यह है कि एक तो इसमें देवत्व का आरोप है, दूसरे इसका उल्लेख आगे चलकर बराबर होतां रहा है । यद्यपि वैदिक साहित्य में उनसे सम्बन्धित केवल दो ऋचाओं में प्रार्थना मिलती है फिर भी इनका प्रयोग कृषि-सम्बन्धी कार्यों के अतिरिक्त अग्निचयन तथा पितृमेध के अवसरों पर भी होने लगा । गृह्यसूत्रों में दो नयी प्रार्थनाएँ भी मिलती हैं । ऋग्वेद के सूक्त प्रायः एक ही देवता से सम्बन्ध रखते हैं, लेकिन जिस सूक्त में सीता का उल्लेख है उसमें कृषि-सम्बन्धी अनेक देवताओं से प्रार्थना की जाती है । बहुत सम्भव है कि ये प्रार्थनाएँ अनेक स्वतन्त्र मन्त्रों के अवशेष हों जो एक ही सूक्त में सङ्कलित हो जाने के बाद चौथे मण्डल के अन्तर्गत रखे गये हों । पहले तीन छन्दों का देवता क्षेत्रपति है, चौथे का देवता शुन ( सुखकृत् देवता ) है, जो अगले छन्द के देवता से भिन्न है । पाँचवें तथा आठवें छन्दों के देवता शुनाशीर हैं । छठे और सातवें छन्दों की देवी सीता हैं । सारे सूक्त का अनुवाद इस प्रकार है—“हितकारी क्षेत्रपति के साथ हम गौ और अश्व के लिए पुष्टिकारक अन्न प्राप्त करते हैं । वह क्षेत्रपति हम लोगों को उक्त प्रकार का अन्न प्रदान करे । हे सौभाग्यवती ! हमारी ओर अभिमुख हो । देवि सीते ! तेरी हम वन्दना करते हैं जिससे तू हमारे लिए सुन्दर धन फल देने वाली हो । इन्द्र सीता को ग्रहण करे' । पूषा सूर्य उसका सञ्चालन करें । वह पानी से भरी सीता प्रत्येक वर्षा में हमें धान्य प्रदान करती रहे । सीता के नाम से वैदिक साहित्य में सीता की प्रार्थना आती है । वह 'सीरा युञ्जन्ति' इत्यादि प्रसिद्ध है । 'सीरा युञ्जन्ति' अथर्ववेद ( ३।१७।१ ) में है । इसमें अधिकांश सामग्री ऋग्वेद के दो सूक्तों से ली गयी है । उसके ४ मन्त्र हैं— “इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभिरक्षतु । सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥” ( अथ० सं० ३।१७।४ ) इन्द्र सीता को ग्रहण करें ( दबावें ), पूषा सूर्य उसकी रखवाली करें और वह सीता पानी से भरी प्रत्येक वर्षा में हमें धान्य प्रदान करती रहे । “सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव । यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥” ( ऋ० सं० ४।५७।८ ) हे सीता, तेरी हम वन्दना करते हैं, हे सौभाग्यवती, हमारी ओर अभिमुख हो; जिससे तू हमारे लिए सुन्दर फल देनेवाली होवे । “घृतेन सीता मधुना ममक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः । सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत्पिन्वमाना ॥” ( ऋ० सं० ४।५७।९ )