रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंख्या १ रामोपासना ९३१ “गदारिशङ्खाब्जधरं भवारिं सद्यो ध्यायेन्मोक्षमाप्नोति सर्वः” इति श्रुतेः । “सिंहासने तस्मिन् वीरासनसमाश्रितम् । सम्यग् ज्ञानमयीं मुद्रां दधानं दक्षिणे करे ॥ तेजःप्रकाशनं वामजानुमूर्धनि चापरम् । जानकीवल्लभं देवमिन्द्रनीलमणिप्रभम् ॥ व्याख्याननिरतं देवं द्विभुजं रघुनन्दनम् । वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः परिसेवितम् ॥ वामभागे समासीनां सीतां काञ्चनसंनिभाम् । भजतां कामदां नित्यं रक्तोत्पलकराम्बुजाम् ॥ लक्ष्मणं पश्चिमे भागे धृतच्छत्रं सचामरम् । पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ तालवृन्तधरावुभौ ॥” श्रीरामतापनीय उपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि विश्वभावन सौमित्रि प्रणव के अकार अक्षर से आविर्भूत होते हैं । उकार अक्षर से तैजसरूप शत्रुघ्न का आविर्भाव होता है । अर्धमात्रास्वरूप ब्रह्मानन्दविग्रह श्रीराम हैं । वहीं यह स्पष्ट उल्लेख है कि यह सब कुछ 'ॐ' इस अक्षर का ही, जो भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान त्रिकालातीत है, विस्तार है । वह आत्मा चतुष्पाद है । व्यष्टि प्राज्ञ, समष्टि विराट् स्थूलप्रपञ्चाभिमानी चेतन प्रथमपाद है । उसका जागरित स्थान है ! इन्द्रियादिजनित बहिर्विषयक उसकी प्रज्ञा होती है । उसके भी सात अङ्ग एवं इक्कीस मुख (द्वार) होते हैं । वह स्थूल विषयों का भोक्ता होता है । इसी प्रकार व्यष्टि तैजस समष्टि हिरण्यगर्भ सूक्ष्मप्रपञ्चाभिमानी चेतन द्वितीय पाद है । उसका स्वप्न स्थान है तथा बाह्यविषयेन्द्रियनिरपेक्ष बाह्यविषयसंस्कारजन्य अन्तःप्रज्ञा ही उसमें होती है । उसके भी सात ही अङ्ग एवं २१ मुख होते हैं । वह सूक्ष्म विषयों का ही भोक्ता होता है । व्यष्टि प्राज्ञ एवं समष्टि अव्याकृत कारण प्रपञ्चाभिमानी चेतन तृतीय पाद है । उसका सुषुप्ति स्थान होता है । उस समय का आत्मा किसी काम्य की कामना नहीं करता, किसी स्वप्न को नहीं देखता, वही सुषुप्त है । उस स्थान में एकीभूत प्राज्ञ प्रज्ञानमूर्ति रहता है । वह आनन्दमय तथा आनन्द का ही भोक्ता होता है । वही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी तथा सर्वकारण होता है । वही सबकी उत्पत्ति तथा प्रलय का कारण होता है । कार्यकारणातीत शुद्ध परब्रह्म ही अर्धमात्रा का अर्थ है । वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिःप्रज्ञ है और न वह उभयतःप्रज्ञ है । न तो वह प्रज्ञरूप है न अप्रज्ञरूप है, किन्तु प्रज्ञानघनरूप अदृश्य, अग्राह्य, अव्यवहार्य, अलक्षण, अचिन्त्य तथा अव्यपदेश्य है । एकात्मप्रत्ययसार, जिसमें प्रपञ्च का उपशम है उसी को तत्त्ववित् अद्वैत शिव एवं चतुर्थ मानते हैं । वही आत्मा है, वही विज्ञेय है । वह सदा ही उज्ज्वल तथा अविद्यात्कार्यहीन है ।— स्वात्मबन्धरहित आनन्दरूप है । वही सर्वाधिष्ठान सत्तामात्र तथा अविद्यामय तमोमोह से रहित है । वोही मैं हूँ । वही ओम्, तत् सत् आदि पदों का लक्ष्यार्थ है । बही ब्रह्म है, वही चिदात्मक रामचन्द्र हैं । वही रामचन्द्र परम ज्योति हैं । वही मैं हूँ । इस प्रकार अद्वय आत्मा का ध्यान करके विशुद्ध मन द्वारा ब्रह्म के साथ आत्मा की एकता का निश्चय कर जो देहादि को बाधितकर तत्त्वतः मैं अखण्डबोधस्वरूप राम हूँ यह भावना करते हैं, वे संसारी नहीं, किन्तु राम ही होते हैं । 'ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भव्यं भवद् भविष्यमिति सर्वम् ओङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः, स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः, यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तं सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन