भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा २९ “चत्वारि शृङ्गास्त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्तहस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महादेवो मर्त्यां आविवेश ॥” इस मन्त्र का अर्थ भाष्यानुसार यज्ञपरक होने पर भी महाभाष्यकार पतञ्जलि की दृष्टि से व्याकरणशास्त्रपरक अर्थ लिया जाता है और वह अर्थ मान्य भी होता है। विशेषतः ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ इस वचन के अनुसार सम्पूर्ण वेदों का अवान्तर तात्पर्य अन्य विषयों में होते हुए भी महातात्पर्य परमात्मस्वरूप में ही है। सीता-राम परमेश्वराभिन्न होने से परमेश्वर ही हैं, अतः उनमें इन मन्त्रों की सङ्गति सुतरां सङ्गत है। अतएव रामायण की सीता का लाङ्गल-पद्धति से ही उत्थान रामायण में वर्णित है— ‘अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः ॥ क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता । भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥’’ ( वा० रा० १।६६।१३, १४ ) ‘तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् । अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता ॥’’ ( वा० रा० २।११८।२८ ) निर्विशेषण सीता-राम शुक्लयजुर्वेद की मुक्तिकोपनिषद् में सभी उपनिषदों का उद्देशतः वर्णन है। उसमें सीतोपनिषद् का भी उल्लेख है। सीतोपनिषद् में परब्रह्मस्वरूपिणी, परप्रकृतिस्वरूपिणी आदि रूप से सीता का वर्णन है। उसी में सीता के एक रूप को हलाग्रसमुत्पन्न कहा गया है—‘‘द्वितीया भूतले हलाग्रे समुत्पन्ना।’’ उपनिषदों और तन्त्रों में श्री, भू, नीला आदि रूप से भगवान् की त्रिविध शक्तियों का वर्णन है। उनमें एक भूसमुत्पन्ना वही कही जा सकती है। श्रीबुल्के ने विभिन्न वैदिक उद्धरणों के अनुसार सावित्री—सीता और सीता की खोज की है। उनमें स्पष्ट ही रामायण की सीता ‘निर्विशेषण’ सीता ही हैं। जैसे लक्ष्मी और गृहलक्ष्मी आदि रूप में मुख्यलक्ष्मी ‘निर्विशेषण’ लक्ष्मी समझी जाती है, गृहलक्ष्मी आदि अनेक लक्ष्मियां सविशेषण हो सकती हैं वैसे ही वेद, उपनिषद् तथा रामायणों द्वारा वर्णित सीता निर्विशेषण सीता ही हैं। यही स्थिति राम के सम्बन्ध में भी समझ लेनी चाहिये। निर्विशेषण राम ही रामायण के राम हैं। दूसरे सविशेषण राम आदि का नाम अनादिसिद्ध राम के नाम पर रखा गया है। वैदेही, दाशरथि आदि विशेषण अवतारी स्वरूपविशेष के बोधनार्थ ही हैं जैसे आज भी राम और सीता के नाम पर नाम रखे जाते हैं। अतएव सावित्री सीता का नाम भी निर्विशेषण मुख्य सीता के आधार पर ही सीता रखा गया है। श्रीसूक्त के अनुसार महालक्ष्मीरूपा सीता ‘सूर्या’ और ‘चन्द्रा’ दोनों ही शब्दों से कही गयी है। तथा च महालक्ष्मी की चन्द्रा शक्ति के समान ही सूर्या शक्ति भी सीता शब्द से व्यवहृत हो सकी थी—‘सूर्यां हिरण्मयीं’, ‘चन्द्रां प्रभासाम्’ ( श्रीसूक्त ) । स्थागर-चर्चा यहाँ बुल्के साहब ने तैत्तिरीयब्राह्मण में वर्णित सीता सावित्री के मन्त्राभिमन्त्रित स्थागर ( अङ्गराग ) से वाल्मीकिरामायण और अध्यात्मरामायण में उल्लिखित अङ्गराग की भिड़न्त भिड़ाकर स्थागर का विकास इस रूप में है, माना है और तुलसीदासजी ने जानबूझकर यह अंश छिपा लिया, ऐसा बतलाया है। परन्तु यह कथन अयथार्थ है, क्योंकि जो बात वाल्मीकिरामायण और अध्यात्मरामायण दोनों में हो, महात्मा तुलसीदास उसका अपलाप नहीं कर सकते। अतः उनके ‘दिव्य वसन भूषण’ शब्द से अङ्गराग भी समझ लेना चाहिये। यहाँ एक बात और भी