भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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९३६ रामायणमीमांसा परिशिष्ठ “एषैवाधोमुखी मुद्रा स्थापनीत्युच्यते बुधैः ।” “उत्तानाङ्गुष्ठयोगेन मुष्टीकृतकरद्वयम् । सन्निधीकरणं नाम मुद्रा देवाचंनाविधौ ॥” दोनों हाथों की मुष्टि बांधकर उत्तान अङ्गुष्ठों को मिलाने से सन्निधीकरण मुद्रा बनती है। दोनों अङ्गुष्ठों को मुष्टिगर्भित कर लेने पर वही सन्निरोधिनी मुद्रा होती है। “अङ्गुष्ठगभिणी सैव मुद्रा स्यात् सन्निरोधिनी ।” दोनों मुष्टियां उत्तान होकर मिल जायें तो सम्मुखीकरण मुद्रा बनती है। “उत्तानमुष्टियुगला सम्मुखीकरणी तथा । देवताङ्गे षडङ्गानां न्यासः स्यात्सकलीकृतिः ॥ अन्योन्याङ्गुष्ठसंल्लग्ना विस्तारिकतकरद्वया । महामुद्रेयमाख्याता न्यूनाधिकसमापनी ॥” दोनों अङ्गुष्ठ परस्पर संलग्न रखकर दोनों हाथों को अधोमुख फैलाकर हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र का स्पर्श करना सकलीकरण मुद्रा होती है। दोनों अङ्गुष्ठों को संलग्नकर दोनों हाथों की समस्त अङ्गुलियों को प्रसारित करना ही परमीकरण मुद्रा है। “अन्योन्यग्रथिताङ्गुष्ठा प्रसारितकराङ्गुली । महामुद्रेयमुदिता परमीकरणं बुधैः ॥” बाँयें हाथ की मुष्टि बनाकर दीर्घ अधोमुखतर्जनी को मुष्टि के चारों ओर घुमाना अवगुण्ठन मुद्रा है । “सव्यहस्तकृता मुष्टिर्दीर्घाधोमुखतर्जनी । अवगुण्ठनमुद्रेयमभितो भ्रमिता मता ॥” धेनुमुद्रा से अमृतीकरण करना चाहिये । “वामाङ्गुष्ठं तु सङ्गृह्य दक्षिणेन तु मुष्टिना । कृतोत्तानां ततो मुष्टिमाङ्गुष्ठं तु प्रसारयेत् ॥ वामाङ्गुल्या तथा श्लिष्टाः संयुक्ताः स्युः प्रसारिताः । दक्षिणाङ्गुष्ठसंस्पृष्टा मुद्रैषा शङ्खमुद्रिका ॥” बायें अङ्गुष्ठ को दक्षिण मुष्टि से पकड़कर मुष्टि को उत्तान कर बाँये हाथ की संहृत अङ्गुलियों से प्रसारित दक्षिण अङ्गुष्ठ का सम्बन्ध होने से शङ्खमुद्रा बनती है। अन्योन्य अभिमुख स्पर्श-व्यत्यय से अङ्गुलियों द्वारा प्रयत्न से मण्डलीकरण चक्रमुद्रा बनती है। “अन्योन्याभिमुखस्पर्शव्यत्ययेन तु वेष्टयेत् । अङ्गुलीभिः प्रयत्नेन मण्डलीकरणं मुने । चक्रमुद्रेयमाख्याता गदामुद्रा ततः परम् ॥” जिसमें अङ्गुलियां अन्योन्य अभिमुख होकर आश्लिष्ट हों और मध्यमा प्रोन्नत हो वह गदामुद्रा है । “अन्योन्याभिमुखा श्लिष्टाऽङ्गुलिः प्रोन्नतमध्यमा । अथाङ्गुष्ठद्वयं मध्ये दत्त्वापि परितः करो ॥ मण्डलीकरणं सम्यगङ्गुलीनां तपोधन । पद्ममुद्रा भवेदेषा धेनुमुद्रा ततः परम् ॥” दोनों अङ्गुष्ठों को मध्य में देकर अङ्गुलियों का मण्डलीकरण ही पद्ममुद्रा है।