भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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१२ रामायणमीमांसा द्वितीय ऊपर उक्त प्रार्थना-मन्त्रों में सर्वाङ्ग-शोभिनी, हिरण्यमालाधारिणी, कालनेत्रा, श्यामा, हिरण्यमयी सीता का स्पष्ट वर्णन है । फिर भी 'यह सब कल्पनामात्र है, सत्य नहीं' यह सिद्ध करने के लिए बुल्के साहब के पास क्या प्रमाण है ? प्रकृत प्रसंग में यह कहना है कि जैसे रूपग्रहण में नेत्र का वस्तुतः असाधारण प्रामाण्य मान्य होता है वैसे ही धर्म और ब्रह्म रूप वस्तु में वेदादि शास्त्र इतरप्रमाणानपेक्षस्वतन्त्ररूप से प्रमाण मान्य हैं। अतीत घटना आदि इतिवृत्तों के सम्बन्ध में भी शब्द-प्रामाण्य की आवश्यकता सर्वसम्मत है । न्यायालयों में आज भी इतर प्रमाणों के समान ही दस्तावेज आदि लेखों का प्रामाण्य माना जाता है । कारण-दोष तथा बाध-ज्ञान होने से ही उनका अप्रा- माण्य होता है । सीतासम्बन्धी प्रकृत मन्त्र सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर की स्वरूपभूत दिव्य सच्चिदानन्दमयी शक्ति का ही प्रतिपादन करते हैं । उसी को लक्ष्मी, श्री, सर्वशक्तियों एवं सर्वदेवों से आराध्य और सर्वोपजीव्य रूप से प्रति- पादित किया गया है । “वित्तिरसि पुष्टिरसि” इस अंश से उसी को दिव्य ज्ञानरूपा, दिव्य शक्तिरूपा कहा गया है । यहाँ तक कि सभी प्राजापत्य ईश्वरीय जीवरूप सन्तानों की भी वित्ति और पुष्टिरूप उसी को कहा गया है। उसी का पुराणों में विशेषकर दुर्गासप्तशती में, जिसका कि आर्यों में अविच्छिन्न परम्परा से पाठानुष्ठान किया जाता है, चैतन्य और शक्तिरूप से निरूपण है— 'या देवी सर्वभूतेषु चितिरूपेण संस्थिता' 'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता' ये विशेषण जड़ रेखामात्र के लिए कदापि उपयुक्त नहीं हो सकते । दिव्यज्ञानसम्पन्न ऋषि लोग रेखामात्र की वन्दना और पूजा का विधान नहीं कर सकते । उसी महाशक्ति की धरित्रीरूप से भी माना गया है और वही नाना प्रकार के कुमुद और कह्लारों से सुसज्जित सस्यश्यामला सर्वाङ्गशोभिनी, विविध यव, गोधूम, धान्य, फल, पुष्प आदि सहस्रों पौष्टिक पदार्थों से भरपूर लक्ष्मी के रूप में कही गयी है । उक्त मन्त्रों का श्रीसूक्त के साथ बहुत अंशों में समन्वय होता है । 'श्रीरियं मयि' 'श्रियं त्वा' इत्यादि अंश 'श्रियं देवीमुपह्वये' इस श्रीसूक्त के अंश से मिलता है । 'पुष्करिणी' और 'पुष्टि' ये दोनों शब्द 'आद्राँ पुष्करिणीं पुष्टिम्' से मिलते हैं । 'हरिणी' शब्द भी दोनों में हैं। 'हिरण्मयम्' 'पुष्करिणी' आदि का 'सुवर्णरजतस्रजाम्' से मेल मिलता है। 'हिरण्यप्रकारा' का 'हिरण्यप्राकारा' से 'पर्जन्यपत्नी' का 'आर्द्रा' से, 'हस्तिनाद-प्रबोधिनी' का 'हिरण्यैश्वरैरा गोभिः' से एवं 'अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्' का 'हस्तिभिरुत्तरास्तैरहिरण्यैश्वरैरा गोभिः' से मेल मिलता है । इस मेल से यह स्पष्टतया विदित होता है कि श्रीसूक्त का जो प्रतिपाद्य विषय है वही सीतासम्बन्धी मन्त्रों का भी प्रतिपाद्य है । अश्वी आदि देवताओं एवं असुर, यातुधान, राक्षस आदि पर नियन्त्रण करनेवाली शक्तियों से तथा विविध धन-धान्य एवं पोषक तत्त्वों से युक्त अनन्त ब्रह्माण्ड की ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी ही 'सीता' है । वह इन्द्र से भी युक्त है । यहाँ 'इन्द्र' शब्द परमैश्वर्य के योग से रामरूप सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् ईश्वर का ही बोधक है । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते”—श्वेताश्वतर उ० के इस मन्त्र में स्पष्ट ही 'इन्द्र' शब्द का ईश्वर अर्थ ग्राह्य है । इन्द्र परमेश्वर माया वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, राम, कृष्ण आदि अनेक रूपों से भासमान होते हैं । अथर्वसंहिता के 'इन्द्रः सीतां निगृह्णातु' इस मन्त्र के अनुसार भी सीता से सम्बन्धित इन्द्र, साधारण इन्द्र न होकर, रामरूप परमेश्वर ही सिद्ध होते हैं । इसी रूप में सीता का स्मरण बौद्धों ने भी किया है । बौद्ध अभिधर्ममहाविभाषा में लिखा है कि कृषक प्रचुर- मात्रा में सस्य प्राप्त करने पर कहता है कि यह श्री, सीता और समा इन देवियों का वरदान है । वेद, उपनिषद्, सूत्र, रामायण तथा पुराणों के अनुसार महालक्ष्मी या सीता के अनेक रूप मिलते हैं । प्रथम अनन्त ब्रह्माण्डों के