रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 1049 में से
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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २७ अधिष्ठान सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की स्वरूपभूता सच्चिदानन्दमयी सीता ऊपर लिखी 'विंतरत्सं', 'तृप्तिं नो धेहि', 'चितिरूपेण संस्थिता', 'सर्वचैतन्यरूपं तामाद्यां विद्यां च धीमहि' (दे० भा० १।१।१) 'तद् ब्रह्म सत्तासामान्यम्' (सीता० उ० ) से सिद्ध है। दूसरी भगवच्छक्तिस्वरूपा और तीसरी अनन्त ब्रह्माण्डात्मक प्रपञ्चोत्पादिनी मूलप्रकृति शक्तिरूपा है । श्री, भू और नीला भी इसी के रूप हैं । भगवत्संकल्पानुसार लोकरक्षणार्थ वही विविध रूप धारण करती हैं। भूदेवी सप्तसागरपरिवेष्टित सप्तद्वीपा वसुन्धरा तथा चतुर्दश भुवनों की आधारभूता प्रणवात्मिका होकर आराध्या होती हैं । नीला वही शक्ति है जिसका सङ्केत पिछले मन्त्रों से 'श्यामा' शब्द से किया गया है। यही सर्वप्राणियों के पोषण के लिए सर्वौषधिरूपा भी है । कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, लता, गुल्म, सोम, विविध सस्य आदि के रूप में वही विश्व का पोषण करती है । "श्रीदेवी त्रिविधं रूपं कृत्वा भगवत्सङ्कल्पानुगुण्येन लोकरक्षणार्थं रूपं धारयति । भूदेवी ससागराम्भः- सप्तद्वीपा वसुन्धरा भूरादिचतुर्दशभुवनानामाधाराधेया प्रणवात्मिका भवति । नीला च मुखविद्युन्मालिनी सर्वौषधीनां सर्वप्राणिनां पोषणार्थं सर्वरूपा भवति ।" (सीता० उ०) "सोमात्मिका ओषधीनां प्रभवति कल्पवृक्षपुष्पफललतागुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवानां महस्तोमफलप्रदा अमृतेन तृप्तिं जनयन्ती देवाना मन्नेन पशूनां तृणेन ।" ( सीता० उ० ) "पुष्पपल्लवमूलादिफलाढ्यं शाकसञ्चयम् । काम्यानन्तरसैर्युकं क्षुत्तृण्मृत्युजरापहम् ।।' ( दु० स० मूर्ति २० १४) "ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः । भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥ शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।" (दु० स० ११।४८,४९) शाकम्भरी भगवती पुष्प, पल्लव, मूल आदि प्रचुर एवं अभीष्ट अनन्त रसों से युक्त क्षुधा और तृषा मिटानेवाले शाकसञ्चय को धारण करती है । उसने अपने शरीर से उद्भूत शाकों के द्वारा शतवार्षिकी अनावृष्टि के समय सम्पूर्ण लोकों का पालन किया था । इत्यादि वचनों से उर्वी कृषि, फल, मूल, सस्य, मोम, कल्याण आदि रूप में उसी महाशक्ति की अभिव्यञ्जना होती है। सीतासूक्त ऋगादि-मन्त्रों तथा सूक्तों का उपबृंहण उपर्युक्त रूप में किया गया है। हिरण्यस्रक्, हिरण्यमय आदि अंशों की भी विस्तृत व्याख्या सीतोपनिषद् में मिलती है— "योगशक्तियोगरूपा कल्पवृक्षकामधेनुचिन्तामणिशङ्खपद्मनिध्यादिनवनिधिसमाश्रिता" इस रूप में उसी शक्ति का वर्णन है । चारभुजाओंवाली अभय, वर तथा पद्म धारण करनेवाली, किरीटादि आभरणों से अलङ्कृत, सब देवों से परिवृत, कल्पवृक्ष के नीचे चार गजेन्द्रों द्वारा रत्नघटस्थ अमृतमय जल से अभिषिच्यमान, ब्रह्मादि देवों से वन्द्यमान, अणिमादि ऐश्वर्यों से समन्वित, कामधेनु, वेद, शास्त्र आदि से स्तूयमान, जया आदि अप्सराओं से सेव्यमान, आदित्य, सोम आदि दीपों से नीराजित, तुम्बुरु, नारद आदि से गीयमान, राका और सिनीवाली से छत्र द्वारा, आह्लादिनी और माया से चामर द्वारा, स्वाहा और स्वधा से व्यजन द्वारा सेवित, भृगु आदि महर्षियों द्वारा पूजित, दिव्य सिंहासन पर पद्मासन से विराजमान, सकल कारण और कार्यों की महाशक्तिरूपा लक्ष्मी सब देवताओं से पूज्यमान वीर-लक्ष्मीरूप से जानी जाती हैं । इस तरह अनन्त ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान, स्वप्रकाश, परब्रह्मा- स्वरूप राम की स्वरूपभूता, सच्चिदानन्दमयी सीता ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी, मूल-प्रकृति, उर्वी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी, भोगलक्ष्मी तथा कृषिमयी धनधान्यरूपा, रत्नमयी कल्पवृक्षादिस्वरूपा होकर सर्वजगतपोषण