रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविविध प्रश्न किये थे । फिर जनक स्वयं भी याज्ञवल्क्य के समान ब्रह्मिष्ठ हो गये । यहाँ 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ ब्रह्मिष्ठ है । श्रीबुल्के कहते हैं—"शतपथ में जनक याज्ञवल्क्य को शिक्षा देते हैं" परन्तु यह तो वरदान मांगने से ही स्पष्ट हो जाता है कि रहस्य में जनक का ज्ञान उत्कृष्ट कोटि का था । उसी पर याज्ञवल्क्य प्रसन्न भी हुए थे । पर ब्रह्मज्ञान में याज्ञवल्क्य का ही ज्ञान सर्वोत्कृष्ट था । इसीलिए वर प्राप्त करके जनक ने उनसे ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया और ब्रह्मिष्ठ हो गये । सायण ने भी स्पष्टरूप से कहा है कि याज्ञवल्क्य से वर प्राप्त कर जनक ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मिष्ठ हो गये— “ततो याज्ञवल्क्यवरप्रदानान्तरं स जनकः ब्रह्मिष्ठो बभूव ।” “अतः जनक ब्राह्मण हो गये । पहले जनक याज्ञवल्क्य आदि को ज्ञान देते थे । उपनिषद् में याज्ञवल्क्य जनक को शिक्षा देनेवाले हो गये" यह सब बुल्के साहब की भ्रान्ति ही है । छान्दोग्य उपनिषद् (५।११।४) और शतपथब्राह्मण (१०।६।१।२) में जिन कैकेय महाराज अश्वपति का वर्णन आता है वे भी चक्रवर्ती महाराज दशरथ की प्रसिद्ध पटरानी कैकेयी के पिता ही हैं। पूर्वोक्त युक्ति से रामायण में कैकेयी के पिता अश्वपति की वैदिक अश्वपति के रूप में चर्चा होनी चाहिये । कैकेय अश्वपति का ग्रहण होना स्वाभाविक है । "उपस्थितं परित्यज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्” इस न्याय से प्रसिद्ध सम्बन्ध का परित्याग कर अप्रसिद्ध कल्पना असङ्गत है । श्रीबुल्के ने “तैत्तिरीयब्राह्मण (३. १०. ९), शतपथब्राह्मण (११. ३. १. २-४), (११. ४. ३. २०), (११. ६. २. १-१०), (११. ६. ३. १) आदि, जैमिनीयब्राह्मण (१. १९.), (२.७६, ७७) तथा शतपथब्राह्मण के अन्तर्गत बृहदारण्यकोपनिषद् (३. १. १-२) आदि स्थलों के अनुसार जनक को क्षत्रिय और ब्राह्मण बतलाया है;" यह सर्वथा प्रमाणशून्य है । जिसने अग्निहोत्र-रहस्य का सम्यक् निरूपण कर याज्ञवल्क्य से काम-प्रश्न करने का वरदान प्राप्त किया था, उसी जनक ने कालान्तर में कुछ कहने की इच्छा से आये हुए याज्ञवल्क्य से अपने पूर्व प्राप्त वरदान के अनुसार प्रश्न किये थे और याज्ञवल्क्य ने अपने वरदान के अनुसार उनके यथाकाम किये गये प्रश्नों का उत्तर दिया था । वे भी वैदेह जनक ही हैं । इनमें से किसी को ब्राह्मण मानना और अन्य को क्षत्रिय मानना निराधार है । जनक एक नहीं थे, किन्तु वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड सर्ग ७१ श्लोक ४ के अनुसार मिथिके पुत्र प्रथम जनक हुए । वे इतने प्रतापी थे कि उनके नाम से जनक-वंश ही चल पड़ा । उस जनक-वंश में ह्रस्वरोमा जनक के दो पुत्र थे । छोटे का नाम कुशध्वज था और बड़े पुत्र सीता के पिता थे— "तस्य पुत्रद्वय राज्ञो धर्मज्ञस्य महात्मनः । ज्येष्ठोऽहमनुजो भ्राता मम वीरः कुशध्वजः ॥” ( वा० रा० १।७१।१३ ) यद्यपि राजा जनक के नाम का उल्लेख यहाँ नहीं है तो भी विष्णुपुराण (४।५।३०), वायुपुराण (८९।१५), ब्रह्माण्डपुराण (३।६४।१५) एवं पद्मपुराण पातालखण्ड (५७।५) के अनुसार उनका नाम सीरध्वज था । सीता के पिता सीरध्वज और जनक-याज्ञवल्क्य-संवाद से सम्बद्ध जनक अभिन्न प्रतीत होते हैं । पुराणों के अनुसार सीता के पिता महान् ज्ञानवान् और योगनिष्ठ थे । वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि अपरिगणित महर्षियों से पूर्ण परिचित थे । साक्षात् विष्णुस्वरूप राम के श्वसुर और महालक्ष्मीरूपा सीता के पिता होने का सौभाग्य भी उन्हें प्राप्त था । इससे वैदिक जनक और रामायण के जनक की अभिन्नता समझी जा सकती है, क्योंकि अभिन्नता का बाधक कोई प्रमाण विद्यमान नहीं है । “वैदिक साहित्य में सीता" इस शीर्षक से विचार करते हुए बुल्के साहब कहते हैं—"वैदिक साहित्य में दो ३