भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 1009, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 1009

संख्या १ रामोपासना ९३५ इदं सर्वात्मकं यन्त्रं प्रागुक्तमृषिसेवितम् । इदं रहस्यं परममीश्वरेणापि दुर्गमम् ॥ एवं यन्त्रं समाख्यातं न देयं प्राकृते जने । गुरुदर्शितमार्गेण स्वबुद्धया नैव तल्लिखेत् ॥ गुर्वनुक्ताः क्रियाः सर्वा निष्फलाः स्युर्यतो ध्रुवम् । अथ पीठपूजाप्रकारः— इस महाचक्र में राघवेन्द्र रामचन्द्र की पूजा करनी चाहिये । प्रथम पीठपूजा आवश्यक है। अपने सम्मुख वामभाग में (१) श्रीगुरुभ्यो नमः (२) श्रीपरमगुरुभ्यो नमः (३) श्रीपरमेष्ठिगुरुभ्यो नमः (४) श्रीपरस्परगुरुभ्यो नमः इस प्रकार गुरु की अर्चा कर के स्वदक्षिण भाग में (१) गं गणपतये नमः (२) सं सरस्वत्यै नमः (३) दुं दुर्गायै नमः (४) क्षं क्षेत्रपालाय नमः (५) ह्रीं बटुकाय नमः इन मन्त्रों से गणपति आदि देवताओं की पूजा करनी चाहिये । यागगृह के मध्य में वास्तुपुरुषाय नमः से पूजन कर पीठ के मध्य में मण्डूकाय नमः से पूजन करना चाहिये । पीठ के ऊपर (१) कालाग्निरुद्राय नमः (२) कूर्माय नमः (३) आधारशक्तये नमः (४) पृथिव्यै नमः इन आधार शक्तियों का पूजन कर (१) क्षीरसमुद्राय नमः (२) रत्नद्वीपाय नमः (३) मणिमण्डपाय नमः (४) कल्पवृक्षेभ्यो नमः (५) रत्नवेदि- कायै नमः (६) रत्नसिंहासनाय नमः इन मन्त्रों से भगवान् के निवासस्थल की पूजा पीठ में ही करनी चाहिये । पीठ के आग्नेयादि चार पादों में (१) धर्माय नमः (२) ज्ञानाय नमः (३) वैराग्याय नमः (४) ऐश्वर्याय नमः इस मन्त्र से पूजन करके पीठगात्र में पूर्वादि क्रम से (१) अधर्माय नमः (२) अज्ञानाय नमः (३) अवैराग्याय नमः (४) अनैश्वर्याय नमः इस मन्त्र से पूजा करनी चाहिये । कर्णिका में (१) आनन्दकन्द, (२) नाल, (३) सरोरुह, (४) पत्र और (५) केसर की पूजा करनी चाहिये । (१) आनन्दकन्दाय नमः, (२) संविन्नालाय नमः, (३) चित्सरोरुहाय नमः, (४) ज्ञानमयपत्रेभ्यो नमः (५) केसरेभ्यो नमः कर्णिका में प्रणव, अर्कबीज, चन्द्रबीज और अग्निबीजपूर्वक अर्कमण्डल, अग्नि- मण्डल तथा इन्दुमण्डल इन तीनों मण्डलों, सत्त्व, रज तथा तम इन तीनों गुणों, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा और ज्ञानात्मा इन आत्मचतुष्टयों, मायातत्त्व, कलातत्त्व, विद्यातत्त्व तथा परतत्त्व इन तत्त्वचतुष्टयों का एक-एक के ऊपर पूजन करके—(१) विमला, (२) उत्कर्षिणी, (३) ज्ञान, (४) क्रिया, (५) योगा, (६) प्रह्वी, (७) सत्या, (८) ईशाना तथा (९) अनुग्रहा इन शक्तियों का यजन पूर्वादि अष्ट पत्रों और कर्णिका में करना चाहिये । (१) ॐ अं अर्कमण्डलाय नमः (२) ॐ रं अग्निमण्डलाय नमः (३) ॐ इं इन्दुमण्डलाय नमः, (१) ॐ सं सत्त्वाय नमः (२) ॐ रं रजसे नमः (३) ॐ तं तमसे नमः, (१) ॐ आत्मने नमः (२) ॐ अन्तरात्मने नमः (३) ॐ परमात्मने नमः (४) ॐ परतत्त्वाय नमः (१) ॐ विमलायै नमः (२) ॐ उत्कर्षिण्यै नमः (३) ॐ ज्ञानायै नमः (४) ॐ क्रियायै नमः (५) ॐ योगायै नमः (६) ॐ प्रह्व्यै नमः (७) ॐ सत्यायै नमः (८) ॐ ईशानायै नमः (९) ॐ अनुग्रहायै नमः । मूर्ति में भगवान् श्रीराम का आवाहन— हाथ में पुष्पाञ्जलि लेकर हृदयपङ्कज में स्थित चैतन्यविग्रह श्रीराम का ध्यान कर पादुका मुद्रा से हृदय- कमल से श्वासमार्ग द्वारा पुष्पाञ्जलि में समागत भगवान् श्रीराम की भावना कर सिद्ध मुद्रा से मूर्ति में संयोजित करके आवाहनादि सात मुद्राओं का प्रदर्शन करना चाहिये । "चैतन्यविग्रहं रामं स्थितं हृदयपङ्कजे । श्वासमार्गेणागतञ्च चिन्तयेत् कुसुमाञ्जलौ ॥ 'मूलाधाराद् द्वादशान्तमानीतः कुसुमाञ्जलिः' मूलाधार से कुसुमपरिपूर्ण अञ्जलि को ललाट स्थान में लाना कुसुमाञ्जलि मुद्रा है। उत्तान हस्तद्वय का संहत अञ्जलिबन्ध करके अङ्गुष्ठ को अनामिका के मूल में रखने से आवाह- नीया मुद्रा होती है। वही अधोमुखी स्थापनी मुद्रा है।

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 1009, कुल 1049 में से · BharatKosha