भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१८ रामायणमीमांसा द्वितीय- भिन्न-भिन्न सीताओं की सूची मिलती है। पहली सीता कृषि की अधिष्ठात्री देवी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद से लेकर सारे वैदिक साहित्य में अनेक स्थलों पर मिलता है। दूसरी सीता का परिचय तैत्तिरीयब्राह्मण से प्राप्त होता है, जहाँ सीता-सावित्री (सूर्य की पुत्री) और सोम राजा का उपाख्यान विस्तारपूर्वक दिया गया है। इसके अतिरिक्त 'सीता' शब्द का लाङ्गल-पद्धति के अर्थ में वैदिक साहित्य में अनेक बार उल्लेख हुआ है; पर वहाँ सीता में व्यक्तित्व का आरोप नहीं है। अतः प्रस्तुत दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण न होने के कारण उन स्थलों का विश्लेषण अनावश्यक है।" उनका सङ्केत टिप्पणी में दिया गया है—ऋग्वेद (४।५७।४), अथर्ववेद (११।३।१२), यजुर्वेदीय काठकसंहिता (२०।३), कपिष्ठलसंहिता (३२।५,६), मैत्रायणीसंहिता (३।२।४,५), तैत्तिरीयसंहिता (५।२।५।५), शतपथब्राह्मण (१३।८।२।६,७) आदि स्थलों में हल द्वारा खींची हुई सीताओं का सङ्केत है। दूसरे प्रकार की सीता पर विचार करते हुए श्रीबुल्के ने बताया है कि "कृष्णयजुर्वेद के तैत्तिरीयब्राह्मण में सीता-सावित्री की कथा मिलती है। उसमें सीता और श्रद्धा दोनों प्रजापति की पुत्रियां मानी जाती हैं। सायण के अनुसार प्रजापति सूर्य हैं। प्रस्तुत उपाख्यान में सीता (सावित्री) सोम राजा का प्रेम अङ्गराग के द्वारा प्राप्त करती है। यद्यपि सोम पहले सीता की बहन श्रद्धा से प्रेम करते थे। इस कथा का मूल ऋग्वेद के सूर्यसूक्त (ऋ० सं० १०।८५) में विद्यमान है। वहाँ सूर्य की पुत्री सूर्या का सोम के साथ विवाह वर्णित है। इस सूक्त में सोम से चन्द्रमा का और सूर्या से ऊषा का वर्णन माना जाता है। इस कथा का वर्णन ऋग्वेद के दोनों ब्राह्मणों में है। प्रजापति ने सोम राजा को अपनी पुत्री सूर्या-सावित्री दे दी (ऐ० ब्रा० ४।७) और (कौ० ब्रा० १८।१)। इसके अतिरिक्त (तै० सं० २।३।५), (का० सं० ११।३) और (मै० सं० २।२।७) इन स्थलों पर प्रजापति की तैंतीस पुत्रियों का सोम राजा के साथ विवाह वर्णित है। इनमें से केवल रोहिणी का नाम दिया गया है। तैत्तिरीयब्राह्मण में इस कथा का परिवर्तित रूप इस प्रकार है-प्रजापति ने सोम राजा की और तीनों वेदों की सृष्टि की थी। सोम राजा ने तीनों वेदों को हस्तगत कर लिया था। सीता-सावित्री सोम राजा को पतिरूप में चाहती थी। लेकिन सोम श्रद्धा (सीता की बहन) को चाहते थे। सीता ने अपने पिता को नमस्कार कर कहा- मैं आपकी शरण लेती हूँ, मैं सोम राजा को पतिरूप में चाहती हूँ, पर वे श्रद्धा को चाहते हैं। प्रजापति ने स्थागर नामक अङ्गराग तैयार किया और पूर्व दिशा की ओर दस होतृ-मन्त्र पढ़कर, दक्षिण की ओर चार होतृ-मन्त्र, पश्चिम की ओर पाँच होतृ-मन्त्र, उत्तर की ओर छह होतृ-मन्त्र और ऊपर की ओर सात होतृ-मन्त्र पढ़कर तथा सम्भार-मन्त्रों और पत्नी-मन्त्रों से उस अङ्गराग को अभिमन्त्रित कर सीता का मुख अलङ्कृत किया। पुनः वह सोम राजा के पास गयी। सीता को देखकर प्रेमवश होकर उन्होंने कहा-मेरे पास आइये। सीता ने कहा-मैं आपके पास आती हूँ, परन्तु आप प्रतिज्ञा करें कि मुझसे सम्बन्ध रखेंगे और आपके हाथ में जो है, उसे मुझे दे दीजिये।" आगे रामकथा के लेखक श्रीबुल्के कहते हैं- "सीता-सावित्री आदि कथाओं का वाल्मीकिरामायण से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता, फिर भी सम्भव है कि अनसूया के अङ्गराग का वृत्तान्त इस उपाख्यान से प्रभावित हुआ हो। वहाँ अत्रि की पत्नी अनसूया सीता को माला, वस्त्र, आभूषणों के साथ एक अनश्वर अङ्गराग भी प्रदान करती हैं, जिससे सीता का शरीर दिव्य सौन्दर्य से युक्त होता है- "अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे । शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीर्विष्णुमव्ययम् ॥" ( वा० रा० २।११८।२०) । अध्यात्मरामायण में भी इस अङ्गराग का उल्लेख है - "अङ्गरागञ्च सीतायै ददौ दिव्यं शुभानना । न त्यक्ष्यतेऽङ्गरागेण शोभा त्वां कमलानने ॥" ( अ० रा० २।९।८९) ।