रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २५ हस्तभिरित्तरासैः क्षेत्रसाराधिभिः सह । हिरण्यैरश्वैरा गोभिः प्रत्याष्टा श्रीरियं मयि ॥" ( कां० गृ० सू० अध्याय १३) हे सीते ! तू हम प्रजापति की सन्तानों को धन और पुष्टि देनेवाली है । मैं पुष्टि की कामना से तुझे आहुति देता हूँ । कुमुदों और कमलों से सुसज्जित सर्वाङ्गशोभिनी, सहस्रों प्रकारवाली, कृषिरूपा यह व्यापक लक्ष्मी निरन्तर मेरे साथ रहे । मनुष्य तुमको उर्वी कहते हैं । मननशील लोग तुमको लक्ष्मी कहते हैं । हम लोगों के कोश में आरोग्य-वर्धक और शक्तिशाली पर्याप्त अन्न प्रदान करो । हे हरी-भरी लहलहाती पर्जन्य-पत्नी ! उपासना के वशीभूत होकर हमारी ओर कृपा की दृष्टि से देखो । हे कालनेत्रे ! हवि प्राप्त कर हमारे द्विपदों और चतुष्पदों को तथा हमें तृप्ति प्रदान करो । जिन शक्तियों के द्वारा देवगण असुरों, यातुधानों, गन्धर्वों और राक्षसों को नियन्त्रित करने में सफल होते हैं, उन शक्तियों से युक्त और प्रसन्न होकर हमारे पास आओ एवं हे सुभगे ! हमको सहस्रविध पुष्टि प्रदान करो तथा हिरण्मयी माला धारण करनेवाली, कमल से सुशोभित सर्वाङ्गशोभिनी, हे श्यामे ! यह हिरण्यमयी सुनहली कृषिरूपी लक्ष्मी सदा प्रसन्न होकर हमारे साथ रहे । हे देवि ! अश्वी, इन्द्र और राध ( नक्षत्र ) तथा पुष्टि के साथ हमारे पास आओ । कृषक लोग सब दिशाओं में तुम्हारी ओर निहारते हैं । दिन, रात, अर्धमास ( पक्ष ), पूर्णमास, ऋतु आदि सभी तुम्हारी ओर निहारते हैं । तुम मरणशील मनुष्यादि प्रजाओं तथा देवताओं का पालन करती हो । विविध शीघ्रगामी हस्ती, अश्व आदि वाहनों, अन्न-भण्डारों, स्वर्णादि रत्नों तथा गौ आदि पशुधनों से भरपूर लक्ष्मी हमारे यहाँ अविच्छिन्नरूप से स्थिर रहे । भारतीय-परम्परा से शास्त्राध्ययन न होने के कारण बुल्के महाशय ने मन्त्रों का सम्यक् अर्थ नहीं समझा, कई अंशों को तो सर्वथा छोड़ ही दिया । उनका अर्थ उनके ग्रन्थ से ही देखना चाहिये । विस्तार-भय से वह यहाँ नहीं दिया जा रहा है । श्रीबुल्के के कथनानुसार लौकिक लाङ्गल-पद्धति ही देवतादिरूपेण विकसित होकर अन्त में मानवी बन गयी है । इस विचार-सरणि के अनुसार "वस्तुतः लाङ्गल-रेखा ही मुख्य सीता है । उसमें ही पीछे से देवता और मानवी पक्षों की कल्पना कर ली गयी है । वस्तुतः न वह देवता हैं और न मानवी ।" किन्तु ये सब बातें सर्वथा असंगत एवं निर्मूल हैं । इसी प्रकार मार्क्सवादियों की कल्पना है "आदिम-युग वर्षा, ओले, अन्धकार आदि से आवृत उपद्रुत भीरु जङ्गली मनुष्यों ने अपने इर्द-गिर्द अनेक भूत, प्रेत आदि आत्माओं की कल्पना की थी । वही आगे चलकर सभ्यता के साबुन में धुलते-धुलते देव-कल्पना बन गयी । देव-कल्पना भी वैज्ञानिक चमत्कृति से चमत्कृत होकर ईश्वर-कल्पना एवं निर्गुण-ब्रह्म-कल्पना के रूप में विकसित हुई । अर्थात् ईश्वर, निर्गुण ब्रह्म आदि कोई वास्तविक तत्त्व नहीं हैं, किन्तु कल्पनामात्र हैं ।" किन्तु ऐसी विविध कल्पनाएँ वस्तु-स्थिति का अपलाप कर प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम आदि दृढ़तर प्रमाणों से सिद्ध वस्तु को आवृत्त कर देती हैं । प्रसिद्ध ही है— हरित भूमि तृन संकुल, सूझि पड़े नहि पंथ । जिमि पाखण्ड वाद ते, लुप्त होहिं सदग्रंथ ॥