रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २७ अधिष्ठान सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की स्वरूपभूता सच्चिदानन्दमयी सीता ऊपर लिखी 'विंतरत्सं', 'तृप्तिं नो धेहि', 'चितिरूपेण संस्थिता', 'सर्वचैतन्यरूपं तामाद्यां विद्यां च धीमहि' (दे० भा० १।१।१) 'तद् ब्रह्म सत्तासामान्यम्' (सीता० उ० ) से सिद्ध है। दूसरी भगवच्छक्तिस्वरूपा और तीसरी अनन्त ब्रह्माण्डात्मक प्रपञ्चोत्पादिनी मूलप्रकृति शक्तिरूपा है । श्री, भू और नीला भी इसी के रूप हैं । भगवत्संकल्पानुसार लोकरक्षणार्थ वही विविध रूप धारण करती हैं। भूदेवी सप्तसागरपरिवेष्टित सप्तद्वीपा वसुन्धरा तथा चतुर्दश भुवनों की आधारभूता प्रणवात्मिका होकर आराध्या होती हैं । नीला वही शक्ति है जिसका सङ्केत पिछले मन्त्रों से 'श्यामा' शब्द से किया गया है। यही सर्वप्राणियों के पोषण के लिए सर्वौषधिरूपा भी है । कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, लता, गुल्म, सोम, विविध सस्य आदि के रूप में वही विश्व का पोषण करती है । "श्रीदेवी त्रिविधं रूपं कृत्वा भगवत्सङ्कल्पानुगुण्येन लोकरक्षणार्थं रूपं धारयति । भूदेवी ससागराम्भः- सप्तद्वीपा वसुन्धरा भूरादिचतुर्दशभुवनानामाधाराधेया प्रणवात्मिका भवति । नीला च मुखविद्युन्मालिनी सर्वौषधीनां सर्वप्राणिनां पोषणार्थं सर्वरूपा भवति ।" (सीता० उ०) "सोमात्मिका ओषधीनां प्रभवति कल्पवृक्षपुष्पफललतागुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवानां महस्तोमफलप्रदा अमृतेन तृप्तिं जनयन्ती देवाना मन्नेन पशूनां तृणेन ।" ( सीता० उ० ) "पुष्पपल्लवमूलादिफलाढ्यं शाकसञ्चयम् । काम्यानन्तरसैर्युकं क्षुत्तृण्मृत्युजरापहम् ।।' ( दु० स० मूर्ति २० १४) "ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः । भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥ शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।" (दु० स० ११।४८,४९) शाकम्भरी भगवती पुष्प, पल्लव, मूल आदि प्रचुर एवं अभीष्ट अनन्त रसों से युक्त क्षुधा और तृषा मिटानेवाले शाकसञ्चय को धारण करती है । उसने अपने शरीर से उद्भूत शाकों के द्वारा शतवार्षिकी अनावृष्टि के समय सम्पूर्ण लोकों का पालन किया था । इत्यादि वचनों से उर्वी कृषि, फल, मूल, सस्य, मोम, कल्याण आदि रूप में उसी महाशक्ति की अभिव्यञ्जना होती है। सीतासूक्त ऋगादि-मन्त्रों तथा सूक्तों का उपबृंहण उपर्युक्त रूप में किया गया है। हिरण्यस्रक्, हिरण्यमय आदि अंशों की भी विस्तृत व्याख्या सीतोपनिषद् में मिलती है— "योगशक्तियोगरूपा कल्पवृक्षकामधेनुचिन्तामणिशङ्खपद्मनिध्यादिनवनिधिसमाश्रिता" इस रूप में उसी शक्ति का वर्णन है । चारभुजाओंवाली अभय, वर तथा पद्म धारण करनेवाली, किरीटादि आभरणों से अलङ्कृत, सब देवों से परिवृत, कल्पवृक्ष के नीचे चार गजेन्द्रों द्वारा रत्नघटस्थ अमृतमय जल से अभिषिच्यमान, ब्रह्मादि देवों से वन्द्यमान, अणिमादि ऐश्वर्यों से समन्वित, कामधेनु, वेद, शास्त्र आदि से स्तूयमान, जया आदि अप्सराओं से सेव्यमान, आदित्य, सोम आदि दीपों से नीराजित, तुम्बुरु, नारद आदि से गीयमान, राका और सिनीवाली से छत्र द्वारा, आह्लादिनी और माया से चामर द्वारा, स्वाहा और स्वधा से व्यजन द्वारा सेवित, भृगु आदि महर्षियों द्वारा पूजित, दिव्य सिंहासन पर पद्मासन से विराजमान, सकल कारण और कार्यों की महाशक्तिरूपा लक्ष्मी सब देवताओं से पूज्यमान वीर-लक्ष्मीरूप से जानी जाती हैं । इस तरह अनन्त ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान, स्वप्रकाश, परब्रह्मा- स्वरूप राम की स्वरूपभूता, सच्चिदानन्दमयी सीता ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी, मूल-प्रकृति, उर्वी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी, भोगलक्ष्मी तथा कृषिमयी धनधान्यरूपा, रत्नमयी कल्पवृक्षादिस्वरूपा होकर सर्वजगतपोषण
-tradition, verses are numbered continuously, OR this is from a specific edition where Sukta 101 has Khila verses numbered 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19!
YES! Rigveda Khila (खिलेषु) attached to 10.101!
In the Khila of RV 10.101, there are verses that continue up to 18, 19!
Verse 18: "सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव..."
Verse 19: "घृतेन सीता मधुना समक्ता..."
THAT MAKES 100% SENSE!
The digits are indeed १८ and १९!
Line 12: (ऋ० सं० १०।१०१।१८)
Line 14: (ऋ० सं० १०।१०१।१९)
Now look at line 11 again:
"“सीते वन्दामहे त्वार्व्वांची सुभगे भव ।"
Wait, let's look at "त्वार्व्वांची":
Does it have "त्वार्व्वांची" or "त्वार्वाची"?
Wait, look at line 11:
“सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव ।
Let's look at त्वार्वाची:
In line 7: `“अर्वाची सुभगे भव सीते वन्दामहे
अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २९ “चत्वारि शृङ्गास्त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महादेवो मर्त्यां आविवेश ॥” इस मन्त्र का अर्थ भाष्यानुसार यज्ञपरक होने पर भी महाभाष्यकार पतञ्जलि की दृष्टि से व्याकरणशास्त्रपरक अर्थ लिया जाता है और वह अर्थ मान्य भी होता है। विशेषतः ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ इस वचन के अनुसार सम्पूर्ण वेदों का अवान्तर तात्पर्य अन्य विषयों में होते हुए भी महातात्पर्य परमात्मस्वरूप में ही है। सीता-राम परमेश्वराभिन्न होने से परमेश्वर ही हैं, अतः उनमें इन मन्त्रों की सङ्गति सुतरां सङ्गत है। अतएव रामायण की सीता का लाङ्गल-पद्धति से ही उत्थान रामायण में वर्णित है— ‘अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः ॥ क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता । भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥’’ ( वा० रा० १।६६।१३, १४ ) ‘तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् । अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता ॥’’ ( वा० रा० २।११८।२८ ) निर्विशेषण सीता-राम शुक्लयजुर्वेद की मुक्तिकोपनिषद् में सभी उपनिषदों का उद्देशतः वर्णन है। उसमें सीतोपनिषद् का भी उल्लेख है। सीतोपनिषद् में परब्रह्मस्वरूपिणी, परप्रकृतिस्वरूपिणी आदि रूप से सीता का वर्णन है। उसी में सीता के एक रूप को हलाग्रसमुत्पन्न कहा गया है—‘‘द्वितीया भूतले हलाग्रे समुत्पन्ना।’’ उपनिषदों और तन्त्रों में श्री, भू, नीला आदि रूप से भगवान् की त्रिविध शक्तियों का वर्णन है। उनमें एक भूसमुत्पन्ना वही कही जा सकती है। श्रीबुल्के ने विभिन्न वैदिक उद्धरणों के अनुसार सावित्री—सीता और सीता की खोज की है। उनमें स्पष्ट ही रामायण की सीता ‘निर्विशेषण’ सीता ही हैं। जैसे लक्ष्मी और गृहलक्ष्मी आदि रूप में मुख्यलक्ष्मी ‘निर्विशेषण’ लक्ष्मी समझी जाती है, गृहलक्ष्मी आदि अनेक लक्ष्मियां सविशेषण हो सकती हैं वैसे ही वेद, उपनिषद् तथा रामायणों द्वारा वर्णित सीता निर्विशेषण सीता ही हैं। यही स्थिति राम के सम्बन्ध में भी समझ लेनी चाहिये। निर्विशेषण राम ही रामायण के राम हैं। दूसरे सविशेषण राम आदि का नाम अनादिसिद्ध राम के नाम पर रखा गया है। वैदेही, दाशरथि आदि विशेषण अवतारी स्वरूपविशेष के बोधनार्थ ही हैं जैसे आज भी राम और सीता के नाम पर नाम रखे जाते हैं। अतएव सावित्री सीता का नाम भी निर्विशेषण मुख्य सीता के आधार पर ही सीता रखा गया है। श्रीसूक्त के अनुसार महालक्ष्मीरूपा सीता ‘सूर्या’ और ‘चन्द्रा’ दोनों ही शब्दों से कही गयी है। तथा च महालक्ष्मी की चन्द्रा शक्ति के समान ही सूर्या शक्ति भी सीता शब्द से व्यवहृत हो सकी थी—‘सूर्यां हिरण्मयीं’, ‘चन्द्रां प्रभासाम्’ ( श्रीसूक्त ) । स्थागर-चर्चा यहाँ बुल्के साहब ने तैत्तिरीयब्राह्मण में वर्णित सीता सावित्री के मन्त्राभिमन्त्रित स्थागर ( अङ्गराग ) से वाल्मीकिरामायण और अध्यात्मरामायण में उल्लिखित अङ्गराग की भिड़न्त भिड़ाकर स्थागर का विकास इस रूप में है, माना है और तुलसीदासजी ने जानबूझकर यह अंश छिपा लिया, ऐसा बतलाया है। परन्तु यह कथन अयथार्थ है, क्योंकि जो बात वाल्मीकिरामायण और अध्यात्मरामायण दोनों में हो, महात्मा तुलसीदास उसका अपलाप नहीं कर सकते। अतः उनके ‘दिव्य वसन भूषण’ शब्द से अङ्गराग भी समझ लेना चाहिये। यहाँ एक बात और भी
३० रामायणमीमांसा द्वितीय ध्यान देने योग्य है, वह यह कि ऋषि सर्वज्ञकल्प होते हैं, अतः स्वतन्त्ररूप से अनसूया-समर्पित अङ्ग राग दिव्य वसन- भूषण आदि का ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने उल्लेख किया है। संसार में मिलती-जुलती समानरूप से अनेकों घटनाएँ हो सकती हैं, अतः यह आवश्यक नहीं कि सावित्री सीता द्वारा प्राप्त अङ्गराग का हो यहाँ आवर्तन किया जाय। अतएव प्रजापति द्वारा सूर्या को दत्त अङ्गराग अन्य वस्तु है और अनसूया द्वारा सीता को प्रदत्त अङ्गराग अन्य वस्तु । सावित्री सीता का स्थागर केवल मुखलेप है तथा अनसूया द्वारा सीता के लिए दी गयी वस्तु अङ्गराग है। मुखलेप वशीकरण के लिए है, यह केवल स्वाभाविक सौन्दर्य का अभिव्यञ्जक है और अङ्गराग सर्वाङ्ग-विलेपन है, इसके साथ दिव्य मालाएँ, वस्त्र एवं आभूषण भी हैं— “इदं दिव्यं वरं माल्यं वस्त्रमाभरणानि च । अङ्गरागञ्च वैदेहि महार्हमनुलेपनम् ॥ मया दत्तमित्दं सीते तव गात्राणि शोभयेत् । अनुरूपमसंक्लिष्टं नित्यमेव भविष्यति ॥ अङ्गरागेण दिव्येन लिप्ताङ्गी जनकात्मजे । शोभयिष्यसि भर्तारं यथा श्रीविष्णुमव्ययम् ॥” ( वा० रा० २।११८।१८-२० ) । वेदों की सूत्रभूत वस्तुएँ पूर्वकथनानुसार वेदों की सूत्रभूत वस्तुओं का रामायण, महाभारत तथा पुराणादि में विशेष उपबृंहण होता है। तदनुसार ही पूर्वोक्त मन्त्रों की सीता के प्रतीक का ही महाभारत के द्रोणपर्व तथा जयद्रथपर्व में ध्वजवर्णन नामक अध्याय में वर्णन है— “मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्निशिखामिव । सौवर्णीं प्रतिपश्यामः सीतामप्रतिमां शुभाम् ॥ सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय मारिष । सर्वबीजविरूढेव यथा सीता श्रिया वृता ॥” ( म० भा० ७।१०५।१८, १९ ) “कर्षकाणां च सीतेति भूतानां धारिणीति च ।” ( हरिवं० २।३।१४ ) यहाँ पर कृषकों की कृषि की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में सीता को दुर्गरूप ही बतलाया है। प्राणियों को धारण करनेवाली उर्वीरूपा भी उसी को कहा गया है । ‘आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि ।’ ( दु० स० १।१४ ) इस श्लोक में सर्वभूत-धारयित्री धरित्री के रूपमें श्रीदुर्गा का स्तवन है । स्पष्ट ही वही चयन नामक महान् श्रौत यज्ञ की सीताओं, रेखाओं की एवं क्रतुराट् चयन की अधिष्ठात्री महाशक्ति है । इसी दृष्टि से सीता-रेखाओं का वैदिक चयनादि में यजन होता है । रामचन्द्रादि नामों की अनादिता आगे चलकर बुल्के महाशय ने 'राम, रामचन्द्र तथा रामभद्र' नामों की समालोचना की है, उनमें पौर्वापर्य की भी कल्पना की है । वस्तुतः राम और रामचन्द्र आदि नाम अनादि ही हैं। वेद, रामायण, पुराण आदि अनादि राम और रामचरित का ही वर्णन करते हैं । बलराम और परशुराम से निर्विशेष राम स्वतः पृथक् सिद्ध हो जाते हैं। यद्यपि वे भी राम के अंश ही हैं। निर्विशेष राम के व्यवच्छेद के लिए इतर विशेषणों की अपेक्षा न होने पर भी गुणकृत बहुत से गौण नाम विष्णुपुराण आदि में वर्णित हैं । उपास्यगत गुणविशेषों की उन नामों द्वारा अभिव्यञ्जना
उपासना में अपेक्षित होती है। हाँ, रामचन्द्र के सम्बन्ध में उनकी निम्नोक्त कल्पना ठीक भी हो सकती है कि राम के सौन्दर्य तथा लोकप्रियता की अभिव्यञ्जना के लिए वाल्मीकि ने बहुत स्थलों पर चन्द्रमा से राम की तुलना की है— ( रामं ) चन्द्रमिवोदितम् ( अयोध्याकाण्ड ४४।२२ ) ( राममुखं ) पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ( युद्धकाण्ड ३३।३२ ) ( रामस्य ) पूर्णचन्द्राननस्याथ ( अयोध्याकाण्ड १।४४ ) ( रामः ) सोमवत्प्रियदर्शनः ( बालकाण्ड १।१८ ) ( रामः ) लोककान्तः शशी यथा ( सुन्दरकाण्ड ३४।२८ ) ( रामवदनम् ) उदितपूर्णचन्द्रकान्तम् ( युद्धकाण्ड ११४।३५ ) क्या देवता काल्पनिक हैं ? मिस्टर बुल्के एवं उनके जैसे विचारवाले बहुत से पाश्चात्य और उनसे प्रभावित भारतीय विद्वान् भी देवताओं को केवल काल्पनिक मानते हैं । उनके अनुसार पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ के अग्नि, वायु, इन्द्र या आदित्य आदि प्रकृति और उसकी विभिन्न शक्तियों में ही देवता की कल्पना कर ली गयी है । परन्तु यह वेदादि शास्त्रों का तात्पर्य न समझने के कारण उनका भ्रम ही है; अन्यथा संसार के सर्व-प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ ऋग्वेद में जिन प्रधान देवताओं का दो सौ सूक्तों के द्वारा स्तवन किया गया है, 'वे केवल जड़ एवं प्राकृतिक वस्तु हैं'—यह कहना कहाँ तक सङ्गत हो सकता है ? जब कि वैदिक ऋषि सदा से ही प्रकृति एवं प्राकृत व्यष्टि, समष्टि, स्थूल, सूक्ष्म, कारण, सब प्रपञ्चों से अतीत, निर्विकार, असङ्ग चेतन वस्तु को जानते और पूजते रहे हैं । जड़ अचेतन वस्तु की प्रार्थना करना और उससे कुशल-क्षेम की आशा रखना शुद्ध मूर्खता ही हो सकती है, अतः जैसे जड़ देहादि के द्वारा देहत्रयाभिमानी आत्मा के ही अर्चन, प्रार्थना आदि होते हैं वैसे ही पृथिवी आदि लोकों में उनके अग्नि आदि प्रधान तत्त्वों के द्वारा तत्तत् अभिमानी महान् शक्तिशाली चेतन ईश्वर के अंशभूत देवताओं का ही स्तवन आदि किया जाता है— 'यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यम- यत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ।।' ( बृ० उ० ३।७।३ ) जो पृथ्वी में रहता हुआ, पृथ्वी के भीतर है, पृथ्वी जिसको नहीं जानती, पृथ्वी जिसका शरीर है, जो पृथ्वी के भीतर रहता हुआ पृथ्वी को नियन्त्रित करता है, वही अन्तर्यामी तुम्हारा आत्मा है और वह अमृत है । यहाँ 'पृथ्वी जिसको नहीं जानती' इस कथन से ज्ञानशक्तिसम्पन्न पृथ्वी की अभिमानिनी देवता विवक्षित है । 'योऽप्सु तिष्ठन्', 'योऽग्नौ तिष्ठन्', 'योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्', 'यो वायौ तिष्ठन्', 'य आकाशे तिष्ठन्' 'यः प्राणे तिष्ठन्····' ( बृ० उ० ३।७।४,५,६,७,१२,१६ ) इत्यादि मन्त्र, उपनिषद् एवं विभिन्न इतिहास आदि में भूत, भौतिक, भोग्य, भोक्ता आदि के रूप में एक व्यापक अन्तर्यामी तत्त्व का विस्तार से वर्णन है । “अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम्” ( ब्र० सू० २।१।५ ) में विशेषरूप से भगवान् बादरायण ने पृथिव्यादि के अभिमानी ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति से सम्पन्न देवता का प्रतिपादन किया है, अतः यह कहना कि 'विकासक्रम से ब्राह्मण, उपनिषद्, सूत्र आदि के काल में देवता-तत्त्व का विकास हुआ है' वैदिक सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है । अतएव मन्त्रभाग में भी ब्राह्मण, पुराण, सूत्र आदि का उल्लेख मिलता है । अतः मन्त्र, ब्राह्मण, पुराण आदि सब के समन्वय द्वारा निर्धारित अर्थ ही वास्तविक वेदार्थ है ।
“तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्” ( अथ० सं० १५।६।८ ) “ऋचः सामानि छंदांसि पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे ।” ( अथ० सं० १५।९।२४ ) “ऋग्वेदं भगवोध्येमि.... इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् ।” ( छा० उ० ७।१।२ ) “इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः ॥” ( छा० उ० ७।१।४ ) इत्यादि रूप से वेद-मन्त्रों तथा उपनिषदों में इतिहास, रामायण, महाभारत और पुराणों का उल्लेख है। अतएव मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, व्याकरणादि षडङ्ग, पूर्वोत्तर मीमांसा, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि का समन्वय करके ही जो वेदार्थ का निर्धारण किया जाता है, वही वेदार्थ का सम्यक् निर्धारण है, मनमाने ढंग से नहीं । अतएव महर्षि याज्ञवल्क्य ने अष्टादश विद्यास्थानों में सबका संकलन किया है। उनमें उन्होंने पुराणों का सर्वप्रथम स्थान माना है— “पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥” ( या० स्मृ० १।३ ) पुराण, न्यायवैशेषिक, पूर्वोत्तर मीमांसा, धर्मशास्त्र, छह अङ्गों ( व्याकरण, निरुक्त, शिक्षा आदि ) से युक्त चारों वेद इस प्रकार ये चौदह धर्म और विद्याओं के स्थान हैं । “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ( म० भा० १।१।२६८ ) “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ॥” ( म० भा० १।१।२६७ ) अल्पश्रुत से वेद डरता है कि यह अल्पज्ञ अर्थ का अनर्थ करेगा, अतएव इतिहास-पुराण के द्वारा वेद का तात्पर्य समझना चाहिए । कुछ लोग कहते हैं “वेदों में ब्राह्मणों को ही पुराण माना गया है” पर वह असंगत है। गोपथब्राह्मण में “सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सान्वाख्यानाः सपुराणाः” ( गो० ब्रा० १।२।९ ) इस प्रकार ब्राह्मणों से पृथक् पुराणों का उल्लेख है । “प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणानां प्रामाण्यमनुज्ञायते ।” ( ४।१।६२ गौ० सू० भा० ) इस वात्स्यायनभाष्य के अनुसार भी ब्राह्मण-ग्रन्थ इतिहास-पुराण का प्रतिपादन करते हैं। एतावता “ब्राह्मण- विशेष इतिहास-पुराण हैं ।” वात्स्यायनभाष्य का यह कथन केवल बृहदारण्यक के लिए ही है, अन्य स्थलों के लिए नहीं । अतः अन्य स्थलों के लिए वह कैसे प्रमाण होगा। पद्मपुराण को ईस्वीय शती का बतलाना भी सर्वथा निराधार ही है। प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य-चर्चा “औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ।” ( जै० सू० १।१।५ ) अर्थात् शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य है। प्रत्यक्ष एवं अनुमान से अनधिगत—अज्ञात अग्निहोत्रादिलक्षण धर्म का निमित्त ज्ञापक उपदेश अर्थात् विशिष्ट शब्द का उच्चारण ही होता है अर्थात् “अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः” इत्यादि नित्य वैदिक उपदेश ही धर्म में प्रमाण है और उक्त वैदिक वाक्यों से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान का अव्यतिरेक अर्थात् संशय-विपर्यय-बाध-राहित्य भी सिद्ध है, क्योंकि उक्त वाक्यों से उत्पन्न ज्ञान का बाध नहीं होता, अतः वह भ्रमात्मक नहीं है और वह ज्ञान निश्चयात्मक होने से संशयात्मक भी नहीं है। शब्द और उसके अर्थ के सम्बन्ध के ज्ञानवान् नास्तिकको भी उक्त वाक्यों से स्वर्ग एवं अग्निहोत्र का कार्य-कारणभाव स्पष्ट ही मालूम होता है, अतः उक्त
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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ३३ वाक्यों से "धर्म का ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता" यह भी नहीं कहा जा सकता। जो वस्तु जिस प्रमाण से विदित होती है उसका अभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यदि धर्म प्रत्यक्षादि से विदित होता तो उसका अभाव भी प्रत्यक्षादि से विदित हो सकता था। नेत्रगम्य रूप का अभाव श्रोत्र से विदित नहीं हो सकता। इसी तरह शास्त्रों से गम्य धर्म का अभाव प्रत्यक्षादि से सिद्ध नहीं हो सकता। प्रत्यक्षादि से अनुपलब्ध धर्म में या अलौकिक साध्यमा धन-भाव में वह उपदेशएवं तज्जन्य ज्ञान ही प्रमाण है और वह प्रमाण भी अनपेक्ष अर्थात् स्वतः है। ऐसे ज्ञान के प्रामाण्य के लिए ज्ञानान्तर या पुरुषान्तर की अपेक्षा नहीं होती। जैसे घटादि-कार्य की उत्पत्ति में ही साधनों की अपेक्षा होती है जलाहरणादि कार्य में उनकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही ज्ञान को अपनी उत्पत्ति में ही साधनों की अपेक्षा होती है; उत्पन्न ज्ञान अपने कार्य—विषय प्रकाश में अन्य की अपेक्षा नहीं रखता। अन्यथा यदि प्रथम ज्ञान को अपने प्रामाण्य के लिए प्रमाणान्तर की अपेक्षा होगी तो उस प्रमाण को भी प्रमाणान्तर की अपेक्षा होगी। ऐसी स्थिति में अनवस्था का प्रसंग अनिवार्य होगा। अतः प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः ही मान्य होता है। यदि विषय का बाध-ज्ञान तथा कारण-दोष का ज्ञान उत्पन्न हो तो तभी उनका अप्रामाण्य होता है। यही मत बादरायण महर्षि को भी मान्य है। श्रीबुल्के के अनुसार "वास्तोष्पति और सीता जो कि गृह और क्षेत्र के अधिष्ठाता देवता थे उनका महत्त्व अग्न्यादि देवताओं की अपेक्षा अल्प था; क्योंकि आर्यों का कुशल-क्षेम अग्न्यादि देवताओं पर निर्भर रहता था।" वे कहते हैं कि "सीता, क्षेत्रपति आदि कृषिसम्बन्धी देवताओं के कम महत्त्व का एक और कारण यह है कि प्रारम्भ में कृषि की अपेक्षा पशुपालन प्रधान रहा होगा।" उनके अनुसार यह सूक्त यद्यपि चौथे मण्डल का है जिसे वे प्राचीन मानते हैं, तथापि "इसकी रचना दशवें मण्डल के समकाल में होनी चाहिये; क्योंकि इसमें 'समा' शब्द का प्रयोग है जो दशवे मण्डल को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी प्रयुक्त नहीं है।" वस्तुतः वेदार्थनिर्णय करने की पद्धति पाश्चात्यों की अपनी निजी है। उसका वैदिक साहित्य एवं वैदिक- परम्परा से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे तथाकथित भाषाविज्ञान के अनुसार जिन शब्दों को अर्वाचीन मानते हैं उन शब्दों का जिन मन्त्रों में प्रयोग देखते हैं उन मन्त्रों को अर्वाचीन एवं जिनमें प्राचीन शब्दों को देखते हैं उन्हें प्राचीन मानते हैं। यही कारण है कि केवल मात्र 'समा' शब्द को देखकर चौथे मण्डल में आने पर भी, जिसे कि वे प्राचीन मानते हैं, इस सूक्त को नवीन मान लेते हैं। किन्तु वैदिक-दृष्टि से जैमिनि, शबर, कुमारिल आदि मनीषी शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को नित्य मानते हैं। शब्दार्थसम्बन्ध की अनादि परम्परा पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदि वैयाकरण महर्षियों की दृष्टि से भी शब्द और शब्दार्थ का सम्बन्ध नित्य ही माना जाता है, अतः किसी शब्द को अर्वाचीन और किसी को प्राचीन मानना यह वैदिक-परम्परा के सर्वथा विरुद्ध है। आम तौर पर जिन शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को हम परम्परा से सुनते और समझते चले आ रहे हैं, जिनके निर्माण का कोई काल प्रामाणिक नही सिद्ध होता, न हुआ और न होगा उन्हें अनादि मानना ही ठीक है। अपभ्रंश शब्द और उनके किसी नवीन अर्थ में प्रयोग के प्रामाणिक होने पर उनको सादि माना जा सकता है; तथापि ऐसे शब्द 'यदृच्छा' शब्द के नाम से व्यवहृत किये जाते हैं। इस तरह पद तथा पदार्थबोध से सम्पन्न आस्तिक एवं नास्तिक को आसानासाधारण वाक्य के श्रवणमात्र से वाक्यार्थ-बोध होता ही है। इसी लिए "अग्निहोत्रम् जुहुयात् स्वर्गकामः।" इस वाक्य के श्रवण से अग्निहोत्र-होम से स्वर्गप्राप्ति होती है ऐसा ज्ञान नास्तिक को भी होता ही है। ५
३४ रामायणमीमांसा द्वितीय मीमांसकों का ज्ञान-प्रामाण्य मीमांसकों के अनुसार ज्ञानों (चाहे वे कैसे भी हों) का प्रामाण्य स्वतः तथा अप्रामाण्य परतः होता है। तदनुसार नास्तिक के उक्त ज्ञान का प्रामाण्य स्वाभाविक है। उसका अप्रामाण्य तभी सम्भव है जब कारण-दोष-ज्ञान अथवा विषय का बाध-ज्ञान हो। पौरुषेय वाक्यों में पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद आदि के कारण कारण-दोष कहा जा सकता है, किन्तु वेद तो अपौरुषेय हैं अतः वहाँ कारण-दोष का संस्पर्श भी नितान्त असम्भव है। अग्निहोत्रहोम और स्वर्ग का कार्य-कारणभाव वेदैकगम्य होने के कारण प्रमाणान्तर से उसका बाध-ज्ञान भी असम्भव ही है। जो वस्तु जिन प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा विदित होती है, उसका अभाव भी उन्हीं प्रमाणों से विदित होता है, इन विचारों के अनुसार सीता-बोधक उपर्युक्त मन्त्र की अर्वाचीनता तथा और भी ऋग्वेद के विभिन्न मण्डलों की अर्वाचीनता की कल्पना पाश्चात्यों की निराधार कल्पना ही है। अतएव आरम्भ काल में आर्यों में पशुपालन का ही प्राधान्य था, कृषि का नहीं, यह भी निराधार कल्पना है। मन्त्रों के आधार पर इतिहासकल्पना भी असङ्गत ही है। यह भी पीछे कहा जा चुका है कि घटनापूर्वक वैदिकशब्दोल्लेख नहीं होता; यह सम्भव है भले कोई घटना ही वैदिक शब्दोलेखपूर्वक हो। विकासवाद से प्रभावित लोग ही आरम्भ काल में मानव को जङ्गली फल और मूल पर निर्वाह करनेवाला तथा बाद में पशु-पालन करनेवाला और तदनन्तर कृषि के आधार पर निर्वाह करनेवाला मानते हैं। वेद जब कि अनादि, अपौरुषेय, ईश्वरीयज्ञानानुविद्ध शब्द-राशि है तब उसके आधार पर ऐसी कल्पनाएँ सुतरां असङ्गत हैं। वस्तुतः मन्त्र यागाङ्ग तत् तत् देवताओं एवं द्रव्यों के स्तावक और स्मारक माने जाते हैं। मन्त्रों में अन्य बातों का वर्णन आनुषङ्गिकरूप से ही आता है। आनुषङ्गिक बातों का उनमें मुख्य तात्पर्य नहीं होता। श्रीबुल्के का कहना है कि 'ऋग्वेद के सूक्त प्रायः एक ही देवता से सम्बन्ध रखते हैं, लेकिन जिस सूक्त में सीता का उल्लेख है, उसमें कृषिसम्बन्धी अनेक देवताओं से प्रार्थना की जाती है। बहुत सम्भव है कि ये प्रार्थनाएँ अनेक स्वतन्त्र मन्त्रों की अवशेष हों जो एक ही सूक्त में सङ्कलित हो जाने पर बाद में चौथे मण्डल के अन्तर्गव रखी गयीं हों।' यह कल्पना भी पाश्चात्यों का दिमागी फितूर ही है; क्योंकि अनेकों मन्त्र अनेकों देवताओं से सम्बन्धित हैं। वेद-मन्त्रों का स्वरूप निर्धारण वस्तुतः देवता का निर्णय श्रुति, लिङ्ग, प्रकरण, निरुक्त आदि के अनुसार होता है। महर्षि शौनक की सर्वा- नुक्रमणी में सभी ऋग्मन्त्रों के देवताओं का वर्णन है। इसी लिए मन्त्रों का स्वरूप भी श्रुत्यादि के आधार पर निर्धारित होता है, मनमानी शैली से नहीं। अतएव यह कथन भी सर्वथा निरर्गल है कि 'कई मन्त्रों के अंश जोड़कर सूक्त में सङ्कलित कर लिये गये हैं'। श्रीबुल्के ऐसा समझते हैं कि पद्य ही मन्त्र हैं और गद्य ब्राह्मण। इसी अभिप्राय से वे कह रहे हैं कि कृष्णयजुर्वेद की चारों संहिताओं में कुछ गद्य मिलाया गया है। शुक्लयजुर्वेद की एकमात्र वाजसनेयिसंहिता में केवल मन्त्र दिये गये हैं और उससे सम्बन्ध रखनेवाला गद्य शतपथब्राह्मण में सङ्कलित है। परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या' (जै० सू० २।१।३२) इस सूत्र के अनुसार वैदिक सम्प्रदाय के वृद्धों द्वारा जो वाक्य मन्त्ररूप से व्यवहृत हों, उन्हीं को 'मन्त्र' संज्ञा दी जा सकती है। 'तत्' शब्द अभिधान का बोधक है। 'चोदक' शब्द का प्रयोजक अर्थ है। अर्थात् उन अभिधायक या स्मारक वेद-वाक्यों को मन्त्र कहा जाता है जिनमें वैदिकों का मन्त्रत्व-व्यवहार अनादि काल से प्रचलित है। यह प्रायिक लक्षण है। अतएव "वसन्ताय कपिञ्जलानालभेत" (यजु० सं० २४।२०) इत्यादि विधायक वेद-वाक्यों में भी वैदिक सम्प्रदायानुसार मन्त्रत्व-व्यवहार होता है। वैदिकों की मन्त्रत्व-प्रसिद्धि ही मन्त्र का मुख्य लक्षण है। यह लक्षण सब प्रकार के मन्त्रों में चला जाता है। वे
मन्त्र ऋक्, साम और यजु तीन प्रकार के होते हैं। "तेषामृग् यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था" (उन मन्त्रों में वे 'ऋक्' हैं जिनमें अर्थवशात् पाद-व्यवस्था होती है)। "गीतिषु सामाख्या" (गीति में साम-मन्त्रों की प्रसिद्धि है)। "शेषे यजुःशब्दः" (ऋक् और साम से अवशिष्ट मन्त्र ही यजु हैं)। ऋक्संहिता में पठित ऋक्, यजुःसंहिता में पठित यजु इत्यादि ऋक् अथवा यजु के लक्षण नहीं हो सकते। "देवो वः सवितोत्पुनात्वच्छिद्रेण" (तै० सं० १।१।५।१) यह मन्त्र यजुर्वेद में पठित होने पर भी यजु नहीं है, क्योंकि 'सावित्र्यर्चा' यह ब्राह्मण इस मन्त्र को 'ऋक्' बतलाता है। इसी तरह "एतत्साम गायन्नास्ते" यह प्रतिज्ञा करके "असितमसि, अच्युतमसि, शंसितमसि" ये तीन यजुर्मन्त्र साम के कहे गये हैं, अतः निर्णय यह हुआ कि छन्दोबद्ध मन्त्र ऋक् हैं, गीतिरूप मन्त्र साम हैं तथा वृत्त एवं गीति से वर्जित मन्त्र यजु हैं। अतएव वाजसनेयिसंहिता में पठित 'ब्रह्मणे ब्राह्मणमालभेत' (३०।५) इत्यादि ब्राह्मण में भी वैदिकप्रसिद्धि से ही मन्त्रत्व-व्यवहार होता है। असल में श्रीबुल्के भ्रम से 'ब्राह्मण' के स्थान पर 'गद्य' शब्द का प्रयोग कर गये हैं। जैसा कि वैदकों में प्रसिद्ध है कि तैत्तिरीयसंहिता में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों मिले हुए हैं, यही उसका कृष्णयजुष्ट्व है, किन्तु वाजसनेयिसंहिता में मन्त्र तथा ब्राह्मण दोनों अलग अलग हैं, इसी लिए उसमें शुक्लयजुष्ट्व है। उसमें भी "ब्रह्मणे ब्राह्मणम्" यह अपवाद है। अर्थात् इस अध्याय को छोड़कर अन्यत्र 'ब्राह्मण' का मिश्रण नहीं है। इस अध्याय के ब्राह्मण को, मन्त्र-धर्म से पठित होने के कारण, 'मन्त्र-ब्राह्मण' कहा जाता है। मतभेद, असमन्वय और कालभेद वस्तुतः वैदिक साहित्य और वैदिक सिद्धान्तों से अपरिचित होने के कारण श्रीबुल्के को भिन्न-भिन्न मन्त्र-संहिताओं, ब्राह्मणों और सूत्रों में मतभेद, असमन्वय और काल-भेद भासित होते हैं। वैदिक दृष्टि से "सर्व- वेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्" (ब्र० सू० ३।३।१) इस ब्रह्मसूत्र एवं इसी प्रकार के पूर्व-मीमांसा के गुणोपसंहार नामक प्रकरण में भिन्न-भिन्न शाखाओं के समान कर्म और उपासनाओं में अनुक्त गुणों एवं अङ्गों का शाखान्तर से संग्रह बतलाया गया है। तभी समन्वित वेदार्थ अनुष्ठेय होता है। सूत्रों के निर्माण का व्यक्तिशः काल निर्धारण हो सकता है; तथापि सिद्धान्ततः काल-निर्धारण नहीं हो सकता; क्योंकि वैदिक-परम्परा में जो सिद्धान्त अनादि सिद्ध हैं, उन्हीं की समय-समय पर आविर्भूत सूत्रों द्वारा अभिव्यक्ति होती है। सभी मन्त्रों और ब्राह्मणों में अनादिता, नित्यता होने के कारण काल-कल्पना सर्वथा असंगत ही है। सीता-नामों की गणना शास्त्रों में जो बात एक जगह आ गयी उसका सर्वत्र उल्लेख हो यह आवश्यक नहीं है। जहाँ वह उल्लिखित नहीं भी है, वहाँ भी उसके अन्यत्र हुए उल्लेख के साथ समन्वय कर सिद्धान्त का निर्धारण किया जाता है। यही बात मीमांसापद्धति, मिताक्षरा, दायभाग आदि ग्रन्थों में भी मान्य है, अतः अमुक अमुक सूत्रों में सीता नाम नहीं है अथवा अमुक स्थल पर केवल एक बार आया है ये सब कथन अनर्गल प्रलापमात्र हैं। यह कहा जा चुका है कि वेद नित्य हैं। वैदिक काल का अन्तिम काल भी कोई नहीं है। वेद में कृषि का वर्णन है, इतने मात्र से ही उसकी नित्यवेदप्रतिपाद्यता सिद्ध हो जाती है। उत्तरोत्तर विकास का सिद्धान्त निस्सार है इसी तरह लाङ्गल्योजन और सीतायज्ञ के अतिरिक्त, बीजवपनीय-यज्ञ (बीज बोने के समय), प्रलवन (धान्य काटने के समय), खल-यज्ञ, तन्त्रीयज्ञ (धान्य साफ करने के समय) और पर्ययण आदि के समय पारस्करगृह्यसूत्र, गोभिलगृह्यसूत्र, काठकगृह्यसूत्र, मानवगृह्यसूत्र आदि के अनुसार सांवत्सरिक अन्य पर्वों पर भी
३६ रामायणमीमांसा द्वितीय सीतादि देवताओं की पूजा होती थी। उनमें भी सीता की ही प्रधानता रहती थी। इससे सीता और उसकी पूजा का महत्त्व और व्यापकता सिद्ध होती है। श्रीबुल्के यद्यपि इसे उत्तरोत्तर विकास का परिणाम मानते हैं; परन्तु वेदादि शास्त्रों की दृष्टि से यह कथन निःसार है। रामायणीय राम और वैदिक राम श्रीबुल्के के अनुसार इक्ष्वाकु, अश्वपति, जनक, दशरथ आदि रामायण के पात्रों का वेद में उल्लेख तो मिलता है और वे प्रभावशाली ऐतिहासिक राजा भी थे। उनका परस्पर सम्बन्ध असम्भव तो नहीं, किन्तु इसका निर्देश नहीं मिलता। फिर भी वे इनका परस्पर सम्बन्ध असम्भव नहीं मानते। इसी प्रकार सीता और राम का भी वेदों में उल्लेख यद्यपि है तथापि उपर्युक्त पात्रों से उनका सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता। इससे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यद्यपि रामायण के रचयिता रामायण की सीता, राम और अन्य पात्रों का वैदिक सीता आदि पात्रों से सम्बन्ध जोड़ते हैं, तो भी वैदिक निर्देशों से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकलता। किन्तु वैदिकसंस्कार शून्य और वेदार्थ- निर्णय की पद्धति से अनभिज्ञ होने के कारण श्रीबुल्के इस असंगत निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। पदार्थ-निर्णय में वाक्य-शेषों का महत्त्व वैदिक पद्धति में संदिग्ध अर्थ का निर्णय वाक्य-शेष और तत्समान तत्सम्बन्धित शास्त्रान्तरों से किया जाता है। 'ब्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा', 'राजा स्वाराज्यकामो राजसूयेन यजेत' इत्यादि स्थलों में 'यव' और 'राजा' शब्द का अर्थ क्या है ? इस सम्बन्ध में वैदिक शब्दों द्वारा निर्णय न होने पर भी आर्य-प्रसिद्धि के अनुसार ही उनका 'दीर्घशूक' और 'क्षत्रिय' अर्थ लिया जाता है। "वसन्ते सर्वशस्यानां जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवाः कणिशशालिनः ॥" इसी प्रकार उपनिषदों में आकाश, प्राण आदि शब्दों का अर्थ भी वाक्यशेषों के आधार पर किया जाता है। फिर यहाँ तो रामतापनीय, रामरहस्य और सीतोपनिषद् आदि उपनिषदों में जब राम, सीता आदि पात्रों का सम्बन्ध, स्वरूप और महत्त्व साङ्गोपाङ्ग वर्णित है एवं वेद-व्याख्यानभूत रामायण, महाभारत, पुराण और तन्त्रों में इन विषयों का परिपूर्ण उपबृंहण विद्यमान है तो भी वैदिक साहित्य में राम-कथा की यथेष्ट सामग्री का अभाव कहना अनभिज्ञता या निकृष्ट नीयत का द्योतक है। वैदिक साहित्य में 'रामकथा' की सामग्री वस्तुतः 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति' (कठ० उ० १।२।१५), 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः' (गी० १५।१५), 'तत्तू समन्वयात्' (ब्र० सू० १।१।४), "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥" (ऋ० सं० १।१६४।४६) इत्यादि वचनों के अनुसार सम्पूर्ण वेदों का महातात्पर्य परात्पर परब्रह्म परमेश्वर में ही है। फिर भी अधिकांश मन्त्र और ब्राह्मणों द्वारा विविध प्रकार के कर्मकाण्ड एवं उपासनाओं का वर्णन किया गया है। मन्त्रों और उपनिषदों में ब्रह्मतत्त्व का सुस्पष्ट रूप से वर्णन है। वह ब्रह्म जैसे निर्गुण, निराकार और निर्विकार है उसी प्रकार सगुण, निराकार, सर्वान्तर्यामी स्वरूप भी है और वही ब्रह्म अचिन्त्य, अनन्त, कल्याणगुणगणों एवं अचिन्त्य अनन्त सौन्दर्य, माधुर्य आदि से परिपूर्ण साकाररूप में भी वर्णित है। जो ब्रह्मरूप ईश्वर अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण कर अनन्तानन्त प्राणियों के लिए अनन्तानन्त देह, इन्द्रिय आदि का निर्माण कर प्रदान करता है वह अपने
अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ३७ लिए भी दिव्य गुणगण-सम्पन्न, सौन्दर्य, माधुर्य आदि से परिपूर्ण श्रीविग्रह का निर्माण कर ही सकता है। जैसे जीव स्वरूपतः निराकार होते हुए भी साकार विग्रह-सम्पन्न होता है वैसे ही ब्रह्म भी निराकार और निर्गुण होने पर भी, दिव्य लीला-शक्ति से, सच्चिदानन्दमय श्रीविग्रह धारण करता है। जैसे निराकार काष्ठादि में व्यापक अग्नि, संघर्षणादि व्यापार से, दाहक. और प्रकाशक विशिष्ट अग्नि-शिखा के रूप में प्रकट होता है उसी प्रकार निराकार और निर्विकार ब्रह्म भी अपनी अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्ति के योग से सगुण और साकार सच्चिदानन्दमय परब्रह्म के रूप में प्रकट होता है अथवा जैसे जल हिम के रूप में व्यक्त होता है उसी प्रकार निराकार ब्रह्म साकार ब्रह्म हो जाता है। "प्र तद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥" (यजुःसं० ५।२०) अर्थात् जिन विष्णु के तीन महान् आक्रमणों (पाद-विक्षेपों) के आधारभूत लोकों में सम्पूर्ण भुवन तथा भूतजात अन्तर्भूत हो जाते हैं वे विष्णु उसी प्रकार अपने पराक्रम से पूजित होते हैं जैसे दुर्गम पर्वतों में रहनेवाला सिंह अपने पराक्रम से पूजित होता है। यहाँ 'भीमो मृगः' इस शब्द से नृसिंहावतार सूचित होता है । 'कुचरः' से भूमिचारी राम, कृष्ण आदि का अवतार भी सूचित होता है । 'त्रिषु विक्रमणेषु' के द्वारा वामनावतार का सूचन है। यही बात "कौ पृथिव्यां चरतीति कुचरः मत्स्यकूर्मादिरूपेण" कहकर उव्वट ने भी सूचित की है। "प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते । तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥" (यजुःसं० ३१।१९) प्रजापति (ईश्वर) गर्भ के भीतर विद्यमान होते हैं। वे वस्तुतः अजायमान नित्य-कूटस्थ होने पर भी राम, कृष्ण आदि रूप से बहुधा आविर्भूत होते हैं। "एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः । स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥" (यजुःसं० ३२।४) यह देव सभी दिशाओं में व्याप्त होकर स्थित है। हे जनो, वह प्रसिद्ध देव पहले भी अनेक रूपों में उत्पन्न हुआ है और वही गर्भ के मध्य में रहता है। वही जात होकर भी पुनः उत्पत्स्यमान होता है। वही अपनी अचिन्त्य शक्ति से प्रत्येक पदार्थों में व्याप्त होकर सर्वतोमुख रहता है। "त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णोर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन् ।” (ऋ०सं० १।२२।१८) व्यापक अदाम्य अर्थात् किसी के द्वारा जिसका हिंसन असम्भव है वही विष्णु गोप अर्थात् सबका रक्षक है। वह पृथिवी आदि लोकों को अपने तीन पदों से अधिष्ठित करता है। उसी से अग्निहोत्रादि धर्मों का धारण होता है। इस मन्त्र से भी व्यापक सर्वरक्षक परमेश्वर का त्रिविक्रमावतार सिद्ध होता है । "स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते । विभूतिरस्तु सूनृता ॥” (ऋ० सं० १।३०।५) इस मन्त्र से राधापति कृष्ण और राधा का अवतार रूप से अस्तित्व प्रमाणित होता है । राधा शब्द का 'धन' भी अर्थ है। परन्तु 'राधा' का वैभव होने से ही धन 'राधा' पदवाच्य होता है और वही राधातत्त्व पर- मेश्वर से स्तुत्य होने से वाणी द्वारा उद्यमान होता है। उसी की प्रिय सत्यरूपा लक्ष्मी विभूति है । "ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः परमं पदमवभाति भूरि ॥" (ऋ० सं० १।१५४।६)
इस मन्त्र का सायणोक्त अर्थ यह है कि हे पत्नी एवं यजमान ! वां—तुम दोनों के जाने के लिए गन्त- व्यत्वेन प्रसिद्ध उन सुखमय निवासयोग्य स्थानों की हम ऋत्विक् लोग कामना करते हैं। तदर्थ विष्णु की कामना करते हैं जिनमें अत्यन्त उन्नत गावः—रश्मियां रहती हैं और अयासः—अतिविस्तृत हैं अथवा अत्यन्त प्रकाशयुक्त हैं। जहाँ पर बड़े-बड़े महात्माओं द्वारा स्तुत्य भगवान् का दिव्य धाम स्वमहिमा से ही भासमान होता है। यही मन्त्र निम्न निर्दिष्ट रीति से गोलोकपरक भी माना जाता है। वर्षणशील गोपरूप उरुगाय विष्णु का परम पद भासमान होता है। वहीं बड़े शृङ्गवाली गमनशील बड़ी बड़ी गौएँ हैं। वहो बहुत से शोभन वास्तु—दिव्य धाम हैं। “विष्णुर्गोपाः परमं पाति पाथः प्रिया धामान्यमृता दधानः । अग्निष्टा विश्वा भुवनानि वेद महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥” (ऋ० सं० ३।५५।१०) सायण के अनुसार इस मन्त्र का यह अर्थ है—सबके पालक प्रियतम क्षयरहित तेज को धारण करनेवाले अग्निदेव परम स्थान की रक्षा करते हैं अथवा लोक-धारक अमृर्तों—उदकों को धारण करनेवाले उदकस्थान—अन्तरिक्ष की रक्षा करते हैं। वे अग्निदेव उन सब भुवनों को जानते हैं। वे ही देवों के मुख्य असुरत्व—महान् प्राबल्य एवं ऐश्वर्य का प्रातिनिध्य करते हैं । विनियोग के अनुसार उक्त अर्थ होने पर भी स्वाभाविकरूप से गोपालरूप विष्णु की महिमा का वर्णन भी इस मन्त्र से स्पष्टरूपसे विदित होता है। वे ही विष्णु प्रिय अमृत तेज को धारण करते हैं। वे ही सब भुवनों को जानते हैं। सर्वज्ञता ही उनका महान् ऐश्वर्य है। “इन्द्रं मित्रं वरुण” (ऋ० सं० १।१६४।४६) मन्त्र के अनुसार इन्द्र आदि विष्णु ही हैं। “या ते धामान्युश्मसि” यही मन्त्र शुक्लयजुर्वेद ( ६।३ ) में भी है। वहाँ यह मन्त्र विनियोग के अनुसार यूप का अवट (गर्त) में निक्षेप करते हुए पढ़ा जाता है। मन्त्र का आशय यह है—हे यूप ! तुम्हारे जाने के लिए हम उन दिव्य धामों की कामना करते हैं जिन स्थानों में गावः रश्मियाँ जाती है। यहाँ भी बड़ी बड़ी सींगवाली गायों से युक्त गोलोकपरक अर्थ संगत होता है। आदित्य-मण्डल वर्णन के पक्ष में प्रचुर दीप्ति से युक्त ‘रश्मि’ ही अर्थ है। वह व्यापक विष्णु का परक उत्कृष्ट पद वहीं शोभित होता है। उरु बहुत गान जिनका होता है वह विष्णु है। यह भी प्रस्तुत मन्त्र का आशय मान्य होता हैं कि बहुत महात्माओं द्वारा जिनकी स्तुति होती है उनके दिव्य स्थान की प्राप्ति के लिए हे यूप ! तुम इस अवट में स्थिर रहो । “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ।।” (अथ० सं० १०।२।३१) इसमें विष्णु के अवतार श्रीराम एवं उनकी अयोध्यापुरी का वर्णन है। मन्त्र का आशय यों है— आठ चक्रोंवाली, नव द्वारोंवाली देवताओं की पुरी है। उसका नाम है अयोध्या। उसमें ज्योतिर्मय कोश अर्थात् निधान है। उसी में परमानन्दमय राम ब्रह्मरूप से स्वर्ग-(निरतिशय सुख)-स्थानीय हैं। वह ज्योतियों के ज्योति हैं । प्रायः इसी आनुपूर्वी का मन्त्र तैत्तिरीय आरण्यक में भी मिलता है— “अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो लोको ज्योतिषावृतः ।” (तै० आ० १।२।७।३) दिव्य आठ प्रकृतियाँ ही उसके आठ चक्र हैं। उसके आठों दिशाओं एवं ऊर्ध्व की ओर उसके नव द्वार हैं।
" -> wait, does it say "वैष्णवी" or "वैष्णवीं"? Wait, look at the space: between 'वी' and 'म', there is a gap. Above the gap/वी, it looks like just "वैष्णवी". But wait, could it be वैष्णवीं? No, let's look closely, there is no dot above 'वी'. Wait, let's look at 'महायोगमायां': definitely has anusvara on 'यां'. Wait, look at line 32: "तिरस्करिण्याकारां" has anusvara on 'रां'. Wait, in Hindi/Sanskrit mix, sometimes typos exist in the print. But wait, is there a dot above 'वी'? Actually, looking very closely at 'वैष्णवी', above the ई-matra hook, there is no dot. Wait, let me not guess, let me look at every pixel: it's "वैष्णवी महायोगमायां". Wait, could there be a faint dot? Let's check: it looks like "वैष्णवी".
Wait, let's check line : "नित्यवैकुण्ठप्रतिवैकुण्ठमिव विभाति । ततो पादविभूतिर्वैकुण्ठपुरमायाति । अत्याश्चर्यानन्तविभूति-" Wait: "ततो पादविभूतिर्वैकुण्ठपुरमायाति" Wait, does it say "ततो" or "ततः"? Look at 'ततो': त, then त with o
४० रामायणमीमांसा द्वितीय समष्ट्याकारमानन्दरसप्रवाहैरलङ्कृतमभितस्तरङ्गिण्याः प्रवाहैरतिमङ्गलं ब्रह्मतेजोविशेषाकारैर- नन्तब्रह्मावर्तैरभितस्ततं नित्यमुक्तैरभिव्याप्तमनन्तचिन्मयप्रासादजालसङ्कुलत्पादविभूतिवैकुण्ठं भाति । तन्मध्ये चिदानन्दाचलो विभाति । तदुपरि ज्वलति निरतिशयानन्ददिव्यतेजोराशिः । तदभ्यन्तरे परमानन्दविमानं तदन्तश्चिन्मयासनम्, तत्पद्मकर्णिकायां निरतिशयदिव्यतेजोराश्यन्तरसमावीनं नारायणं पश्यति । ततोऽविद्याण्डं भित्त्वा विद्यापादमुलङ्घ्य विद्याविद्ययोः सन्धौ विष्वक्सेनवैकुण्ठपूरमायाति अनन्तदिव्यतेजोज्वालाजालैरमितोदनकं प्रज्वलन्तमनन्तबोधानन्दव्युहैरभितस्ततं शुद्धबोधविमानावल्भिः विराजितं परमकौतुकमाभाति । एवं बहूनि दिव्यानि धामान्यतिक्रम्य महायन्त्रं प्रज्वलति । तत्र षट्कोणचक्रे षड्दलपद्मं तत्कर्णिकायां प्रणवः, प्रणवमध्ये नारायणबीजम् ।''''दलेषु रामकृष्णषडक्षरमन्त्रौ ।" ; त्रिपादविभूतिमहानारायणोपनिषदः सप्तमाध्यायस्य सारसङ्कलनम् । उपर्युक्त त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् के प्रघट्टक के अनुसार साधक मायामय प्रपञ्च से विरक्त होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान भगवान् की आराधना करता है। तमस्तोम को पारकर, मूलाविद्यापुर का अनुभव करके परमतेजोमय अनन्तानन्तसूर्यों की दिव्यद्युति से जगमगाते भगवद्धाम का दर्शन करता है । तदनन्तर एक से एक उत्तरोत्तर परम प्रकाश परमानन्द परम अचिन्त्य सारमय धर्मों का अनुभव करता हुआ वह महायन्त्र और उसमें पद्म तथा पद्म में प्रणव तथा राम, कृष्ण आदि भगवत्स्वरूपों के दिव्य मन्त्रों के दर्शन करता है। भगवान् की महामहिमा ही उनकी मूर्ति है, अथवा उनसे अभिन्न उनकी महाशक्ति ही उनकी मूर्ति है । उसमें भगवान् का सदा सन्निधान रहता है। उसी में उनका आवाहन, प्रतिष्ठापन एवं सन्निधापन, सन्निरोधन आदि सम्पादित किये जाते हैं । अज्ञान के कारण, दौर्मनस्य के कारण एवं साधन-वैकल्य के कारण पूजा में जिस अपूर्णता की सम्भावना होती है, सम्मुखीकरण द्वारा उसी का निराकरण किया जाता है । भगवान् वाणी, मन, चक्षु, श्रोत्र आदि के अविषय होने से भक्त के लिए अत्यन्त दूर होते हैं । उन्हीं अमितद्युति भगवान् का उनके तेजःपञ्जर से सर्वतोवेष्टन करना ही अवगुण्ठनी मुद्रा से उनका अवगुण्ठन है । सब देवता जिसके दर्शन की कामना करते हैं, उसी मूर्ति में उनका स्वागत किया जाता है । चित्सार, चिन्तामणिमय मन्दिर में अव्याकृत ब्रह्मात्मक महासिंहासन की भावना करना ही भगवान् के लिए आसन-समर्पण करना है। अपने में सर्वथा भगवदधीनत्व की भावना करना ही उनको नमस्कार करना है । जिनके भक्तिलेश से परमानन्द की प्राप्ति होती है उनकी स्वाभाविक पावनता का चिन्तन करना ही उनको पाद्य-समर्पण करना है। तापत्रय का हनन करनेवाले उनके परमानन्द स्वरूप की भावना ही उनको अर्घ्य- प्रदान है । सकल वेदादि सत् शास्त्रों के महातात्पर्यागोचर देवाधिदेव भगवान् की भावना अशुद्धों की भी शुद्धि का हेतु है—यही आचमन है, क्योंकि इसके स्मरणमात्र से उच्छिष्ट एवं अशुचि प्राणी भी शुद्ध हो जाता है । उनके सर्वशोधक मङ्गलमय स्वरूप का चिन्तन करना ही उन्हें आचमन-अर्पण करना है । सर्वकालातीत परिपूर्ण सुखात्मा भगवान् ही सर्वसौगन्ध्य एवं सुस्नेहसार-सर्वस्व के अधिष्ठान हैं ऐसी भावना ही उन्हें उद्वर्तन एवं अभ्यङ्ग का समर्पण करना है । दुग्ध-दधि-घृत-मधु-शर्करामय पञ्चामृतों एवं गङ्गादि तीर्थों में जो भी स्निग्धता और पावनता है, उसका भगवत्तत्त्वरूप में अनुसन्धान करना ही पञ्चामृतादि से स्नान कराना है । भगवान् के परमानन्दबोधसिन्धु में निमग्न रहने की भावना करना ही भगवान् का स्नपन है । भगवान् के मङ्गलमय श्रीविग्रह के तेजोमय परम प्रकाश से भगवान् का स्वरूप प्रावृत है ऐसी भावना करना ही भगवान् को वस्त्र-समर्पण करना है । निर्दृश्य निरावरणस्वरूप का अनुसन्धान करना ही उनके लिए चिन्मय सुवर्ण-वर्ण पीताम्बर का अर्पण है, अथवा निरावरण ब्रह्मस्वरूप को आवरण करनेवाला मायामय आवरण ही भगवान् को कनक-कपिश पिशङ्गवस्त्र का अर्पण है । त्रिवृत्कृत त्रिगुण के अधिष्ठान भगवान् ही हैं, यह भावना करना उनको यज्ञोपवीत अर्पण करना है। भगवान् सर्वगन्ध हैं, सम्पूर्ण दिशाओं में विकीर्ण यशःसौरभ से भगवान् समन्वित हैं, ऐसी भावना करना ही उन्हें गन्ध-समर्पण है । भगवान् स्वभाव से ही परम सुन्दर हैं तथा
अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४१ नाना शक्तियों के आश्रय हैं। उनके श्रीअङ्ग में स्वाभाविक विचित्र सौन्दर्य ही नाना भूषण हैं ऐसी भावना करना ही उनके लिए नाना भूषणों का समर्पण है। सुन्दर मनवाले भक्तियुक्त भक्तों के विविध भावमय सौगन्ध्यों से युक्त शोभन मन का ही भगवच्चरणों में अर्पण सुमनों (पुष्पों) का अर्पण है, अथवा तुरीयवनसम्भूत नानागुणों से मनोहर अनन्तसौरभ पुष्पों का अर्पण है। भगवद्भावोद्दीप्त चिदग्नि में सर्वाभीष्ट कामों को प्रज्वलित करना ही उन्हें धूप- प्रदान है। जो आन्तर और बाह्य विविध ज्योतियों के भी ज्योति हैं, उनके अनिर्वाच्य अज्ञानमय तम का अपोहन ही उनके लिए दीपदान है। चित्तपात्र में सत् सौख्य का अनुसन्धान ही नैवेद्य-निवेदन है। परमताप-शमनहेतुभूत भगवान् के अखण्डानन्द स्वरूप का अनुसन्धान करना ही शीतल गङ्गामृत-समर्पण है। स्वीय सुरुचि सुरागादि भागों को भगवदात्मसात् कर देने की भावना ही ताम्बूल-समर्पण है। भगवान् में ही चतुर्वर्ग परिकल्पित करना फलार्पण है। सूर्य, चन्द्र, मन, बुद्धि आदि सर्वप्रकाशों के प्रकाशक स्वयंप्रकाश भगवान् ही हैं ऐसी भावना करना ही नीराजन- समर्पण करना है। अपने सर्वस्व को तथा स्वयं अपने को भगवान् के ही अर्पण कर देना दक्षिणा-समर्पण है। श्रीबुल्के की रामकथा में यह कथन कि “ऋग्वेद में 'सीता' नाम का भी एक बार उल्लेख हुआ है, लेकिन इस सीता का रामायण के उपर्युक्त अन्य ऐतिहासिक पात्रों से सम्बन्ध असंभव ही हैं, क्योंकि उसका व्यक्तित्व ऐतिहासिक न होकर सीता अर्थात् लाङ्गल-पद्धति के मानवीकरण का, परिणाम है। इस सीता का उल्लेख वैदिक काल से लेकर बराबर होता रहा है। इक्ष्वाकु, दशरथ तथा राम का ऋग्वेद में एक एक बार उल्लेख हुआ है और इनका पारस्परिक सम्बन्ध असम्भव नहीं है, परन्तु इनका कोई निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर इनका वैदिक साहित्य में और कहीं उल्लेख नहीं हुआ है।” (पृ० २४,२५) संगत नहीं है, क्योंकि सीतोपनिषद् तथा रामतापनीय आदि उपनिषदों में उन वैदिक पदार्थों का विस्तृत वर्णन है ही। सीता शब्द लाङ्गल-पद्धति का वाचक होता हुआ भी सर्वशक्तिमयी सर्वाधिष्ठात्री सीता की कृष्यधिष्ठात्री शक्ति के बोध में पर्यवसित होता हुआ सर्वाधिष्ठात्री महाशक्ति का भी बोधक है ही। वही चयन महायज्ञ के क्षेत्र की रेखारूप सीताओं की भी अधिष्ठात्री है। इसी दृष्टि से उसी महाशक्ति भगवती का वर्णन ब्रह्मविद्या, त्रयी तथा वार्त्ता विद्या के रूप में भी भारतीय साहित्यों में मिलता है— 'मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवी ।।' (दु० स० ४।९) सर्वदोष-रहित मोक्षार्थी मुनियों द्वारा आप ब्रह्मविद्यारूप से उपासित होती हैं। “देवी त्रयी भगवती भवभावनाय ।” (दु० स० ४।१०) भव-भावन के लिए आपकी ही त्रयी (वेदत्रयी) एवं तत्प्रोक्त यज्ञादिरूप में अभिव्यक्ति होती है। “वार्ता च सर्वजगतां परमातिहन्त्री ।” (दु० स० ४।१०) जगत् की बुभुक्षा, पिपासा, दारिद्रय आदि विपत्तियों का हनन करनेवाली आप ही वार्त्ता—कृषि, गोरक्ष्य, वाणिज्य आदि विद्या रूप में प्रकट होती हैं। यह पहले ही दिखलाया जा चुका है कि वही भगवती रक्तदन्तिका, शाकम्भरी आदिरूप से पुष्प, पल्लव, मूल और फलों से आढ्य तथा काम्य अनन्त रसों से युक्त शाकसञ्चय को धारण कर प्राणियों के क्षुधा-तृष्णा- मृत्युजनित भयों का हनन करती हैं। अतः वही महाशक्ति जैसे ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी, ब्रह्मविद्या, त्रयी, वार्त्ता आदि विद्याओं के रूप में अभिव्यक्त होती हैं वैसे ही लाङ्गल-पद्धति तथा चयन और क्षेत्र की रेखा में भी आविर्भूत होती हैं। ६
४२ रामायणमीमांसा द्वितीय बुल्के साहब का यह कथन भी सर्वथा अशुद्ध है कि "वाल्मीकिरामायण पर भी सीता (कृषि की अधिष्ठात्री देवी) का प्रभाव पड़ा है। यद्यपि रामायण में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी अयोनिजा सीता के जन्म और तिरोधान के जो वृत्तान्त मिलते हैं वे सम्भवतः इस वैदिक सीता के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।" (पृ० २३), क्योंकि जिस वाल्मीकिरामायण की चर्चा आप कर रहे हैं उसी रामायण में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि महर्षि वाल्मीकि ने लव और कुश को वेद का अध्ययन करा कर वेदार्थ के उपबृंहण के लिए ही रामायण ग्रन्थ पढ़ाया— "स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥" (वा० रा० १।४।६) नागेश के अनुसार तत् तत् अर्थों का तात्पर्य-ग्रहण ही वेद का उपबृंहण है । उसी प्रयोजन के लिए श्रुति- तात्पर्यविषयीभूत अर्थ के प्रतिपादकरूप से ही महर्षि ने वेदार्थ परिनिष्ठित लव और कुश को रामायण ग्रन्थ पढ़ाया । इतर भारतीय संस्कृति में भी इतिहास और पुराण के द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण या स्पष्टीकरण करना कहा गया है । ऐसी स्थिति में यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि वैदिक सीता से रामायण की सीता का वृत्तान्त प्रभावित नहीं, किन्तु स्पष्टतः वैदिक सीता का ही रामायण में स्पष्टीकरण हुआ है। वैदिक महर्षि वाल्मीकि के शब्दों में भी हलाग्र से सीता का आविर्भाव पहले बताया ही जा चुका है । श्रीबुल्के के अनुसार "भार्गवेय राम, औतपस्विनि राम तथा क्रातुजातेय राम इन तीनों रामों का परिचय ब्राह्मण ग्रन्थों से मिलता है । हो सकता है कि ये ऐतिहासिक भी हों, किन्तु रामायण के राम से इनका सम्बन्ध सम्भव प्रतीत नहीं होता ।" किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रामायण के निर्विशेषण राम के ही किसी गुण के संयोग से किन्हीं अन्य लोगों में भी 'राम' शब्द का प्रयोग सम्भव हो सकता है, यह सच है । जैसे तैत्तिरीयारण्यक में 'राम' शब्द रमणीय पुत्र के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है— "संवत्सरं न मांसमश्नीयात् । न रामामूपेयात् । न मृण्मयेन पिबेत् । नास्य राम उच्छिष्टं पिबेत् । तेज एव तत् संश्यति ।" (तै० आ० ५।८।१३) वह एक वर्ष तक मांस का भक्षण न करे । स्त्री का भी संग न करे । मिट्टी के पात्र से पानी न पीये । उसका पुत्र उच्छिष्ट न पीये । इस प्रकार उस यजमान का तेज पुञ्जीभूत होता है । फिर भी केवल 'पुत्र' राम शब्द का अर्थ नहीं होता । रमणीय पुत्र या राम जैसा महत्त्वपूर्ण पितृभक्त धर्मनिष्ठ पुत्र ही 'राम' शब्द से यहाँ विवक्षित है । जैसे गौणी वृत्ति से सिंह-भिन्न देवदत्तादि मनुष्य में भी 'सिंह' शब्द का प्रयोग होता है उसी तरह रमणीयता गुण के सम्बन्ध से या राम के अन्यान्य उत्तम गुणों के योग से पुत्र में भी 'राम' शब्द का प्रयोग होता है । राजाओं को भी आनन्दरामायण के अनुसार राम ने अपना नाम प्रदान किया है । पाठसम्बन्धी विवेचना "प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु । ये युक्तवाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम् ॥" (ऋ० सं० १०।९३।१४) मैंने दुःशीम पृथवान, वेन और राम के लिए यह सूक्त गाया है। इन्होंने पाँच सौ घोड़े अथवा रथ जुतवाये जिससे मुझपर उनका अनुग्रह चारों ओर फैल गया ।
अध्यायं कामिल बुल्के की रामकथा ४३ वस्तुतः श्रीबुल्के की पुस्तक ‘रामकथा’ में ऊपर वर्णित मन्त्र अशुद्ध छपा है । शुद्ध मन्त्र यों है— “प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु । ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्वाव्येषाम् ॥” “ये देवा पञ्च शता शतानि रथान् युक्त्वाय अश्वैर्युक्त्वा अस्मयु अस्मत्कामाः सन्तः पथा यज्ञमार्गेण गच्छन्ति तेषाम् एषां देवानां विश्वावि देवानां लोके वा विशेषेण श्रावकगुणयुक्तं तत्स्तोत्रं दुःशीमे तन्नाम्नि पृथवाने पृथवानः पृथ्विः तस्मिन्वेने च असुरे बलवति रामे चैतेषु राजसु प्रवोचम् प्रब्रवीमि प्रख्यापयामि इत्यर्थः । मघवत्सु अन्येषु धनवत्सु च प्रख्यापयामीत्यर्थः ।” इस सूक्त में पञ्चदश ऋचाएँ हैं। इनके द्वारा अङ्गिरा ऋषि ऋत्विग्रूप से वृत होकर देवताओं की स्तुति करते हैं । जो देवगण पाँच सौ रथों को घोड़ों से युक्त करके मेरी कामना से अर्थात् मुझसे स्तुत्य होने की कामना से यज्ञ-मार्ग से आते हैं उन देवताओं के लोक में अथवा उन देवताओं के श्रावकगुण-युक्त स्तोत्र का मैं दुःशीम पृथवान्—बलवान् वेन तथा राम इन राजाओं में प्रवचन या प्रख्यापन करता हूं। इसी तरह अन्य मघवानों अर्थात् धनवानों में मैं उस स्तोत्र का प्रख्यापन करता हूं । श्रीबुल्के कहते हैं—ऋग्वेद में इक्ष्वाकु का केवल एक बार वर्णन हुआ है, इससे इतना ही प्रतीत होता है कि वे कोई राजा थे :— “यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् माराय्येधते” जिसकी सेवा में धनवान् और प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है । पूरा मन्त्र इस प्रकार है :— “यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् मराय्येधते । दिवीव पञ्च कृष्टयः ।” ( ऋ० सं० १०।६०।४ ) मन्त्र का सायणानुसारी अर्थ यह है— जिस जनपद का इक्ष्वाकु राजा व्रत में अर्थात् रक्षणरूप व्रत या कर्म में वृद्धि को प्राप्त होता है, वह राजा रेवान् अर्थात् रयिवान्—धनवान् है और मरायी शत्रुओं का मारक है । इन दो विशेषणों से मालूम होता है कि वह जनता को धन-धान्य से समृद्ध बनाता है और परराष्ट्रकृत सब उपद्रवों का निराकरण करता है। उसके राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण एवं पञ्चम निषाद—सभी लोग द्युलोक में रहनेवाले सङ्कल्पसिद्ध देवताओं के समान सुखी रहते हैं । “ब्राह्मण ग्रन्थों तथा प्राचीन उपनिषदों में अश्वपति और जनक का, पहले पहल उल्लेख हुआ है । अश्वपति का रामायण के पात्रों से कोई सम्बन्ध निर्दिष्ट नहीं हुआ है। इतना ही विदित होता है कि वे ऐतिहासिक राजा थे जो सम्भवतः जनक के समकालीन थे । ब्राह्मण ग्रन्थों के जनक एवं रामायणीय जनक की अभिन्नता की समस्या का निर्णय असम्भव प्रतीत होता है ।” परन्तु यह कथन संगत नहीं। जब सिद्धान्ततः मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं और ऋग्वेद में दशरथ का वर्णन है ही इधर रामायण में भी, जो कि वेद का ही विस्तृत व्याख्यान है, दशरथ और अश्वपति का सम्बन्ध है ही फिर यह क्यों न मान लिया जाय कि महाराजा दशरथ की पत्नी कैकेयी महाराज केकयाधिपति अश्वपति की ही पुत्री हैं तथा वही भरत की माता और राम की विमाता भी हैं। संदिग्ध अर्थ का निर्णय असन्दिग्ध प्रमाणों से होना उचित है, अतएव श्रीबुल्के का यह कहना भी असंगत है कि “रामायण की सीता के पिता जनक का प्रसिद्ध वैदिक जनक के साथ सम्बन्ध तो जुड़ता है, यह स्पष्ट भी
४४ रामायणमीमांसा द्वितीय हैं और स्वाभाविक भी है, लेकिन इस अभिन्नता के लिए वैदिक साहित्य से कोई प्रमाण उद्धृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि जनक के सारे वृत्तान्त में रामकथा का कोई सङ्केत विद्यमान नहीं है ।” क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से यह तो स्पष्ट ही है कि जनक एवं विदेह कुल हैं। उनमें अनेक जनक एवं विदेह उत्पन्न हुए हैं। विशेष वर्णन के आधार पर सामान्य का निर्णय किया जाना स्वाभाविक ही है । अतः सामान्यरूप से प्रसिद्ध वैदिक जनक का विशेषरूप रामायण के वर्णन से निश्चित होना उचित ही है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि रामायण, महाभारत तथा पुराणों का असाधारण सम्बन्ध है। रामायण आदि में वैदिक धर्म एवं वैदिक संस्कृति का ही वर्णन है । ये सभी ग्रन्थ वेद की प्रशंसा करते हैं और वेद को ही अपना मूल बतलाते हैं । वेदों में भी रामायण आदि से सम्बन्धित व्यक्तियों एवं घटनाओं का भी वर्णन है ही । इसके अतिरिक्त रामायण, महाभारत तथा पुराणों के रचयिता भी साधारण व्यक्ति नहीं हैं, किन्तु वे सर्वज्ञकल्प महर्षिवृन्द हैं। वे जितना वेद और वेदार्थ जानते थे, उतना भारतीय वैदिक विद्वान् भी नहीं जान सकते, फिर विदेशी विद्वानों को, जिनके आचार-विचार तक वैदिकविधानों के अनुकूल नहीं हैं एवं जिनका वेदाध्ययनाधिकार भी नहीं है, वेद तथा वेदार्थ-ज्ञान कितना हो सकता है ! इसके अतिरिक्त वेद की बहुत सी शाखाएँ कलिकाल में लुप्त भी हो जाती हैं । वाल्मीकि और व्यास आदि के समय में वेद की सभी शाखाएँ उपलब्ध थीं । महाभाष्यकार पतञ्जलि के समय में भी, आज की अपेक्षा अधिक शाखाएँ उपलब्ध थीं, क्योंकि महाभाष्य एवं पुराणों के अनुसार वेदों की ग्यारह सौ इकतीस ( ११३१ ) शाखाएँ प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक शाखा की मन्त्रसंहिता, ब्राह्मण एवं उपनिषदें पृथक्-पृथक् होती हैं । अर्वाचीन देशी या विदेशी कोई भी विद्वान्, जिनके सामने यथाकथञ्चित् ९ या १० शाखाएँ मिलती हैं । फिर वे कैसे कह सकते हैं कि वैदिक जनक या अश्वपति का सम्बन्ध रामायण के पात्रों के साथ नहीं है या रामकथा का वेदों में अभाव है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि लौकिक या वैदिक किसी भी ग्रन्थ में किसी के भी जीवन का समग्र वृत्तान्त नहीं मिल सकता, किन्तु कतिपय ही घटनाओं का वर्णन मिल सकता है। वाल्मीकिरामायण में भी तो राम के जीवन का पूरा वृत्तान्त कहाँ है । भगवान् राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य किया । ग्यारह हजार वर्षों में केवल चालीस वर्षों की ही कुछ ही घटनाओं का वर्णन है । पुराणानुसार तो शतकोटि श्लोकों में रामचरित का वर्णन है, पर आज वह भी कहाँ उपलब्ध है ? “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” ( पद्मपु० ५।१।१४ ) अर्थात् राघवेन्द्र राम के चरित्र शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हैं, उनका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने की क्षमता रखता है । इसी तरह यह कथन भी असंगत है कि “वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा वैदिक काल में राम-कथा प्रसिद्ध हो चुकी थी । इसका विस्तृत निर्देश वैदिक साहित्य में कहीं नहीं पाया जाता” क्योंकि वैदिक काल कोई काल नहीं है और न ही कभी वैदिक साहित्य की रचना हुई है। “पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः” ( तै० ब्रा० ३।१२।९२ ), “वाचा विरूपनित्यया” ( ऋ० सं० ८।७५।६ ) इत्यादि के अनुसार वेद अनादि एवं नित्य हैं, उनकी कभी रचना नहीं होती । ईश्वर ही उनके पठन-पाठनरूप सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता है । प्रजापति, अग्नि, वसु, आदित्य आदि विभिन्न मन्त्रद्रष्टा नित्यसिद्ध वेदसूक्तों का दर्शनमात्र करते हैं, निर्माण नहीं । “ऋषिर्दर्शनात्” ( नै० २. ३. २ ) इस निरुक्त-वचन से तो यही सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में सभी काल वेद-काल हैं। व्यास के पुराणों एवं ब्रह्मसूत्रों में भी “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा
अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४५ स्वयम्भुवा" (म० भा० १२।२३२।२५), "अत एव च नित्यत्वम्" (ब्र० सू० १।३।२९), "शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्" (ब्र० सू० १।३।२८) आदि से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि वेद-वाणी अनादि एवं अनन्त है। उसकी उत्पत्ति और विनाश नहीं होता। हाँ, सम्प्रदाय-प्रवर्तन में उत्पत्ति और सम्प्रदाय-लोप में विनाश का व्यवहार होता है। वेदों में नदी, पर्वत, राजा आदि अनित्य अर्थ मानने पर अनित्य अर्थ से अनित्य शब्द का सम्बन्ध मानना पड़ेगा। अतः शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक स्वाभाविक नित्य सम्बन्ध मानने में विरोध होगा। इस पूर्वपक्ष का यह समाधान किया है कि शब्द से अर्थ की सृष्टि होती है, यह बात प्रत्यक्ष अर्थात् श्रुति से और अनुमान अर्थात् स्मृति से सिद्ध है। तथा च, नित्य शब्दों से अनित्य व्यक्तियों की उत्पत्ति मानने पर कोई विरोध नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तियों के अनित्य होने पर भी जाति नित्य है। अतः नित्य शब्द का और नित्य जाति का नित्य सम्बन्ध सिद्ध ही है। जैसे न्यायाधीश आदि पदों के वाचक तथा इन्द्र आदि शब्द व्यक्ति के वाचक नहीं क्योंकि न्यायाधीश आदि पदों पर जो भी व्यक्ति आयेंगे वहीं न्यायाधीश तथा इन्द्र आदि कहलायेंगे। अतएव वेदों की नित्यता सिद्ध है। विष्णु-सहस्रनाम के 'रामो विरामो विरतः' में राम शब्द आता है। वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है कि उदीर्ण रावण के वध की कामनावाले देवताओं की प्रार्थना से महातेजा विष्णु ही रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) इस दृष्टि से वेदों में आया हुआ विष्णु का नाम भी राम का ही नाम है। विष्णु की सब कथाएँ राम की कथाएँ हैं, अतः वेदों में राम की विशिष्ट कथाओं का पर्याप्त वर्णन है। ऐसी स्थिति में रामकथा-सम्बन्धी सामग्री का अभाव बताना अपनी दुरभिसन्धि एवं अनभिज्ञता का ही द्योतक है। महाभारत प्रथम अथवा रामायण ? दूसरे अध्याय के आरम्भ में श्रीबुल्के ने लिखा है "राम-कथासम्बन्धी आख्यान वाल्मीकिरामायण से पूर्व भी प्रचलित थे। इसका आभास महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व के संक्षिप्त राम-चरित के निर्देशों से भी मिलता है। ये आख्यान आजकल अप्राप्य हैं। इस प्रकार वाल्मीकिरामायण राम-कथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध होती है।" वस्तुतः वाल्मीकिरामायण महाभारत एवं पुराणों की अपेक्षा बहुत प्राचीन रचना है। फिर महाभारत के द्रोणपर्व या शान्तिपर्व में रामचरित का निर्देश मिलने से यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि वाल्मीकिरामायण से भी पूर्व राम-कथा प्रचलित थी ? असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद वास्तव में यह सब इतिहास बिगाड़नेवाले आजकल के तथाकथित ऐतिहासिकों की दुर्बुद्धि का परिणाम है जिसके आधार पर कहा जाता है कि वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा महाभारत प्राचीन ग्रन्थ है, क्योंकि महाभारत में असभ्य एवं जङ्गली युग का प्राधान्येन वर्णन है। तभी उसमें कुन्ती, द्रौपदी आदि का अनेक पुरुषों से सम्बन्ध वर्णित है। रामायण उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है, क्योंकि उसमें एकपत्नीव्रत और पातिव्रत्य आदि का वर्णन है। परन्तु यह सब नितान्त अशुद्ध और मनगढन्त कल्पना है, क्योंकि पुराण-आदि के रचयिता महर्षि व्यास ने वाल्मीकि और उनकी रामायण का महत्त्व मानकर ही अपनी विशाल कृति महाभारत में रामचरित्र का वर्णन किया है, यह वाल्मीकि- रामायण-माहात्म्य के वर्णन से भली-भाँति विदित होता है।
४६ रामायणमीमांसा द्वितीय उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता आगे चलकर श्रीबुल्के ने वाल्मीकिरामायण के पाठ-भेद की चर्चा की है। उन्होंने यह बताया है कि “उत्तरकाण्ड की रचना बहुत बाद में हुई है, क्योंकि उसके तीनों पाठों में महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं है, जब कि शेष काण्डों में स्थान स्थान पर यथेष्ट पाठ-भेद उपलब्ध हैं। दाक्षिणात्य पाठ में सीता-त्याग का कारण यह बताया गया है कि भृगु ने अपनी पत्नी की हत्या के कारण ही विष्णु को शाप दिया था। यदि उत्तरकाण्ड प्रारम्भ से रामायण का एक अङ्ग होता तो अन्य काण्डों की तरह इस काण्ड में भी परिवर्तन उपलब्ध होते।” पर ये सब विचार असङ्गत ही हैं। दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ एवं पश्चिमोत्तरीय पाठ सम्प्रदाय-भेद से हुए हैं। काश्मीर तथा नेपाल की प्रतियों में भी पाठ-भेद पाया जाता है। बड़ौदा के शोध-संस्थान में इन प्रतियों का उपयोग भी किया जा रहा है। प्राचीन काल में कण्ठस्थ विद्याओं का ही सर्वाधिक महत्त्व होता था। वेदों के सम्बन्ध में आज भी वही परिपाटी प्रचलित है। दुर्गासप्तशती में भी, जिसके बहुत ही अधिक अनुष्ठान आज भी गौड़, मैथिल एवं दाक्षिणात्यों में प्रचलित हैं, पाठ-भेद उपलब्ध हैं। पाठ-भेद में कमी होने से उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता मानना निष्प्रमाण है। “सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः” इस न्याय के अनुसार आरोप होने पर ही उसके निमित्त का अनुसरण किया जाता है, यह नहीं कि निमित्त के आधार पर आरोप किया जाय। शुक्ति में रजत का आरोप होने पर ही सादृश्यादि निमित्तों को आरोप का हेतु माना जाता है, यह नहीं कि शुक्ति एवं रजत का सादृश्य है, इसलिए शुक्ति में रजत का आरोप अवश्य ही किया जाय। इस दृष्टि से, पाठ-भेद होने पर उसके निमित्त का अन्वेषण करना चाहिये न कि पाठभेद नहीं है, इसलिए उसको वाल्मीकिकृत रामायण ही न माना जाय। वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ दशरथ के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं — “चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणि नयन्ति ।” (ऋ० सं० १।१२६।४) यानी दशरथ के भूरे रङ्ग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व कर रहे थे।” वस्तुतः यह सात ऋचाओं का सूक्त है। आदि से पाँच ऋचाओं के ऋषि कक्षीवान् हैं। मन्त्रों का द्रष्टा या वक्ता ऋषि होता है। मन्त्रों द्वारा जिसका निरूपण होता है, वह देवता होता है। “या तेनोच्यते” (अनु० २।५।१२५)। सूक्त के भाष्यारम्भ में ही सायण ने एक प्रसिद्ध इतिहास का वर्णन किया :— दीर्घतमा महर्षि के पुत्र कक्षीवान् ने ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन के लिए चिरकाल तक गुरुकुल में निवास किया तथा वेदों का भली भांति अध्ययन कर व्रतों का यथायोग्य परिपालन किया। अनन्तर गुरु की अनुज्ञा लेकर उन्होंने अपने घर की ओर प्रस्थान किया। रात्रि को मार्ग में ही उन्होंने विश्राम किया। वही भावयव्य का पुत्र स्वनय नाम का नृपति अपने अनुचरों के साथ सैर करता हुआ अकस्मात् कक्षीवान् के पास आया। कक्षीवान् सहसा जाग उठे। उन्होंने स्वनय को अपने सम्मुख खड़ा पाया। कक्षीवान् सहसा प्रतिबुद्ध होकर उठे ही थे कि राजा ने उनका हाथ पकड़कर उनको अपने आसन पर बैठा लिया और उनके सौन्दर्य से मुग्ध होकर उन्हें अपनी कन्याएँ प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की। उनका नाम, गोत्र आदि पूछा। कक्षीवान् ने अपने पिता और अपना वृत्तान्त बताया। राजा ने संभाव्य (कुलीन) समझ कक्षीवान् को अपने घर ले जाकर मधुपर्क, वस्त्र, माल्य आदि से पूजन किया और रथ सहित दस कन्याएँ, दो सौ निष्क (सुवर्णमुद्राएँ), सौ घोड़े, सौ बैल और एक हजार साठ गौएँ उन्हें प्रदान कीं। पुनश्च एकादश रथ भी दिये। कक्षीवान् ने सब सामग्री लेकर अपने पिता दीर्घतमा को अर्पित कर दी।