भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय

कामिल बुल्के की रामकथा

वास्तव में ईसाइयत फैलाने की दृष्टि से ही श्रीबुल्के ने रामकथा लिखी है। वे जानते हैं कि हिन्दुओं में राम- कथा का परम सम्मान है, साथ ही वेद में भी उनका परम सम्मान है। हिन्दुओं का यह भी दृढ़ विश्वास है कि उनके धर्म की सभी बातें वेदों में विद्यमान हैं, अतः "रामकथा वेदों में नहीं है" यह कहकर बुल्के ने हिन्दू-विश्वासों पर आघात करना चाहा है। मैक्समूलर ने अपने पिता को पत्र लिखते हुए कहा था, "ईसाइयत प्रचार के लिए ऋग्वेद का एक विशिष्ट संस्करण प्रकाशित करना अत्यन्त आवश्यक है। इससे हिन्दूधर्म की कई कमजोरियाँ सामने आ जाएँगी, परिणामतः ईसाइयों को अपना धर्म फैलाने में सुविधा होगी।" ठीक इसी प्रकार की दुरभिसन्धि रामकथा के निर्माता के मन में भी हो तो कोई आश्चर्य नहीं। कामिल बुल्के ने अपनी 'रामकथा' पुस्तक में वेदों में रामायण के पात्रों की चर्चा करते हुए लिखा है— 'ऋग्वेद' में इक्ष्वाकु का एक बार उल्लेख हुआ है (ऋ० सं० १०।६०।४)। लेकिन उस सूक्त में इक्ष्वाकु का नाममात्र दिया गया है, जिससे इतना ही प्रतीत होता है कि वे कोई राजा थे। 'यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् मराय्येधते । अर्थात् जिसकी सेवा में धनवान् प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है। 'अथर्ववेद' में भी एक बार इक्ष्वाकु का नाम आया है— 'त्वा वेद पूर्वं इक्ष्वाको यम ्' (अथ० सं० १९।३९।९)। किन्तु बेचारे बुल्के को पता नहीं कि वेद अनादि, अपौरुषेय, नित्यसिद्ध प्रमाण ग्रन्थ हैं। उन के ही आधार पर विश्व की सृष्टि होती है। अतएव सूत्ररूप से वेद में उन सभी वस्तुओं का उल्लेख है जो सृष्टि में महत्त्वपूर्ण हैं। इतिहास, पुराण आदि आर्ष-ग्रन्थों द्वारा उन्हीं वेदों का विस्तृत व्याख्यान करके उपबृंहण किया जाता है। जिस सूर्यवंश में राघवेन्द्र भगवान् का प्रादुर्भाव हुआ है, इक्ष्वाकु उसके प्रमुख सम्राट् थे, अतः वेदों में उनका उल्लेख होना उचित ही है। इक्ष्वाकु राजा थे और राष्ट्रहित में उपयोगी उन सब विशिष्ट वस्तुओं के ज्ञाता थे, ये बातें वेद से ज्ञात होती हैं। इतना ही पर्याप्त है। वेदों में जो वस्तु सूत्ररूप से कही गयी है, वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तार किया गया है। रामायण के अनुसार इक्ष्वाकुवंश में ही श्रीरामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था। एतावता 'वेद में इक्ष्वाकु का नाममात्र है। उनका राम के साथ कोई असाधारण सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है' ये सब बातें निरर्थक हैं। इससे यह भी नहीं समझना चाहिए कि मन्त्र-रचना के पहले इक्ष्वाकु नाम के राजा प्रसिद्ध थे, उनके बाद मन्त्र-रचना हुई, क्योंकि लोक में यद्यपि घटनापूर्वक शब्दोल्लेख होता है, तथापि वेद में शब्दानुसारिणी ही घटना होती है। श्रीबुल्के के अनुसार निम्नोक्त मन्त्र में दशरथ का वर्णन मिलता है— 'चत्वारिद् दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति ।' (ऋ० सं० १।१२६।४) दशरथ के लाल रङ्ग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व करते हैं। ठीक ही है। इस मन्त्र में भी उन्हीं प्रभावशाली सम्राट् दशरथ का वर्णन है, जिनके उदात्त चरित्र का रामायण में विस्तार किया गया है। जिस शब्द का अर्थ किसी प्राचीन ग्रन्थ में अप्रसिद्ध हो उसका अर्थ उस ग्रन्थ से