रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय कामिल बुल्के की रामकथा १९ गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी भी तैत्तिरीयब्राह्मण के उपाख्यान से परिचित थे और उन्होंने सीता की मर्यादा के विरुद्ध समझकर जानबूझकर इस अङ्गराग की चर्चा नहीं की । वे लिखते हैं— "दिब्य बसन भूषण पहिराये । जो नित नूतन अमल सुहाये ॥” ( रा० मा० ३।४।२ ) यह भी कल्पना है कि महाभारत और रामायण में बलराम एवं परशुराम भी प्रसिद्ध थे, अतः राम के साथ दाशरथि विशेषण लगाया जाता था। बादमें रामभद्र और रामचन्द्र नामों का व्यवहार होने लगा । उत्तररामचरित, पद्मपुराण आदि रचनाओं में 'रामचन्द्र' सबसे अधिक लोकप्रिय नाम हो गया । राम दाशरथि को 'चन्द्र' उपाधि क्यों मिली ? इस प्रश्न को सुलझाने के लिए डाक्टर वेबर ने सीता—सावित्री के वृत्तान्त का उदाहरण दिया है। वाल्मीकि- रामायण में इसका कारण ढूंढना अधिक सङ्गत होगा । राम के सौन्दर्य और लोकप्रियता की अभिव्यञ्जना के लिए वाल्मीकि ने बहुत स्थलों में चन्द्रमा की उपमा दी है— रामं चन्द्रमिवोदितम् । (२।४४।२२ ) राममुखं पूर्णचन्द्रमिवोदितम् । ( ६।३३।३२ ) रामः पूर्णचन्द्राननः । ( २।१।४४ ) रामः सोमवत् प्रियदर्शनः । ( १।१।१८ ) रामः लोककान्तः शशी यथा । (५।३४।२८ ) रामवदनमुदितपूर्णचन्द्रकान्तम् । ( ६।११४।३५ ) अतः रामचन्द्र नाम का आधार वाल्मीकिरामायण को छोड़कर अन्य कल्पित उपाख्यानों में ढूंढ़ना अनावश्यक है राम के सौन्दर्य, लोकप्रियता, सौम्यता आदि गुणों की अभिव्यक्ति के लिए उनके कोमल शान्त स्वभाव को अभिव्यक्त करने के लिए आदि काव्य में बार-बार श्रीराम की चन्द्र से तुलना की जाती है। राम के लिए रामायण में एक ही बार 'रामचन्द्र' शब्द का प्रयोग हुआ है— "रामचन्द्रमसं दृष्ट्वा ग्रस्तं रावणराहुणा ।” ( वा० रा० ६।१०२।३२ ) अर्थात् रामचन्द्र को रावण-राहु से ग्रस्त देखकर देवता वानर आदि घबरा गये । यदि प्रारम्भ से ही राम के लिए 'रामचन्द्र' का प्रयोग हुआ होता तो यह कहा जा सकता था कि राम के शील एवं शान्त स्वभाव का कारण यह है कि मूलतः वह चन्द्रमा के देवता थे । तब सीता—सावित्री और सोम राजा का उपाख्यान रामकथा का बीज माना जा सकता था और रामायण का अङ्गराग एवं तैत्तिरीयब्राह्मण का स्थागर अलङ्कार मूलतः वेद-की सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) में पड़ी हुई ओस होती जिसमें चन्द्रमा प्रतिबिंबित है । इसी तरह सीता एवं कृषि की अधिष्ठात्री देवी दोनों का उद्गम एक होता । जिन वेबर ने यह कल्पना की थी उन्होंने भी इसे कल्पना ही माना है। साथ ही यह भी विचारणीय है कि राम सूर्यवंशी हैं। उनका सोम से कोई सम्बन्ध बहुत सम्भव नहीं है ।” पहले, कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता के सम्बन्ध में विचार करते हुए श्रीबुल्के कहते हैं— “प्रारम्भिक वैदिक काल में जिन देवताओं का उल्लेख है वे अधिकतर प्रकृति के देवता हैं। अर्थात् प्रभावशाली प्राकृतिक दृश्यों और शक्तियों में देवताओं की कल्पना कर ली गयी है। कार्यक्षेत्र के अनुसार वे तीन विभागों में विभक्त हैं—द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वी के देवता । ऋग्वेद में इन्द्र के लिए २५०, अग्नि के लिए २००, सोमलता के मादकरस-देवता के लिए १०० से अधिक सूक्त सर्वप्रधान हैं। फिर भी सूर्य, वायु, उषा, वरुण, मित्र, पर्जन्य आदि बहुत से देवताओं