भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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१६ रामायणमीमांसा द्वितीय मिलते-जुलते प्रामाणिक अन्य ग्रन्थ के आधार पर निर्धारित किया जाता है । रामायण जब वेद का व्याख्यानभूत है तब यह सुतरां सिद्ध है कि वेदों में वर्णित दशरथ वे ही हो सकते हैं जो रामायण में प्रसिद्ध हैं । भले ही मध्य एशिया की आर्य-जाति मितन्नि ( जिसका शासनकाल ई० पू० १४०० माना जाता है¹ ) में दशरथ नाम का कोई राजा रहा हो । उसे रामायण प्रसिद्ध वैदिक दशरथ से भिन्न ही समझना चाहिये, क्योंकि रामायण के अनुसार रामायण के दशरथ का समय उससे लाखों वर्ष प्राचीन है । ऋग्वेद के— ‘प्र तद् दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवस्तु । ये युक्त्याय पञ्च शतास्मयु पथा विश्वाव्येषाम् ॥’ (ऋ० सं० १०।९३।१४) मैंने दुःशीम पृथुवान, वेन और राम ( असुर ) इन यजमानों के लिए यह ( सूक्त ) गाया है । इस मन्त्र में वर्णित राम भी रामायण के ही राम हैं । सूर्यवंशी राजा वेन के अनन्तर वर्णित राम अवश्य ही सूर्यवंशी थे । रामायण के राम बड़े-बड़े यज्ञों के कर्ता थे, यह भी प्रसिद्ध है । ‘असुर’ शब्द जहाँ स्वतन्त्र होता है वहाँ असुर-जाति का बोधक होता है, पर जहाँ विशेषणरूप में प्रयुक्त होता है वहाँ महाप्राणवान्, महाबलवान् अर्थ का ही बोधक होता है । रामायण में प्रसिद्ध है— “ब्रह्मा स्वयंभूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा । इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥” (वा० रा० ५।५१।४४), “पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्याञ्चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” (वा० रा० ६।१८।२३) । “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्” इस आपस्तम्बसूत्र के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मण दोनों की वेदसंज्ञा है । अधिकांश उपनिषदें ब्राह्मण-भाग के अन्तर्गत आती हैं । उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद्, रामतापनीय उ०, रामरहस्य उ० आदि में राम का पर्याप्तरूप से वर्णन आता है, जिससे मन्त्र-वर्णित राम की प्रत्यभिज्ञा होती है । प्रश्नोपनिषद् में— “भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपैत्यैतं प्रश्नमपृच्छत” ( प्र० उ० ६।१ ) हिरण्यनाम कौसल्य नाम की चर्चा आयी है । वह वाल्मीकिरामायण अयोध्याकांड सर्ग ७५ श्लोक १३ के अनुसार राम का ही नामान्तर है ।² रामपूर्वोत्तरतापनीय उ० में रामायण-वर्णित कथाओं का भी विस्तार से उल्लेख है । फिर भी श्रीबुल्के वेद में रामायण के पात्रों का अभाव मानते हैं, यह आश्चर्य है । साथ ही उन्होंने प्रश्नोपनिषद् तथा रामतापनीय उपनिषद् आदि की भी चर्चा क्यों नहीं की—यह भी आश्चर्य है । श्रीबुल्के के अनुसार “वैदिक जनक से रामायण के जनक की अभिन्नता असम्भव तो नहीं है, पर अत्यन्त सन्दिग्ध प्रतीत होती है ।” परन्तु बात ऐसी नहीं है । श्रीबुल्के को ‘ब्रह्म’ शब्द से ब्राह्मण की भ्रान्ति हुई है । याज्ञवल्क्य कर्म के भी बहुज्ञ थे, उसी पर प्रसन्न होकर उन्होंने याज्ञवल्क्य को उपहार दिया था, एक सहस्र गौएँ प्रदान की थीं । “याज्ञवल्क्यो वरं ददौ सहोवाच कामप्रश्न एव मे । त्वयि याज्ञवल्क्यासदिति ततो ब्रह्मा जनक आस ॥” ( श० ब्र० ११।६।२।१० ) याज्ञवल्क्य ब्रह्मविद्या में निष्णात थे; इसलिए जनक ने उनसे यथेष्ट प्रश्न करने का वर प्राप्त किया था । कालान्तर में याज्ञवल्क्य के पुनः जनक के यहाँ आने पर उसी वरदान के अनुसार जनक ने उनसे ब्रह्मसम्बन्धी १. दे० रामकथा पृ० २ । २. हिरण्यनाभो यन्नास्ते सुतो मे सुमहाशयाः ॥

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